संपादकीय : सिर्फ समिति काफी नहीं

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छात्रों के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की कथित ज्यादतियों की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय का उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित करने का निर्णय स्वागत योग्य है। इसने प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज, आंसू गैस, पैलेट गन के इस्तेमाल, सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की भूमिका और महिलाओं से बदसलूकी जैसे आरोपों के लिए पुलिस की जवाबदेही को कठघरे में खड़ा किया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन आरोपों को स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त मानने के बाद अब समिति की विश्वसनीयता उसकी अंतिम संरचना से निर्धारित होगी। निष्पक्षता सदस्यों के पदनाम से नहीं, जांच की स्वतंत्रता, कार्यप्रणाली और निष्कर्षों को सार्वजनिक करने की पारदर्शिता से सिद्ध होगी। 

जिस पुलिस तंत्र के विरुद्ध आरोप हैं, उसके अपने अभिलेख महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं, लेकिन उन्हें अंतिम सत्य मानना जांच की विश्वसनीयता को कमजोर करेगा। सीसीटीवी, ड्रोन, बॉडी-कैमरा, वायरलेस संचार और पीसीआर रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का न्यायालय का निर्देश अत्यंत महत्वपूर्ण है। वीडियो फुटेज घटनाओं को आरोप-प्रत्यारोप से निकालकर वस्तुनिष्ठ साक्ष्य में बदल सकते हैं। खासकर यह पता लगाने में कि किस समय भीड़ हिंसक हुई, पुलिस ने कब और कितना बल प्रयोग किया तथा भीड़ तितर-बितर होने के बाद भी बल प्रयोग जारी रहा या नहीं, दृश्य प्रमाण निर्णायक होंगे। दिल्ली पुलिस का यह दावा कि प्रदर्शन में लगभग तीन हजार आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के साथ 47 हिस्ट्री शीटर मौजूद थे, जांच का महत्वपूर्ण पक्ष है। पुलिस के लिए यह अपने आप में बचाव नहीं हो सकता। यदि अपराधी तत्व आंदोलन में घुस आए थे तो सवाल यह भी होगा कि इतनी भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद वे वहां कैसे पहुंचे।

पैलेट गन का मामला विशेष गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही इनके इस्तेमाल के नियम और एसओपी मंगाकर इस विषय को व्यापक संवैधानिक प्रश्न से जोड़ चुका है तथा रैपिड एक्शन फोर्स के इस्तेमाल किए गए गोला-बारूद का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने को कहा है, इसलिए जांच को केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि पैलेट चले या नहीं; यह भी सामने आना चाहिए कि किस परिस्थिति में, किस अधिकारी के आदेश पर और किस नियम के तहत उनका इस्तेमाल हुआ। सादे कपड़ों में लाठी चलाने या पत्थरबाजी करने, महिलाओं से बदसलूकी करने वाले लोगों की पहचान भी जांच की अग्निपरीक्षा होगी। यदि वे पुलिसकर्मी थे तो उनकी पहचान, आदेश-श्रृंखला और भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए; यदि वे पुलिस से बाहर के लोग थे, तो पुलिस की मौजूदगी में उनकी गतिविधि रोकने में विफलता का जवाब भी देना होगा। मामला केवल 20 जुलाई की घटना का नहीं है। 

छात्र आंदोलन अभी और होंगे; सरकारें बदलेंगी, मुद्दे बदलेंगे, लेकिन नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार और पुलिस का कानून सम्मत ढंग से भीड़ नियंत्रित करने का दायित्व स्थायी रहेंगे. इसलिए समिति की सबसे बड़ी सफलता दोषी पुलिसकर्मियों या प्रदर्शनकारियों की पहचान भर नहीं, बल्कि ऐसी स्पष्ट राष्ट्रीय व्यवस्था की सिफारिश होगी, जिसमें हिंसक तत्वों से कठोरता और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से संयम- दोनों साथ चलें। न्याय का असली अर्थ यही है कि राज्य की शक्ति भी कानून के अधीन रहे और नागरिकों की स्वतंत्रता भी कानून की सीमा में सुरक्षित रहे।

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