डिजिटल विकास : पानी, ऊर्जा और पर्यावरण का सवाल
लंबे समय तक डेटा सेंटरों की चर्चा केवल उनकी बिजली खपत तक सीमित रही। अब वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं का ध्यान एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन की ओर जा रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है, वह है जल।
पिछली एक शताब्दी पर नज़र डालें तो औद्योगिक विकास की पहचान विशाल कारखानों, ऊंची चिमनियों, इस्पात संयंत्रों और मशीनों की गूंज से होती थी। वही किसी देश की आर्थिक शक्ति और औद्योगिक प्रगति के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन इक्कीसवीं सदी में विकास का चेहरा बदल चुका है। आज विशाल, शांत और अत्याधुनिक इमारतें नई अर्थव्यवस्था की धुरी बन रही हैं। इनमें न मशीनों का शोर सुनाई देता है, न धुएं के गुबार उठते हैं, फिर भी दुनिया की लगभग हर डिजिटल गतिविधि की नींव इन्हीं पर टिकी है। इन्हीं नई आधुनिक इमारतों को हम 'डेटा सेंटर' के नाम से जानते हैं।
आज मोबाइल से किया गया भुगतान, किसी विद्यार्थी की ऑनलाइन कक्षा, अस्पताल का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, किसान के मोबाइल पर पहुंचा मौसम का पूर्वानुमान, सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीर या कोई भी संवाद इनमें से कोई भी गतिविधि डेटा सेंटरों के बिना संभव नहीं है। हर डिजिटल क्रिया अंततः किसी न किसी डेटा सेंटर तक पहुंचती है, जहां सूचनाएँ संग्रहित होती हैं, उनका विश्लेषण होता है और वे कुछ ही क्षणों में हमारे पास वापस लौट आती हैं।
यही वजह है कि डिजिटल दुनिया जितनी आभासी और अदृश्य दिखाई देती है, उसकी बुनियाद उतनी ही ठोस और वास्तविक है। यह केवल इंटरनेट या सॉफ्टवेयर का संसार नहीं, बल्कि विशाल डेटा सेंटरों, लाखों सर्वरों, निरंतर बिजली आपूर्ति, उच्च क्षमता वाले संचार नेटवर्क और बड़ी मात्रा में ऊर्जा तथा जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित विशाल भौतिक अवसंरचना है।
पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस पूरी व्यवस्था को नई गति दी है। चैटबॉट, भाषा अनुवाद, चित्र निर्माण, वीडियो विश्लेषण, चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक गणनाओं जैसे कार्यों के लिए पहले से कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता पड़ रही है। इस वजहसे दुनिया भर में नए डेटा सेंटरों के निर्माण की होड़ शुरू हो गई है। अंतर्राष्ट्रीय शोध अध्ययनों के अनुसार वर्तमान में विश्व में लगभग 11,800 डेटा सेंटर संचालित हैं, जबकि भारत में इनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और देश एशिया के प्रमुख डेटा सेंटर बाज़ारों में शामिल हो चुका है।
डिजिटल इंडिया, यूपीआई, क्लाउड सेवाओं, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस विस्तार को और गति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डेटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए उतने ही आवश्यक हैं, जितने कभी सड़कें, रेलमार्ग और बिजलीघर। वे निवेश आकर्षित करते हैं, रोजगार सृजित करते हैं और डिजिटल सेवाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित करते हैं।
हर ‘विकास’ अपने साथ कुछ अनदेखे प्रश्न भी लेकर आता है। लंबे समय तक डेटा सेंटरों की चर्चा केवल उनकी बिजली खपत तक सीमित रही। अब वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति-निर्माताओं का ध्यान एक ऐसे प्राकृतिक संसाधन की ओर जा रहा है, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है, वह है जल। हम मानते हैं कि हमारा डेटा ‘क्लाउड’ में सुरक्षित है। क्लाउड कोई काल्पनिक स्थान नहीं, बल्कि हजारों सर्वरों से भरे विशाल डेटा सेंटरों का नेटवर्क है।
हर ई-मेल, हर डिजिटल भुगतान, हर वीडियो, हर ऑनलाइन खोज और हर एआई अनुरोध इन्हीं सर्वरों पर संसाधित होता है। ये सर्वर दिन-रात लगातार काम करते हैं। जितनी अधिक गणनाएं होती हैं, उतनी ही अधिक गर्मी उत्पन्न होती है। यदि यह तापमान नियंत्रित न किया जाए तो सर्वर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, उपकरण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और डिजिटल सेवाएं बाधित हो सकती हैं, इसलिए शीतलन (कूलिंग) डेटा सेंटर की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
बड़े डेटा सेंटरों में सर्वरों को सुरक्षित तापमान पर बनाए रखने के लिए पानी आधारित कूलिंग टावर, चिलर और वाष्पीकरण आधारित शीतलन प्रणालियों का उपयोग किया जाता है। पानी गर्मी को तेजी से अवशोषित करता है, इसलिए यह बड़े डेटा सेंटरों के लिए प्रभावी माध्यम माना जाता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि डिजिटल सुविधाओं की बढ़ती मांग के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगती है। यही वह प्रश्न है, जिसने पूरी दुनिया में नई बहस शुरू कर दी है। क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया पहले से ही जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है? और यदि हां, तो क्या भविष्य का डिजिटल विकास जल सुरक्षा के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ सकेगा?
इन सवालों के उत्तर केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक भी है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि डिजिटल प्रगति वास्तव में टिकाऊ विकास का आधार बनती है या प्राकृतिक संसाधनों पर एक नया दबाव। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार लगभग 100 मेगावाट क्षमता वाला एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर केवल शीतलन के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर पानी तक उपयोग कर सकता है। यह मात्रा कई छोटे कस्बों की दैनिक जल आवश्यकता के बराबर हो सकती है। पानी का उपयोग केवल शीतलन टावरों में ही नहीं होता, बल्कि आर्द्रता नियंत्रण और अन्य सहायक प्रणालियों में भी किया जाता है।
भारत में ऊर्जा, पर्यावरण एवं जलवायु पर कार्य करने वाली संस्था सीईईडब्ल्यू (CEEW) का अनुमान है कि वर्ष 2024 में देश के डेटा सेंटरों ने लगभग 150 अरब लीटर पानी का उपयोग किया। यदि वर्तमान विस्तार की गति बनी रही, तो 2030 तक यह खपत दोगुने से अधिक हो सकती है। यह अनुमान केवल उद्योग के आकार का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की नीति संबंधी चुनौती का भी संकेत देता है। वास्तव में एआई ने नई विडंबना पैदा कर दी है। एक ओर यह जलवायु परिवर्तन, मौसम पूर्वानुमान, कृषि, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है, दूसरी ओर यदि उसकी आधारभूत संरचना संसाधनों का अत्यधिक उपयोग करेगी तो वही तकनीक पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ा सकती है।
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