सातवीं मंजिल की खिड़की: आठ साल के सोमेश ने जाते-जाते पिता को सिखा दिया जिंदगी का सबसे बड़ा सबक
रोहिणी के अस्पताल की सातवीं मंजिल पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे आठ साल के बच्चे की कहानी, जिसने अपनी आखिरी घड़ियों में भी दूसरों की खुशियों की चिंता की। बेटे के जाने के चार साल बाद भी पिता उसकी आंखों से दुनिया देखता है।
दिल्ली के रोहिणी इलाके में, जहां ट्रैफिक की आवाजें आसमान से टकराकर वापस लौटती हैं, एक अस्पताल की सातवीं मंजिल पर एक कमरा था, कमरे के बाहर सफेद रंग के दरवाजे पर लिखा था- “पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी वार्ड” और उस कमरे में एक बाप था। सुनील शर्मा। पचासवां साल भी पूरा नहीं हुआ था उम्र का अभी, लेकिन आंखें अस्सी साल की थीं, उनमें वह खाली रोशनी थी, जो आदमी को तब मिलती है, जब वह बहुत ज्यादा देख चुका होता है।
आठ महीने। इतना वक्त उसने उस प्लास्टिक की कुर्सी पर गुजारा था, जो खिड़की के ठीक बगल में रखी थी, ठीक उस खिड़की के, जिसके नीचे दुनिया चलती रहती थी। दुनिया जिसे उसका बेटा सोमेश देखता था।
बिस्तर पर आठ साल का एक बच्चा था, घुंघराले बाल, कीमो के बाद झड़ गए थे। गाल, जो कभी पिचकारी चलाते वक्त फूल जाते थे अब अंदर को धंसे हुए थे। हाथ, जो कभी सुनील के ऑफिस के कागजों पर रंग पोतते थे। अब नसों के जाल से ढके, पतले हो गए थे, लेकिन मुस्कान। वह नहीं गई। जैसे किसी ने उसे आत्मा से जड़ दिया हो।
खिड़की के नीचे एक छोटा रेस्टोरेंट था। हर शाम वहां रोशनी जल उठती। कॉलेज के लड़के आते, बच्चे पिज्जा चुराते एक-दूसरे की प्लेट से, जोड़े सेल्फी लेते। भीड़ की खुशी सातवीं मंजिल तक एक धुंधली आवाज की तरह आती और सोमेश उसे सुनता।
पहले-पहल सुनील को उन लोगों से चिढ़ होती थी। कैसे हंस सकते हैं लोग, जब उसके बच्चे की सांसें हर दिन थोड़ी और कम हो रही थीं? लेकिन धीरे-धीरे सुनील को समझ आया कि वे लोग निर्दयी नहीं थे। उन्हें पता ही नहीं था कि उनके सिर के ऊपर, सातवीं मंजिल की एक खिड़की के पीछे, एक छोटा-सा बच्चा धीरे-धीरे जीवन से विदा होने की तैयारी कर रहा है।
सच कहूं तो, सुनील भी उन्हें इसलिए नहीं देखता था, क्योंकि उसे उनमें कोई दिलचस्पी थी। वह उन्हें इसलिए देखता था, क्योंकि सोमेश उन्हें देखता था और एक बाप दुनिया को अपने बेटे की आंखों से देखना चाहता था।
“पापा, देखो। वो आंटी बच्चे को आइसक्रीम दे रही हैं।” “हां बेटा।” “पापा, जब मैं ठीक हो जाऊंगा, तो हम नीचे जाएंगे। मैं बड़ा वाला पिज्जा खाऊंगा और आपको को भी खिलाऊंगा।” सुनील के गले में कुछ अटका। वह खिड़की के बाहर देखने लगा ताकि सोमेश उसकी आंखें न देख सके।
“और मुझे?” पास से सुमन की आवाज आई। “आपको तो, दो आइसक्रीम।”
वे तीनों हंसे। उस कमरे में, उन सफेद दीवारों के बीच, वह हंसी किसी दवा से ज्यादा असरदार थी और उतनी ही क्षणिक।
सुमन। जिस औरत ने कभी घर में चाय बनाते हुए गाने गुनगुनाए थे, वह अब मंदिर और अस्पताल के बीच बंटी हुई थी। दोनों जगह हाथ जोड़े, दोनों जगह आंखें नम। वह सोमेश के कपड़े रोज बदलती, जैसे उसे तैयार करना हो कहीं जाने के लिए। उसके झड़े हुए बालों की जगह पर हाथ फेरती धीरे-धीरे, जैसे बाल अभी भी वहां हों। और सुनील भीतर-ही-भीतर भगवान से सौदेबाजी करता रहता।
“हे भगवान, मेरी उम्र ले लो… बस इसे बचा लो।” लेकिन भगवान शायद सौदे नहीं करते। डॉक्टर ने एक शाम केबिन में बुलाया। उनके चेहरे पर वह दया थी, जो शब्दों से पहले पहुंचती है। “हमने पूरी कोशिश की है...” बाकी वाक्य सुनील के कानों तक पहुंचे जरूर, लेकिन उसे सुनाई नहीं दिए। वह सीढ़ियों में बैठा। रोया। इतना, कि आवाज बंद हो गई जैसे नदी इतनी भर जाए कि बहना भूल जाए। जब कमरे में लौटा, सोमेश जाग रहा था। “पापा, आप रो रहे थे?” “नहीं। आंख में कुछ चला गया था।” सोमेश मुस्कुराया- “आप झूठ बोलते वक्त अच्छे नहीं लगते।” और फिर उसने अपनी पतली उंगलियों से सुनील के गाल पर बचे एक आंसू को पोंछ दिया। उस क्षण पिता कौन था, यह तय करना मुश्किल था।
मार्च की एक दोपहर। सुमन मंदिर गई थी। कमरे में सिर्फ वे दोनों थे। नीचे रेस्टोरेंट में किसी का जन्मदिन था गुब्बारे, तालियां, गाना। सोमेश बहुत देर तक उन्हें देखता रहा। फिर उसने सुनील का हाथ पकड़ा। उसकी उंगलियां ठंडी थीं, जैसे नवंबर की कोई सुबह उन्हें छूकर वहीं रुक गई हो।
“पापा...” “हां बेटा।”
“उन्हें मत बताना।” “किसे?”
उसने खिड़की के बाहर इशारा किया।
“उन्हें... कि मैं जा रहा हूं। उन्हें खुश रहने देना।”
सुनील को उस दिन पता चला, मृत्यु हमेशा दहाड़ती हुई नहीं आती। कभी-कभी वह एक आठ साल के बच्चे की धीमी आवाज में आती है, जिसके हाथ ठंडे हैं और जिसकी फिक्र दुनिया के लिए है, अपने लिए नहीं। उस रात मशीन की आवाज एक सीधी रेखा में बदल गई। सुनील की दुनिया उसी क्षण रुकी, लेकिन नीचे, उसी वक्त शायद, किसी बच्चे ने पिज्जा का पहला टुकड़ा उठाया होगा। किसी मां ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा होगा। किसी प्रेमी ने तस्वीर खींची होगी। यह सब सोमेश के शब्दों में “ठीक” था।
चार साल गुजर गए। घर पर सोमेश का कमरा वैसे ही है- साइकिल, किताबें, वो टूटा हुआ क्रिकेट का बल्ला जिसे वह ‘ठीक करवाएंगे’ कहता था। सुमन ने कुछ नहीं बदला। सुनील ने भी नहीं।
अब जब भी किसी रेस्टोरेंट के बाहर भीड़ दिखती है, हंसते चेहरे, बच्चे, रोशनी, सुनील रुकता है। उसे नाराजगी नहीं होती। चिढ़ नहीं होती। बस एक पुरानी याद, जो घाव नहीं, परछाईं है, जो दर्द नहीं देती, साथ चलती है।
एक बाप अपने बच्चे को कभी नहीं खोता।
वह बस उसकी आंखें उधार ले लेता है और फिर, सारी उम्र, उन्हीं मासूम नजरों से दुनिया देखता रहता है।
