अनोखी परंपरा : जब पीटी जाती हैं गुड़ियां

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
On

सावन के महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पूजन की परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है, जिसे नाग पंचमी भी कहते हैं। नाग पूजन की परंपरा, तो प्रकृति में नागों का संरक्षण है। नाग और सांप किसानों के खेतों के चूहे खाते हैं और बिना छेड़छाड़ किए काटते नहीं है। भगवान शिव ने कंठ में विष धारण किया हुआ है इसी कारण उनके कंठ में नाग लिपटे रहते हैं भगवान शिव के साथ नागों की पूजा की जाती है।  नाग पंचमी के दिन उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर कपड़े की बनी गुड़िया पीटी जाती है। इस परंपरा पर अब बदलाव होना चाहिए। 

कई स्थानों पर तो अब महिलाओं ने इसका विरोध किया है और गुड़िया पीटने की जगह गुड़िया को झूले में झुलाया जाता है। घर के फटे पुराने कपड़ों से एक लड़की की गुड़िया बनाई जाती है। नाग पंचमी के दिन अखाड़ा कूदने के बाद गांव की लड़कियां खुले में कपड़े की बनी गुड़ियां डालती हैं और युवक/ पुरुष उन्हें ने लाठी-डंडों से  पीटते हैं। इसकी कहानी भी तक्षक नाग से जुड़ी हुई है, जिसने परीक्षित को डस लिया था और राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। दूसरी कहानी एक राजा से जुड़ी हुई है और तीसरी कहानी जनमानस की आम आदमी की समाज की कहानी है।

किसी गांव में एक लड़की अपने भाई को नाग से बचाने के लिए नाग को डंडे से पीटकर मार डालती है। बाद में पता चलता है कि नाग तो लड़की के भाई का रक्षक है। तब से लड़की को कपड़े की गुड़िया बनाकर उसकी गलती के लिए पीटा जाता है। गुड़िया पीटने की जो भी कहानियां मिलती हैं, उसमें लड़की की गलती बताकर उसको सरेआम बेइज्जत करने की परंपरा अब सभ्य समाज में उचित नहीं है। इसी कारण उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में महिलाएं आगे आई और गुड़िया पीटने की जगह नागपंचमी को गुड़िया को झूला झुलाने की परंपरा शुरू की है। गुड़िया , बालिका / बहन और स्त्री का प्रतीक है।  पुरानी परंपराएं जो आज ठीक नहीं समझी जाती हैं उन्हें बदल देना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर नाग पंचमी के दिन घरों में गाय के गोबर से नाग- नागिन देवता बनाए जाते हैं। उन्होंने उबले हुए चने उबले हुए गेहूं के दानों का भोग लगाया जाता है इसे अवधी में कोहरी कहते हैं। पकवान भी बनाए जाते हैं। नदी तालाब में स्नान करने के बाद शाम को कई स्थानों पर पहलवानों के दंगल भी लगते हैं। नाग पंचमी से ही कुश्ती की प्रतियोगिताएं भी शुरू होती हैं जिसे अखाड़ा बोलते हैं। इसी दिन से अखाड़े की मिट्टी में गेहूं बोए जाते हैं, जिन्हें कजरिया/ सुजिया कहते हैं। इससे यह पता चलता है कि किसानों ने जो गेहूं का बीज रख छोड़ा है, उसमें बीज बनकर उगने की क्षमता है कि नहीं। इसमें बहनें अपने भाइयों के कान में लगाती हैं। फिर रक्षाबंधन के साथ सावन माह का समापन हो जाता है। सावन भगवान की शिव की पूजा का पर्व है तो भादौं विष्णु और भगवान श्री कृष्ण की पूजन का मास है। अष्टमी को भगवान श्री कृष्ण का आधी रात को जन्म होता है।