ओणम : लोकजीवन में रचे-बसे सद्भाव की परंपरा

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
On

भारत के अलग-अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले त्योहार अपनी विविध परंपराओं और लोकमान्यताओं के कारण देश की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करते हैं। केरल का ओणम भी ऐसा ही पर्व है, जिसमें आस्था के साथ प्रकृति, कृषि, लोककला और सामाजिक एकता का अद्भुत मेल दिखाई देता है।

दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव आते ही केरल के गांव-शहर रंग-बिरंगे फूलों, पारंपरिक गीतों और उल्लास से भर उठते हैं। घरों के आंगन में बनने वाली फूलों की आकर्षक सजावट से लेकर नौका दौड़ और सामूहिक भोज तक, ओणम की हर परंपरा अपने भीतर किसी न किसी सामाजिक संदेश को समेटे हुए है।  

केरल की धरती पर जब ओणम का उल्लास उतरता है, तो पूरा वातावरण जैसे किसी बड़े लोकमहोत्सव में बदल जाता है। घरों के सामने फूलों से बनी कलात्मक आकृतियां, पारंपरिक परिधानों में सजे लोग, गीत-संगीत की गूंज और उत्सव में शामिल होने के लिए जुटते परिवार हर दृश्य केरल की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है। दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व जीवन में नई ऊर्जा और उल्लास भरने के साथ लोगों को अपनी जड़ों से भी जोड़ता है।

महाबली के स्वागत की परंपरा

ओणम की सबसे प्रसिद्ध कथा असुरराज महाबली से जुड़ी है। लोकमान्यता है कि महाबली अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय और न्यायप्रिय राजा थे। उनके शासन में प्रजा सुखी थी और समाज में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि देवताओं को चिंता होने लगी। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर महाबली की परीक्षा ली। वामन ने राजा से तीन पग भूमि मांगी। महाबली ने सहर्ष यह दान स्वीकार कर लिया।

इसके बाद वामन ने विराट रूप धारण किया और दो पगों में पृथ्वी तथा आकाश नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा तो महाबली ने अपना सिर आगे कर दिया। उनकी दानशीलता और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वर दिया कि वे वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने धरती पर लौट सकेंगे। इसी विश्वास के साथ ओणम पर लोग अपने प्रिय राजा के स्वागत की तैयारी करते हैं। घरों की साफ-सफाई, सजावट और सामूहिक उत्सव को इसी परंपरा से जोड़ा जाता है। महाबली की कथा आज भी समानता, सुशासन और जनकल्याण की कल्पना को जीवंत करती है।

फूलों से सजता है आंगन

ओणम की पहचान उसकी फूलों की सजावट से भी है। घरों के आंगन में बनाए जाने वाले ‘पूक्कलम’ में तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। त्योहार के दिनों में यह सजावट प्रतिदिन कुछ और विस्तृत होती जाती है। परिवार के सदस्य मिलकर इसे तैयार करते हैं, जिससे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी की भागीदारी सुनिश्चित होती है। यह परंपरा केवल घर की सुंदरता बढ़ाने तक सीमित नहीं है।

इसमें प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके रंगों को जीवन में शामिल करने की भावना दिखाई देती है। ओणम के दौरान तिरुवातिराकली, कुम्माट्टिकली, पुलिकली और कथकली जैसी पारंपरिक कलाएं भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। लोकगीतों और वाद्ययंत्रों के साथ होने वाली प्रस्तुतियां इस पर्व को विशिष्ट सांस्कृतिक रंग प्रदान करती हैं।

नावों की रफ्तार और सामूहिक उत्साह

ओणम के उत्सव में पारंपरिक नौका दौड़ यानी वल्लमकली का भी खास आकर्षण है। लंबी सर्पाकार नौकाओं में सवार नाविक एक साथ तालमेल बनाकर चप्पू चलाते हैं। पानी पर तेजी से आगे बढ़ती इन नौकाओं का दृश्य देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। इस आयोजन की खासियत केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि उसमें दिखाई देने वाली सामूहिक भावना है। नाव को आगे बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति को एक ही लय और गति में काम करना पड़ता है। यही ओणम का सामाजिक संदेश भी है व्यक्तिगत प्रयास तभी सार्थक होता है, जब उसमें सामूहिक सहयोग जुड़ जाए।

ओणसद्या में मिलती है आत्मीयता

ओणम के अवसर पर बनने वाला पारंपरिक भोजन ‘ओणसद्या’ पर्व की सबसे स्वादिष्ट परंपराओं में शामिल है। केले के पत्ते पर परोसे जाने वाले इस भोजन में चावल, सांभर, अवियल, ओलन, थोरन, अचार, पापड़ और कई अन्य व्यंजन शामिल होते हैं। भोजन के अंत में परोसा जाने वाला पायसम इसकी मिठास बढ़ा देता है। ओणसद्या की विशेषता व्यंजनों की संख्या से अधिक उस सामूहिकता में है, जिसमें लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं।  

धर्म से आगे, सद्भाव का संदेश

ओणम की सबसे सुंदर विशेषताओं में इसकी समावेशी प्रकृति है। केरल में विभिन्न समुदायों के लोग इस पर्व में अपनी-अपनी तरह से शामिल होते हैं। यही वजह है कि ओणम धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर सामाजिक मेल-मिलाप और भाईचारे का पर्व बन गया है। दस दिनों के दौरान लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, शुभकामनाएं देते हैं और उत्सव में भाग लेते हैं। सामूहिक आयोजनों के जरिए लोगों के बीच संवाद और अपनापन बढ़ता है। इस तरह ओणम सामाजिक दूरी कम करने और समुदायों को एक-दूसरे के करीब लाने का माध्यम बनता है।

खेती और प्रकृति का उत्सव

ओणम का रिश्ता केरल की कृषि परंपरा से भी गहराई से जुड़ा है। फसल के मौसम से जुड़े इस पर्व में किसान प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। खेतों में हरियाली, फूलों की उपलब्धता और नई फसल का उत्साह उत्सव की खुशियों को और बढ़ा देता है। आज जब पर्यावरण संरक्षण की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है, तब ओणम की प्रकृति-केंद्रित परंपराएं विशेष अर्थ रखती हैं। यह पर्व बताता है कि मनुष्य का सुख प्रकृति की समृद्धि से अलग नहीं हो सकता।