जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे सभी आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में सौंपी रिपोर्ट, कहा- ‘स्पष्टीकरण टालमटोल वाला और असंतोषजनक’
सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली अधजली नकदी को लेकर जस्टिस वर्मा नहीं दे सके संतोषजनक जवाब
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से नकदी बरामद होने के मामले में संसद की जांच समिति ने आरोपों को साबित पाया है। समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा नकदी और उसके स्वामित्व को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की गई है।
नई दिल्ली। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से नकदी बरामद होने के मामले में लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित पाया है और कहा कि वह संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के मामले में उन्हें पद से हटाने की कार्यवाही शुरू की गई थी।
समिति ने कहा है कि न्यायमूर्ति वर्मा अपने आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी और उसके स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे। जांच समिति के अनुसार, न्यायमूर्ति वर्मा का स्पष्टीकरण ''टालमटोल वाला और असंतोषजनक'' रहा। समिति ने कहा कि उनके स्पष्टीकरण में स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी का भाव नहीं दिखा।
समिति ने यह भी कहा कि घटनास्थल से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित या संरक्षित नहीं किए गए और आवास के स्टोर रूम में कुछ फेरबदल किया गया था। इस तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी थी। लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने 12 अगस्त 2025 को, न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले की जांच के लिए इस समिति का गठन किया था।
आंतरिक समिति ने भी ‘सक्रिय या मौन नियंत्रण’ की बात कही थी
न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं। घटना के बाद, न्यायमूर्ति वर्मा ने पद से इस्तीफा दे दिया और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया लगभग निष्प्रभावी हो गई है। हालांकि, उनके इस्तीफे को अभी तक कानून मंत्रालय ने अधिसूचित नहीं किया है।
विवाद के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था जो घटना के समय दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि न्यायमूर्ति वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर ''सक्रिय या मौन नियंत्रण'' था, जहां कथित तौर पर नकदी रखी गई थी। जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए उनपर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद, अगस्त में बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया था।
इस्तीफा देने से निष्प्रभावी हुई महाभियोग की कार्यवाही
हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के मद्देनजर न्यायमूर्ति वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया से जुड़े जानकारों के अनुसार, शीर्ष अदालत के एक फैसले के मुताबिक, जब कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपते हैं और उसकी प्रति सार्वजनिक कर दी जाती है तो माना जाता है कि न्यायाधीश ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने बताया कि न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं करता। प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति औपचारिक रूप से इस्तीफा स्वीकार करते हैं, जिसके बाद कानून मंत्रालय का न्याय विभाग इसकी अधिसूचना जारी करता है।
