शेयर बाजार की चमक के बीच बॉन्ड की अहमियत

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भारतीय निवेशकों के लिए वर्तमान समय में गुणवत्ता को यील्ड से ऊपर रखना महत्वपूर्ण है। G-Secs, SDLs और मजबूत AAA-rated corporate bonds पोर्टफोलियो के डेट हिस्से की बुनियाद बन सकते हैं।

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रजत मेहरोत्रा,
वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

भारतीय निवेशकों के बीच निवेश की चर्चा होते ही सबसे पहले शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, सोना या रियल एस्टेट का नाम सामने आता है। बॉन्ड को अक्सर कम रिटर्न देने वाला और केवल सुरक्षित निवेश चाहने वालों का साधन मान लिया जाता है। वास्तव में किसी संतुलित निवेश पोर्टफोलियो में बॉन्ड की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और शेयर बाजार की अस्थिरता के बीच बॉन्ड निवेशक को नियमित आय, पूंजी की अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा और पोर्टफोलियो विविधीकरण प्रदान कर सकते हैं।

बॉन्ड को सरल भाषा में समझें तो यह एक प्रकार का ऋण है। निवेशक सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था अथवा कंपनी को एक निश्चित अवधि के लिए पैसा देता है और बदले में उसे तय शर्तों के अनुसार ब्याज मिलता है। परिपक्वता पर मूलधन लौटाया जाता है, बशर्ते जारीकर्ता अपने भुगतान दायित्व पूरे करे। यही कारण है कि बॉन्ड में निवेश करते समय केवल ब्याज दर नहीं, बल्कि जारीकर्ता की साख, क्रेडिट रेटिंग, अवधि और तरलता भी देखना आवश्यक है। भारत में निवेशकों के पास बॉन्ड के कई विकल्प हैं। केंद्र सरकार द्वारा जारी Government Securities यानी G-Secs अपेक्षाकृत सबसे कम क्रेडिट जोखिम वाले घरेलू ऋण साधनों में आते हैं। 

राज्य सरकारें State Development Loans यानी SDLs जारी करती हैं। इसके अतिरिक्त PSU एवं वित्तीय संस्थानों के बॉन्ड और कंपनियों के कॉरपोरेट बॉन्ड उपलब्ध हैं। कॉरपोरेट बॉन्ड सामान्यतः सरकारी प्रतिभूतियों की तुलना में अधिक यील्ड दे सकते हैं, लेकिन उनके साथ क्रेडिट जोखिम भी बढ़ता है, इसलिए केवल अधिक ब्याज देखकर किसी बॉन्ड में पैसा लगाना उचित नहीं है। पुराने टैक्स-फ्री बॉन्ड भी सेकेंडरी मार्केट में उपलब्ध हो सकते हैं। इनकी ब्याज आय निर्धारित शर्तों के तहत कर-मुक्त हो सकती है, इसलिए ऊंचे टैक्स स्लैब वाले निवेशकों के लिए इनकी प्रभावी यील्ड आकर्षक हो सकती है, हालांकि इनकी उपलब्धता, बाजार मूल्य और यील्ड को खरीदने से पहले समझना जरूरी है।

वहीं Sovereign Gold Bonds तकनीकी रूप से सरकारी प्रतिभूतियां हैं, लेकिन उनका मूल्य सोने से जुड़ा होता है, इसलिए उन्हें सामान्य फिक्स्ड-इनकम बॉन्ड का सीधा विकल्प नहीं समझना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियां बॉन्ड बाजार को और दिलचस्प बनाती हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति में रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी है और नीतिगत रुख ‘न्यूट्रल’ रखा है। अमेरिका में फेडरल फंड्स रेट की लक्ष्य सीमा 3.50 से 3.75 प्रतिशत है। वहीं जापान में वर्षों की बेहद नरम मौद्रिक नीति के बाद बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है और बैंक ऑफ जापान लगभग एक प्रतिशत की ओवरनाइट कॉल रेट को लक्ष्य कर रहा है। जापान का उदाहरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जिस देश को दशकों तक लगभग शून्य ब्याज दरों के लिए जाना जाता था, वहां अब ब्याज दर और बॉन्ड यील्ड दोनों का परिदृश्य बदल रहा है। अगस्त में जापान की महंगाई के आंकड़ों के बाद आगे दर बढ़ने की संभावना पर भी बाजार में चर्चा तेज हुई है।

अमेरिका में भी तस्वीर एकतरफा नहीं है। कुछ फेड नीति-निर्माता महंगाई बनी रहने की स्थिति में ऊंची दरों की आवश्यकता देख रहे हैं, जबकि अर्थशास्त्रियों के एक हालिया सर्वे में 2026 के शेष हिस्से में दर स्थिर रहने की अपेक्षा प्रमुख थी, इसलिए निवेशकों को केवल यह मानकर लंबी अवधि के बॉन्ड नहीं खरीदने चाहिए कि ब्याज दरें अब निश्चित रूप से नीचे ही जाएंगी। यही Duration Risk को समझना जरूरी है। ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो सामान्यतः पहले से जारी फिक्स्ड-रेट बॉन्ड की बाजार कीमत गिरती है और दरें घटती हैं तो कीमत बढ़ सकती है। लंबी अवधि वाले बॉन्ड इस बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। भारत में भी RBI की अगस्त बैठक के बाद बाजार विशेषज्ञों ने अत्यधिक आक्रामक लंबी अवधि की रणनीति के बजाय उच्च गुणवत्ता और short-to-medium duration पर ध्यान देने की सलाह दी है।

भारतीय निवेशक के लिए इसलिए वर्तमान समय में गुणवत्ता को यील्ड से ऊपर रखना महत्वपूर्ण है। G-Secs, SDLs और मजबूत AAA-rated corporate bonds पोर्टफोलियो के डेट हिस्से की बुनियाद बन सकते हैं। इसके साथ निवेश को अलग-अलग maturities में बांटकर ‘bond ladder’ तैयार की जा सकती है। इससे पूरा पैसा एक ही ब्याज-दर चक्र में फंसने का जोखिम कम होता है। छोटे निवेशक प्रत्यक्ष बॉन्ड खरीदने के बजाय अपनी आवश्यकता और जोखिम क्षमता के अनुरूप debt mutual funds का विकल्प भी देख सकते हैं, लेकिन बॉन्ड को ‘बिना जोखिम वाला निवेश’ समझना भी बड़ी भूल होगी। सरकारी बॉन्ड में क्रेडिट जोखिम बहुत कम हो सकता है, लेकिन ब्याज-दर जोखिम मौजूद रहता है। 

 

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