व्यक्ति जैसे होंगे वैसा ही समाज बनेगा
आधुनिक वातावरण में पनप रहे परिवारों में आए दिन खींचतान, आपाधापी, द्वेष-दुर्भाव का विकृत वातावरण बना रहता है। परिणामतः उस घुटन में जो भी रहते-पलते हैं, दुर्बुद्धि ग्रसित होते जाते हैं। यदि इस स्थिति को बदला जा सके और परिवार की इस पाठशाला में सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों के आधार पर दैनिक कार्य-व्यवहार का ढांचा खड़ा किया जा सके, तो घर का हर व्यक्ति श्रमशीलता, स्वच्छता, मधुरता, मितव्ययिता, सहायता और ईमानदारी जैसे सद्गुणों को अपनाता और पनपता चला जाएगा।
परिवारों की नर्सरी में ठीक तरह उगाया गया पौधा जिस बगीचे में भी लगेगा, जहां भी फलेगा-फूलेगा, अपने सुंदर फूलों और मधुर फलों से वातावरण को सुखद बनाएगा। परिवारों का सृजन और संचालन अध्यात्म दृष्टिकोण अपनाकर किया जाए, तो उसमें सद्भावना हिलोरें ले रही होंगी और परंपराएं पनप रही होंगी। किंतु यदि वासना के लिए विवाह, मोह के लिए संतान, लोभ के लिए उपार्जन और अहंकार का आधिपत्य चरितार्थ किया जा रहा होगा, तो प्रत्येक घर में नारकीय वातावरण ही बना रहेगा।
आत्मचिंतन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारदीवारों पर आत्मिक प्रगति का भवन खड़ा होता है। हवाई किला बनाकर कल्पना की उड़ानें तो भरी जा सकती हैं, पर मजबूत महल बनाना है, तो जमीन पर सुदृढ़ आधारशिला रखनी होगी। ईश्वरीय अनुग्रह की अमृत वर्षा सर्वत्र अनवरत रूप में होती रहती है। साधना का उद्देश्य आत्मशोधन है। दुष्कर्म से स्थूल शरीर, दुर्बुद्धि से सूक्ष्म शरीर और दुर्भावों से समूचे व्यक्तित्व में विकृतियां भर जाती हैं। कठोर चट्टान पर अनवरत वर्षा होते हुए भी हरियाली उत्पन्न नहीं होती।
बादलों से अनुरोध करना व्यर्थ है, चट्टान को ही कोमल रेत में बदलना पड़ेगा। सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व पाने वाला मनुष्य इस धरती को स्वर्ग बना सकने की संभावनाओं से पूरी तरह सुसज्जित है। यहां निर्वाह ही नहीं, आनंद और उल्लास के साधन भी पग-पग पर उपलब्ध हैं। फिर भी मनुष्य अनेक ऐसी गुत्थियों में जकड़ा है, जो सुलझने का नाम नहीं लेतीं। सिंह-व्याघ्र, सांप-बिच्छू और प्रकृति-प्रकोप के भय को समझा जा सकता है, पर मनुष्य ही मनुष्य के शोषण और आतंक का कारण बने, यह स्थिति भयावह है।
हमें समझना होगा कि समाज की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, व्यक्तियों का समूह ही समाज है। व्यक्ति जैसे होंगे, वैसा ही समाज बनेगा। वैयक्तिक समस्याएं ही इकट्ठी होकर सामाजिक समस्याएं बन जाती हैं। स्वाभाविक स्नेह-सद्भाव घट जाने से संयुक्त परिवार प्रणाली का आनंद खो गया है। दांपत्य जीवन को कृत्रिम आकर्षणों के सहारे मधुर बनाने के प्रयोग असफल हो रहे हैं और परिवार संस्था टूट रही है। संतान और अभिभावकों के बीच स्नेह-श्रद्धा के सूत्र भी दुर्बल पड़ गए हैं। परिवार में यदि परस्पर सहयोग, विश्वास और आत्मीयता का वातावरण बने, तो छोटी-छोटी कठिनाइयां भी सहजता से दूर की जा सकती हैं।
घर के बड़े अपने आचरण से बच्चों को जो संस्कार देते हैं, वही आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और व्यवहार की आधारशिला बनते हैं। धन-संपत्ति एक प्रकार की आग है, जिसे अध्यात्मवाद के चिमटे से ही पकड़ा जाना चाहिए। वासना, तृष्णा, लोभ-मोह और संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा व्यक्ति साधन-संपन्न होकर भी अपनी उपलब्धियों का सदुपयोग नहीं कर सकेगा। ज्ञान-विज्ञान और उद्योग की दिशा में गगनचुंबी प्रगति हो रही है, किंतु आवश्यकता उस सद्भावना और दूरदर्शिता की भी है, जिसके सहारे इन उपलब्धियों का सदुपयोग किया जा सके। भौतिक साधनों की वृद्धि तभी सार्थक है, जब उनका उपयोग मानव कल्याण, सेवा और सामाजिक सुख-शान्ति के लिए किया जाए।
कमी साधनों की नहीं, कठिनाई एक ही है कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण की उपेक्षा की गई। अध्यात्म को व्याख्याओं में धूमिल कर दिया गया है। इसलिए आवश्यक है कि उसके वास्तविक स्वरूप से जनसाधारण को परिचित कराया जाए। सामाजिक सुख-शांति की धुरी आध्यात्मिकता ही है। उसे कहने-सुनने की विडंबना बनाकर नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन में उतारकर ही परिवार, समाज और राष्ट्र को स्वस्थ बनाया जा सकता है।
