‘मजबूत स्कूल’ से ही होगा मजबूत भारत का निर्माण

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शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता आज भी एक गंभीर चिंता का विषय है। अनेक बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने, लिखने और सामान्य गणितीय समस्याओं को हल करने में कठिनाई महसूस करते हैं।

आकाश सपेलकर
आकाश सपेलकर,
वकील, सुप्रीम कोर्ट

भारत में शिक्षा व्यवस्था देश के भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण नींव है। आज करोड़ों बच्चे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और पिछले वर्षों में स्कूलों में बिजली, शौचालय, इंटरनेट, कंप्यूटर तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसके बावजूद शिक्षा की वास्तविक गुणवत्ता आज भी एक गंभीर चिंता का विषय है। अनेक बच्चों का स्कूल में नामांकन तो हो जाता है, लेकिन वे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने, लिखने और सामान्य गणितीय समस्याओं को हल करने में कठिनाई महसूस करते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता का अंतर भी स्पष्ट दिखाई देता है। अनेक सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल सुविधाएं और आधुनिक शिक्षण संसाधनों की कमी है। 

दूसरी ओर, कई निजी विद्यालयों में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद शिक्षा अत्यधिक परीक्षा और अंकों पर केंद्रित है। ऐसे में आज देश के सामने चुनौती केवल प्रत्येक बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि स्कूल पहुंचने वाला प्रत्येक बच्चा वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो। दुनिया के कई देशों ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है और भारत उनके अनुभवों से महत्वपूर्ण सीख ले सकता है। 

फिनलैंड में शिक्षक को उच्च प्रशिक्षित और सम्मानित पेशेवर माना जाता है तथा बच्चों में रटने के बजाय समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जाता है। जापान की शिक्षा व्यवस्था अनुशासन, जिम्मेदारी, स्वच्छता और सामूहिक कार्य की भावना के लिए जानी जाती है। सिंगापुर ने शिक्षक प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम और शिक्षा को रोजगार की बदलती आवश्यकताओं से जोड़कर प्रभावी मॉडल विकसित किया है। 

भारत में इन देशों की पूरी शिक्षा व्यवस्था को हूबहू लागू करना संभव नहीं है, क्योंकि भारत की जनसंख्या, सामाजिक विविधता, आर्थिक परिस्थितियां और क्षेत्रीय आवश्यकताएं अलग हैं। फिर भी इनके मूल सिद्धांत भारत के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं। भारत में शिक्षक को केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण पेशेवर के रूप में देखा जाना चाहिए। शिक्षक भर्ती में गुणवत्ता, निरंतर प्रशिक्षण, कक्षा में प्रदर्शन का मूल्यांकन और शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम करना शिक्षा सुधार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

सरकार को शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए सबसे पहले लर्निंग आउटकम अर्थात वास्तविक सीखने के परिणाम को केंद्र में रखना होगा। प्रत्येक स्कूल का वार्षिक एजूकेशन रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की पढ़ने-लिखने और गणितीय क्षमता, शिक्षक उपलब्धता, उपस्थिति, ड्रापआउट रेट, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल, इंटरनेट, स्वच्छता और विद्यार्थियों की सुरक्षा जैसे मानकों को भी शामिल किया जाए। जो विद्यार्थी अपनी कक्षा के स्तर से पीछे हैं, उनके लिए विशेष रेमिडायल क्लासेज और लर्निंग रिकवरी प्रोग्राम्स चलाए जाने चाहिए। प्रत्येक स्कूल में पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला, खेल और कला जैसी गतिविधियों को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। 

परीक्षा प्रणाली में भी बदलाव की आवश्यकता है। बच्चों को केवल रटने और अधिक अंक प्राप्त करने के लिए तैयार करने के बजाय क्रिटिकल थिंकिंग, कम्यूनिकेशन स्किल्स, प्रोजेक्ट वर्क, क्रियेटिविटी और प्रैक्टिकल प्रॉब्लम सॉल्विंग को महत्व दिया जाना चाहिए। एआई और डिजिटल टेक्नोलॉजी का उपयोग विद्यार्थियों को उनकी क्षमता और आवश्यकता के अनुसार शिक्षा देने तथा शिक्षकों की सहायता के लिए किया जा सकता है, लेकिन तकनीक को शिक्षक का विकल्प नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके साथ वोकेशनल एजूकेशन, फाइनेंशियल लिट्रेसी, साइबर सेफ्टी, एंटरपेन्योरशिप और जीवन कौशल को भी बच्चों की उम्र और आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम में शामिल करना समय की मांग है।

माता-पिता को बच्चों पर केवल अधिक अंक प्राप्त करने का दबाव डालने के बजाय उन्हें पढ़ने, खेलने, रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने और प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। सरकार को शिक्षा पर होने वाले खर्च को केवल सरकारी व्यय नहीं बल्कि मानव पूंजी में निवेश के रूप में देखना होगा। ग्रामीण और शहरी विद्यालयों के बीच सुविधाओं तथा शिक्षण गुणवत्ता के अंतर को कम करना, योग्य शिक्षकों को आकर्षित करना, स्कूलों में काउंसलर्स की व्यवस्था करना और प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित, समान एवं सकारात्मक लर्निंग इन्वायरमेंट उपलब्ध कराना आवश्यक है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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