ज्ञान एवं नैतिक मूल्यों की स्रोत संस्कृत
णिनि व्याकरण के अनुसार सम् उपसर्ग पूर्वक कृ धातु में क्त प्रत्यय के योग से संस्कृत शब्द की सिद्धि होती है अर्थात् ऐसा शब्द या ऐसी भाषा जो दोष रहित, संस्कारित, परिमार्जित, परिनिष्ठित, सुव्यवस्थित तथा वैज्ञानिक हो। संस्कृत भाषा दैवी वाक् होने से देवभाषा के नाम से भी लोकप्रसिद्ध है। इसका व्याकरण तर्कपूर्ण, व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक होने से, लोक कल्याण कारक सत्साहित्य एवं गूढ़ दर्शन शास्त्रों के होने से यह विश्व की सभी भाषाओं में श्रेष्ठ स्थान पर विराजित है और भारोपीय भाषा परिवार की भाषाओं में संस्कृत का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है।
प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत श्रावणी पूर्णिमा, रक्षाबंधन पर्व के दिन से नव शैक्षिक सत्र एवं वेदाध्ययन प्रारंभ होता था। इसी कारण इस दिन को सन् 1969 से तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में संपूर्ण भारत में संस्कृत दिवस मनाए जाने का आदेश किया गया, जो आज विश्व संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा है। 15 अक्टूबर 1970 में ही इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही संस्कृत सहित राजभाषा हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार निमित्त भारत में स्थापित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम् वर्तमान में बहुपरिसरीय केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ ही संस्कृत भारती संगठन के प्रसार-प्रचार से यह दिवस भारत सहित जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, लंदन सहित कई पाश्चात्य देशों में भी आयोजित हो रहा है। इसी दौरान संस्कृत सप्ताह भी आयोजित होता, जिसमें संस्कृत परक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगितायें आयोजित होती हैं।
वर्तमान की राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय तथा वैश्विक समस्याओं के निदान में संस्कृत भाषा एवं इसका साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान-नैतिक परंपरा को समझने, कर्तव्यबोध को बढ़ाने, भौतिक-खगोलशास्त्र, उच्च प्रबंधन एवं मानव शरीर विज्ञानाच्छादित योग को सीखने समझने में वेदोपनिषद् -ब्राह्मण- आरण्यण, चरक-सुश्रुत रचित आयुर्वेद ग्रंथ, गीत-संगीत-नृत्य-नाकट विधा, चाणक्य एवं भर्तृहरि जैसे नीतिज्ञों की नीति, जीवन मार्गदर्शक श्रीमद्भगवद्गीता सहित भारतीय षड्दर्शनों की मूल आधार भूत संस्कृत भाषा ही है। संस्कृत भाषा ज्ञान के बिना मूलतः उक्त को समझाना संभव नहीं है। विश्व प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण, महर्षि वेदव्यास कृत महाभारत-पुराणादि अमर कृतियों की भाषा भी संस्कृत ही रही है।
सर्वे भवंतु सुखिन:, वसुधैव कुटुंबकम्, स्वस्तिपन्थामनुचरेम, मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन, कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:, न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते, श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्, माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:, समानो मन्त्र: समिति: समानी,सह नाववतु सह नौ भुनक्तु, मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, स्वाध्यायान्मा प्रमद:, असतो मा सद्गमय, दशपुत्रसमो द्रुम:, शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्, आचार: परमो धर्म:, सा विद्या या विमुक्तये आदि अगणित लोक मांगलिक- नैतिक-चारित्रिक और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विभिन्न समसामयिक समस्याओं के निदान एवं उच्च आदर्श- उदात्त भावना से युक्त शिक्षा संस्कृतभाषा में लिखे विविधात्मक सत्साहित्य दर्शनों में प्रतिपग पर प्राप्त होती है और सर्वोत्कृष्ट व्यवस्थित पाणिनि व्याकरण होने से नासा के वैज्ञानिकों ने संस्कृत भाषा को कम्प्यूटर की सर्वोत्तम भाषा के रूप में स्वीकार किया है यह सर्वविदित है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत भाषा में निहित सर्वविध ज्ञान-विज्ञान को विद्यालयीय- महाविद्यालयीय- विश्वविद्यालयीय पाठ्य-पुस्तकों से बाहर लाकर केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के द्वारा लोककल्याण के निमित्त अपनी नीति, कार्यक्रमों एवं आचरणों से समाज में लाने के लिए नितांत प्रयास किए जाने आवश्यकीय हैं। विशेष रूप से भारत में प्रतिदिन निजस्वार्थपूर्ति, स्वकर्तव्य विमुखता, भ्रष्टाचार, अपराध, पर्यावरण क्षरण, तापमान वृद्धि, राजनैतिक तुष्टिकरण, धार्मिक उन्माद- कट्टरवाद, जातिगत विभेद, आर्थिक असमानतायें आदि नि:संदेह बढ़ रहे हैं, जबकि देश में उपाधिधारक शिक्षितों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ने में ही है। यह संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य विचारणीय विषय होना चाहिए कि देश में साक्षरता बढ़ने पर सामाजिक समस्याएं बढ़ने का क्या कारण हैं?
वस्तुत: पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के प्रभाव से भारत में केवल आजीविका प्राप्ति की शिक्षा देने के लिए ही वर्तमान में प्रयास किए जाते रहे हैं जिस कारण देश में घटित हो रही पारिवारिक-सामाजिक- राष्ट्रीय समस्याओं को अनुभव किया जा सकता है। नई शिक्षा नीति- 2023 के द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के द्वारा देश में संस्कृत - संस्कृति, प्राचीन ज्ञान परंपरा, विरासत, नैतिक-चारित्रिक शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने की अनुशंसा एवं नियम किए गए हैं, जो स्वागत योग्य कदम हैं।
आज समसामयिक समस्याओं के निवारण के लिए आत्मिक रूप से संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में इस भाषा के व्यापक महत्व को सभी को समझते हुए आत्मसात् करने की आवश्यकता है। विकसित भारत बनाने में संस्कृत एक महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है तथा सरकारी सहित निजी शैक्षिक संस्थाओं में इस भाषा के सत्साहित्य को पढ़ने के लिए व्यवस्थाएं बनाना वर्तमान की आवश्यकता अनुभूत होती है, जिसमें केवल आजीविका प्राप्ति उद्देश्य न होकर समग्र व्यक्तित्व निर्माण उद्देश्य होना चाहिए, जिसमें शिक्षा प्रदाता भी उच्च नैतिक मूल्यों से युक्त होकर ‘इदं राष्ट्राय इदं न मम’ की भावना से भावी पीढ़ी का चरित्र निर्माण कर सकें इसी में लोकमंगल है इसी से विश्व कल्याण संभव है।
