एआई का बाजार : ज्ञान लेकर नष्ट कर दीं दुर्लभ किताबें
अमेरिकी अदालत में सामने आए दस्तावेज़ों से पता चला कि लाखों किताबों को डिजिटल रूप में बदला गया। इसके बाद कीमती किताबों को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया गया।
असिस्टेंट प्रोफेसर
दुनिया की सबसे आधुनिक मशीनें इस समय सबसे पुराने ज्ञान-स्रोत की तलाश में हैं। जिन कंपनियों ने इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री के विशाल हिस्से पर अपने मॉडल प्रशिक्षित किए, वे अब लाखों छपी हुई किताबों तक पहुंच बनाने में लगी हैं। यह बदलाव किसी पुरानी चीज़ के प्रति अचानक पैदा हुए सम्मान का परिणाम नहीं है। यह एक व्यावहारिक निष्कर्ष है- इंटरनेट सूचना से भरा हो सकता है, लेकिन बेहतर एआई बनाने के लिए सूचना से अधिक भरोसेमंद ज्ञान चाहिए। यहीं से एंथ्रोपिक की कहानी शुरू होती है और यह कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही असहज भी।
एंथ्रोपिक का मामला इतिहास में केवल एक कॉपीराइट मुकदमे या 1.5 अरब डॉलर के समझौते के रूप में दर्ज नहीं होगा। उसने इससे कहीं बड़े सवाल सामने रखे हैं- इंटरनेट की असीमित सूचना के बावजूद किताबें अब भी क्यों अनिवार्य हैं, ज्ञान का भविष्य किसके हाथ में होगा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में सार्वजनिक ज्ञान-संपदा की रक्षा कैसे की जाएगी? संभव है कि आने वाले वर्षों में मशीनें मनुष्यों से बेहतर लिखने लगें, लेकिन वे किस तरह सोचेंगी, इसकी बुनियाद अब भी उन किताबों में रखी जा रही है, जिन्हें मशीनों ने नहीं, मनुष्यों ने लिखा है। शायद एआई युग का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि भविष्य की सबसे बुद्धिमान मशीनें अतीत के सबसे धैर्यवान लेखकों की शिष्य बन रही हैं।
नालंदा से अलेक्ज़ेंड्रिया और बगदाद के बैतअल-हिक्मा तक इतिहास हमें बार-बार याद दिलाता है कि किताबों का नष्ट होना केवल कागज़ का नष्ट होना नहीं है; यह सभ्यता की स्मृति पर प्रहार है। आज हम किसी किताब को स्कैन करके उसके हर शब्द को डिजिटल रूप में सुरक्षित कर सकते हैं और फिर उसकी मूल प्रति नष्ट कर सकते हैं, लेकिन क्या डिजिटल प्रति उस किताब का पूरा जीवन बचा सकती है?
किताब की गंध, उसका स्पर्श, पन्नों पर किसी पुराने पाठक की पेंसिल से खींची गई रेखा, किनारे पर लिखा कोई छोटा-सा नोट और उसे वर्षों तक अपनी अलमारी में संभालकर रखने का एहसास- इनमें से कुछ भी डेटा में पूरी तरह दर्ज नहीं होता। डिजिटल प्रति ज्ञान को संरक्षित कर सकती है, लेकिन मूल किताब उस ज्ञान से जुड़ी मानवीय स्मृति को भी अपने भीतर बचाए रखती है, इसलिए एआई को किताबें देने से पहले हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि किताबें मनुष्यों के लिए भी बची रहें। ज्ञान को डिजिटल बनाना उसका संरक्षण हो सकता है, लेकिन उसे निजी डिजिटल भंडारों तक सीमित कर देना संरक्षण नहीं, स्वामित्व का नया रूप भी बन सकता है।
आख़िरकार, आने वाली पीढ़ियों के लिए हमें ऐसी दुनिया नहीं छोड़नी चाहिए, जहां मशीनों के पास हमारा पूरा अतीत हो और मनुष्यों के पास उसका सिर्फ़ डेटा। किताबें मशीनों को सिखाने के लिए बचाना पर्याप्त नहीं है; उन्हें मनुष्यों को याद रखने के लिए भी बचाना होगा। एक गंभीर पुस्तक का मूल्य केवल उसके तथ्यों में नहीं होता। उसका वास्तविक मूल्य उसकी बौद्धिक संरचना में होता है— किसी विषय की शुरुआत कहां से करनी है, कौन-सी अवधारणा पहले समझनी है, किस तर्क के बाद कौन-सा तर्क स्वाभाविक रूप से आता है और किन प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है। अच्छी पुस्तक केवल अपना निष्कर्ष नहीं देती; वह अक्सर विरोधी तर्कों से भी संवाद करती है और फिर अपना पक्ष स्थापित करती है। यही बौद्धिक अनुशासन उसे सामान्य इंटरनेट सामग्री से अलग बनाता है।
पिछले कुछ वर्षों में एक और बदलाव ने इस चुनौती को गंभीर बना दिया है। आज प्रकाशित नई सामग्री का एक बड़ा हिस्सा एआई की मदद से तैयार किया जा रहा है। ऐसे में अगली पीढ़ी के एआई मॉडल यदि मुख्यतः इसी सामग्री से सीखेंगे, तो वे धीरे-धीरे मशीनों द्वारा लिखी गई सामग्री के पैटर्न सीखने लगेंगे। तकनीकी जगत में इसे केवल कॉपीराइट का नहीं, बल्कि ज्ञान की गुणवत्ता के संकट के रूप में भी देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में मॉडल को लैप्सजैसी आशंकाओं की चर्चा होती है— यानी ऐसी स्थिति, जब मशीनें बार-बार मशीनों से सीखकर अपनी गुणवत्ता खोने लगें। ऐसे समय में जनरेटिव एआई के व्यापक प्रसार से पहले लिखा गया साहित्य विशेष महत्व हासिल कर लेता है।
अमेरिकी अदालत में सामने आए दस्तावेज़ों से पता चला कि कंपनी ने बड़ी संख्या में मुद्रित पुस्तकें खरीदकर उन्हें स्कैन किया और डिजिटल रूप में बदला। इस परियोजना को आंतरिक रूप से प्रोजेक्ट पनामा नाम दिया गया था। स्कैनिंग की प्रक्रिया खुद विनाशकारी थी- हाइड्रॉलिक कटर से हर किताब की जिल्द काटी जाती, हाई-स्पीड स्कैनर हर पन्ना डिजिटल करता और उसके बाद कागज़ रिसायकल हो जाता। भौतिक किताब हमेशा के लिए मिट जाती, सिर्फ़ उसकी डिजिटल प्रति बचती। यानी एक किताब को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया गया। अदालत ने खरीदी गई मुद्रित पुस्तकों के इस परिवर्तनकारी डिजिटल रूपांतरण को फेयर यूज माना, क्योंकि यह बाज़ार में नई प्रतियां उपलब्ध कराने का मामला नहीं था।
यही मुकदमा एक दूसरी सच्चाई भी लेकर आया, जिसे अपेक्षाकृत कम चर्चा मिली। सुनवाई में सामने आया कि एंथ्रोपिक ने सत्तर लाख से अधिक किताबें पायरेट वेबसाइटों से भी हासिल की थीं, जबकि उन्हें वैध रूप से खरीदने का विकल्प मौजूद था। अदालत ने इसे गैरकानूनी माना और बाद की कानूनी प्रक्रिया में लगभग साढ़े चार लाख कृतियों से जुड़े 1.5 अरब डॉलर के समझौते को मंजूरी मिली। इससे स्पष्ट हो गया कि अदालत ने खरीदी गई पुस्तकों की स्कैनिंग और पायरेटेड पुस्तकों के उपयोग— इन दोनों को अलग-अलग कानूनी प्रश्न माना।
यहीं से यह कहानी केवल कॉपीराइट विवाद नहीं रह जाती। असली प्रश्न यह नहीं है कि एंथ्रोपिक ने किताबें कैसे हासिल कीं; असली प्रश्न यह है कि उसे इतनी बड़ी संख्या में किताबों की ज़रूरत क्यों पड़ी? पहली नज़र में उत्तर आसान लगता है—किताबें अधिक विश्वसनीय होती हैं, लेकिन बात इससे कहीं गहरी है। यदि केवल विश्वसनीयता ही कारण होती, तो शोध-पत्र, सरकारी दस्तावेज़ और प्रमाणित वेबसाइटें पर्याप्त होतीं। फिर एआई कंपनियां लाखों किताबों के पीछे क्यों जातीं?
