संपादकीय : प्रतिभा चुंबक की चाह
चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सफल लैंडिंग की तीसरी वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनियां दुनिया की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाओं को भारत की ओर आकर्षित करने का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती हैं, उत्साहवर्धक राजनीतिक वक्तव्य के अलावा भारतीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र की ठोस बुनियाद बताने वाला बयान भी है। अलग तथ्य है कि इस संभावना को वास्तविक वैश्विक शक्ति बनाने के लिए अभी कई कठिन पड़ाव पार करने होंगे। 2020 के अंतरिक्ष सुधारों और 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने इस क्षेत्र को सरकारी एकाधिकार से निकालकर सार्वजनिक-निजी साझेदारी की दिशा में मोड़ा तो आज देश में लगभग 440 स्पेस-टेक स्टार्टअप पंजीकृत हैं और निजी कंपनियों को 113 प्राधिकरण मिल चुके हैं।
जून 2026 तक इन-स्पेस ने 4,500 से अधिक संगठनों को पंजीकृत किया था। यह संख्या बताती है कि भारत में अब केवल इसरो नहीं, बल्कि रॉकेट, उपग्रह, प्रणोदन, पृथ्वी-अवलोकन, अंतरिक्ष-स्थितिजन्य जागरूकता और अंतरिक्ष-आधारित डेटा जैसे पूरे मूल्य-शृंखला में निजी क्षमता भी बन चुकी है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि भारतीय कंपनियां अब केवल इसरो की सहायक नहीं रह गईं। भारत से निजी कंपनी द्वारा विक्रम-1 का पहला सफल कक्षीय प्रक्षेपण इस बदलाव को प्रतीकात्मक और व्यावहारिक प्रमाण बना।
कुछ निजी अंतरिक्ष कंपनियों की सेवाओं का वैश्विक बाजार बन रहा है। अर्थात भारतीय कंपनियां केवल विदेशी पूंजी नहीं ला रहीं, वे विदेशी बाजारों में भी जा रही हैं। भारतीय स्पेस-टेक कंपनियां करोड़ों डॉलर कमा रही हैं फिर भी वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी अभी तीन फीसद भी नहीं। सरकार इसे 2040 तक दस प्रतिशत तक पहुंचाने का दावा करती है। यह तभी संभव है जब भारत केवल ‘सस्ता प्रक्षेपण’ बेचने के बजाय उपग्रह-सेवा, अंतरिक्ष-डेटा, एनालिटिक्स और पूर्ण समाधान बेचने लगे। लागत-दक्षता, इंजीनियरिंग प्रतिभा और अपेक्षाकृत कम लागत में जटिल तकनीक विकसित करने की क्षमता से हमारे लिए यह नितांत संभव है, पर कुछ समस्यायें भी हैं। डीप-टेक कंपनियों को त्वरित स्टार्टअप पूंजी नहीं, वर्षों तक धैर्य रखने वाली जोखिम-पूंजी चाहिए।
सरकार ने 1,000 करोड़ रुपये के वेंचर कैपिटल फंड सहित कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन 31 जुलाई तक विभिन्न योजनाओं के कुल 2,140 करोड़ रुपये के प्रावधान में लगभग 200 करोड़ रुपये ही वितरित हुए थे। साफ है कि घोषणा से अधिक महत्वपूर्ण पूंजी की समयबद्ध उपलब्धता है। इसी तरह रॉकेट इंजन, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, विशेष मिश्रधातु और अन्य स्पेस-ग्रेड घटकों की घरेलू आपूर्ति-श्रृंखला मजबूत करनी होगी। वैश्विक ग्राहकों के बीच भरोसा केवल कम कीमत से नहीं बनता, समय पर प्रक्षेपण, गुणवत्ता, साइबर सुरक्षा, बीमा, डेटा-नियम और लगातार सेवा भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका, यूरोप और चीन के सामने भारतीय कंपनियों को कीमत के साथ गुणवत्ता और विश्वसनीयता की भी परीक्षा देनी होगी।
सरकार का भरपूर समर्थन जायज है, लेकिन इतना नहीं कि निजी कंपनियां स्थायी संरक्षण पर निर्भर हो जाएं और इसरो अपने क्षेत्र में बीएसएनएल जैसी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति में पहुंच जाए। भारत के पास अब प्रतिभा, लागत-दक्षता, सार्वजनिक संस्थागत अनुभव और उभरती निजी उद्यमशीलता-चारों मौजूद हैं। यदि कुछ अड़चनों पर पार पाया जा सके, तो भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र सचमुच वैश्विक प्रतिभा का ‘चुंबक’ बन सकेगा।
