फिंगरप्रिंट विज्ञान : भारतीय योगदान की वैश्विक उपेक्षा

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फिंगरप्रिंट विज्ञान की नींव भारत में रखी गई थी। दुनिया का पहला फिंगरप्रिंट ब्यूरो 1897 में कलकत्ता में स्थापित किया गया था।

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रमित शर्मा,
अपर पुलिस महानिदेशक,
बरेली ज़ोन

आज के दौर में अंगुलियों के निशान अपराध की जांच और पहचान में एक महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं। यह तकनीक किसी भी व्यक्ति की पहचान को अद्वितीय और सटीक रूप से प्रमाणित करने का अचूक साधन है, जिससे अपराधियों का पता लगाना और उन्हें न्याय के कटघरे में खड़ा करना आसान हो गया है। फिंगरप्रिंट प्रणाली ने पुलिस व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ आपराधिक न्याय प्रणाली में भी क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं। क्या आप जानते हैं कि फिंगरप्रिंट विज्ञान की नींव भारत में रखी गई थी? दुनिया का पहला फिंगरप्रिंट ब्यूरो 1897 में कलकत्ता में स्थापित किया गया था।

इस ब्यूरो की स्थापना बंगाल के आईजी लोअर प्रोविंस एडवर्ड रिचर्ड हेनरी ने, भारतीय सब-इंस्पेक्टर अज़ीज़ उल हक़ और हेम चंद्र बोस की सहायता से की थी। विश्व का दूसरा फिंगरप्रिंट ब्यूरो इलाहाबाद में खोला गया। पहले कलकत्ता और इलाहाबाद में ऐन्थ्रोपोमैट्रिक प्रणाली (जिसमें व्यक्ति की पहचान के लिए शारीरिक माप, जैसे ऊंचाई, सिर की परिधि, अंगुलियों की लंबाई आदि का उपयोग किया जाता है) पर आधारित प्रयोगशालाएं थीं, जिन्हें बाद में 1897 और 1898 में फिंगरप्रिंट ब्यूरो में परिवर्तित कर दिया गया।

यह वह दौर था जब दुनियाभर के वैज्ञानिक उंगलियों के निशानों को पहचान के प्रभावी माध्यम के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे थे। विदेशी लेखकों के अनुसार, डॉ. जोहान्स इवांजेलिस्टा पुर्किंजे ने सबसे पहले उंगलियों के निशानों के पैटर्न की पहचान की थी, जबकि विलियम जेम्स हर्शेल ने भारत में इसे कानूनी दस्तावेज़ों में लागू किया। हेनरी फॉल्ड्स और फ्रांसिस गाल्टन ने इस तकनीक को नया आयाम दिया, जबकि इवान वुसेटिच ने इसे अर्जेंटीना में आपराधिक जांच में इस्तेमाल किया। इन सभी का योगदान फिंगरप्रिंट प्रणाली को आपराधिक जांच का सबसे विश्वसनीय साधन बनाने में महत्वपूर्ण रहा है।

19 जून 1892 को अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स प्रांत के समुद्र तट पर स्थित शहर कोचिया में 27 वर्षीय महिला फ्रांसिस्का रोजास ने निर्दयता से अपने छह वर्षीय बेटे पोंसियानो और चार वर्षीय बेटी टेरेसा की हत्या कर दी थी। अपनी पहचान छुपाने के लिए फ्रांसिस्का रोजास ने खुद के गले पर काटने के निशान बनाकर, हत्याओं एवं खुद पर हमले का आरोप अपने पड़ोसी पेड्रो रामोन वेलाज़क्वेज़ पर लगा दिया था। ला प्लाटा (प्रांतीय राजधानी) से फिंगरप्रिंट विशेषज्ञ जुआन वुसेटिच से प्रशिक्षित सेंट्रल पुलिस के इंस्पेक्टर अल्वारेज़ को स्थानीय पुलिस की सहायता करने के लिए ने कोचिया भेजा गया। 

अल्वारेज़ ने घटना स्थल पर मिले फिंगरप्रिंट्स की मदद से रोजास को अपराधी साबित कर दिया। इस प्रकार, फ्रांसिस्का रोजास विश्व की पहली ऐसी अपराधी बनी, जिसे फिंगरप्रिंट साक्ष्य के आधार पर दोषी ठहराया गया। इसके बाद अर्जेंटीना पुरानी ऐन्थ्रोपोमैट्रिक प्रणाली को समाप्त करने वाला पहला देश बना। वुसेटिच ने इस घटना के बाद अपने फिंगरप्रिंट सिस्टम में और सुधार किया, जो बाद में ब्यूनस आयर्स प्रांत से होते हुए स्पेनिश भाषी देशों में व्यापक रूप से फैल गया।

अर्जेंटीना के बाद, फिंगरप्रिंट का पहला सफल उपयोग भारत में मई 1898 में बंगाल के जलपाईगुड़ी ज़िले में हुई हत्या के केस में किया गया। इस मामले में एक चाय बागान के मैनेजर की रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गई थी। मैनेजर का शव उसके पलंग पर गला कटा हुआ पाया गया और साथ ही उसके बक्से और तिजोरी को भी तोड़कर सैकड़ों रुपये चुरा लिए गए थे। इस हत्या के पीछे कई संदिग्ध थे, जिनमें मैनेजर से संबंध रखने वाली एक महिला के रिश्तेदार, पास में डेरा डाले हुए काबुलियों के गैंग और एक पूर्व नौकर शामिल थे, जिसे मैनेजर ने पहले चोरी के आरोप में जेल भिजवाया था।

हत्या की जांच के दौरान, खानसामे के कपड़ों पर खून के दाग मिले, लेकिन वह दावा करता रहा कि ये दाग उस पक्षी के खून के थे, जिसे उसने डिनर के लिए तैयार किया था। यह बात रासायनिक विश्लेषण में सही साबित हुई। दूसरी ओर, पूर्व नौकर, जिसे शक के घेरे में रखा गया था, को जेल से छूटने के बाद जलपाईगुड़ी ज़िले में किसी ने नहीं देखा था। जांच के दौरान, एक किताबनुमा कैलेंडर के कवर पर खून के दो हल्के धब्बे मिले, जो फिंगरप्रिंट के रूप में पहचाने गए।

जब इन अंगुलि चिन्हों की तुलना बंगाल पुलिस के सेंट्रल ऑफिस में स्थापित फिंगरप्रिंट ब्यूरो में संग्रहीत अपराधियों के फिंगरप्रिंट से की गई, तो इनमें से एक निशान पूर्व नौकर कंगाली चरण के दाहिने अंगूठे के निशान से मेल खा गया। इस आधार पर कंगाली चरण को चोरी का दोषी ठहराया गया, हालांकि हत्या के मामले में चश्मदीद गवाह न होने के कारण उसे हत्या का दोषी नहीं ठहराया गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी इस फैसले को सही ठहराया गया। एडवर्ड रिचर्ड हेनरी ने इस केस को सुलझाने में मदद की। यह भारत में फिंगरप्रिंट के माध्यम से अपराधी को दोषी ठहराने का पहला मामला था, लेकिन अदालतों द्वारा इस नई तकनीक पर संदेह के चलते केवल चोरी के आरोप में ही सजा दी गई।

प्राचीन भारत में अंगुलि चिन्ह (फिंगर प्रिंट) को विभिन्न शास्त्रों और पुराणों में विशेष महत्व दिया गया है। सामुद्रिक शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, रेखा शास्त्र, वृहत्संहिता, गार्गीय-ज्योतिष, सामुद्रिक तिलक, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता आदि में पुरुष लक्षणं और स्त्री लक्षणं, अंग विद्या, अंगुलि और हथेली पर रेखाओं का भविष्यवाणी एवं वंशावली के संदर्भ में उल्लेख किया गया है। अत्यंत रोचक तथ्य यह है कि सामुद्रिक शास्त्र तीन प्रकार के अंगुलि चिन्ह- शंख, चक्र और सीप का उल्लेख करता है। हजारों साल बाद, ब्रिटिश अधिकारी हेनरी ने भी फिंगरप्रिंट के तीन प्रकार– आर्च, लूप और ह्वॉर्ल की पहचान की, जो इस प्राचीन ज्ञान की अद्वितीयता को दर्शाता है। मध्यकालीन भारत में भी शाहजहां, औरंगज़ेब, राणा अमर सिंह सिसोदिया, महाराजा रंजीत सिंह आदि द्वारा शाही फरमानों पर हाथ की छाप लगाए जाने के प्रमाण मिलते हैं।

फिंगरप्रिन्ट की महत्ता सर्वव्यापी होने के बाद अपना योगदान दर्शाने के उद्देश्य से 1916 में विलियम जे॰हर्शेलने “द ऑरिजिन ऑफ फिंगरप्रिंटिंग” शीर्षक की किताब लिखी। इस किताब में हर्शेल ने लिखा कि 1858 में बंगाल के जंगीपुर सब-डिवीज़न मेंमैजिस्ट्रैट के रूप में तैनाती के दौरान उसने सड़क निर्माण का कान्ट्रैक्ट साइन करते समय राज्यधर कोनाई नामक व्यक्ति के हाथ की छाप को कान्ट्रैक्ट पर लगवाया था। प्राचीन भारतीय हस्तरेखा विज्ञान को श्रेय ना देने के उद्देश्य से वह अपनी किताब में भारतीयों पर अविश्वास जताते हैं और हस्तरेखा विज्ञान का मखौल उड़ाते हैं। हर्शेल अपनी किताब में चीनियों के द्वारा प्राचीन काल में अंगुलि चिन्ह के प्रयोग की भी बात करते हैं। 
विलियम जे॰ हर्शेल और एडवर्ड रिचर्ड हेनरी का हिंदुस्तान में तैनात होना और उनका फिंगरप्रिन्ट पर कार्य करना महज एक संयोग नहीं है। इन दोनों के द्वारा भारतीय विद्या से प्रेरित होकर भारतीयों की ही मदद से फिंगरप्रिंटिंग को शनाख्तकरने के वैज्ञानिक माध्यम के रूप में स्थापित कर खुद श्रेय लिया गया। साथ ही भारतीय विद्या एवं नागरिकों के योगदान को नकारा गया। 

बहरहाल, फिंगरप्रिन्ट का वर्गीकरण कर उसे पुलिस एवं न्यायालय में शनाख्त के एक ठोस वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में स्थापित करना 19वीं सदी के उत्तरार्ध में सबसे बड़ी चुनौती थी।जब इस दिशा में आई.जी. एडवर्ड हेनरी प्रयासरत थे, तो इस समस्या का समाधान दो भारतीय सब-इंस्पेक्टरों-अज़ीज़ उल हक और हेम चंद्र बोस- ने निकाला।इन दोनों द्वारा विकसित की गई वर्गीकरण तकनीक को हेनरी ने अपने सिस्टम के रूप में सरकार और विश्व के सामने प्रस्तुत किया।

फिंगरप्रिंटिंग की प्रणाली को सरकारी मान्यता तब मिली, जबहेनरी की रिपोर्ट के आधार पर, 29 मार्च 1897 को भारतीय सरकार ने फिंगरप्रिंट पहचान प्रणाली के मूल्यांकन के लिए एक समिति गठित की, जिसमें सी. स्ट्राहन, भारत के सर्वेयर जनरल, और एलेक्स पेडलर, प्रेसिडेंसी कॉलेज के प्रिंसिपल, शामिल थे। समिति ने फिंगरप्रिंटिंग प्रणाली को एंथ्रोपोमेट्रिक प्रणाली से बेहतर माना और इसे अपनाने की सिफारिश की।12 जून 1897 को, भारत के गवर्नर जनरल की परिषद ने स्ट्राहन और पेडलर समिति की रिपोर्ट को मंजूरी दी।इसके बाद, हेनरी ने 1900 में भारत सरकार के सहयोग से "क्लासिफिकेशन एंड यूज़ ऑफ़ फिंगरप्रिंट" शीर्षक से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाई, जिसे 1937 तक भारत सरकार ने कई बार पुनर्प्रकाशित किया।

भारतीय शोधकर्ताओं, विशेष रूप से जी.एस. सोधी और जसजीत कौर ने अभिलेखों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि सब-इंस्पेक्टर अज़ीज़ उल हक़ और हेम चंद्र बोस ने वास्तव में फिंगरप्रिंट वर्गीकरण की तकनीक विकसित की थी।इन दोनों को खान बहादुर और राय बहादुर की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।करीब 25 साल बाद, डी॰एस॰पी॰ बनने और रिटायरमेंट से पहले, अज़ीज़ उल हक ने अपने योगदान के बदले जागीर की मांग की। हालांकि जागीर नहीं मिली, लेकिन रिचर्ड हेनरी की यह स्वीकारोक्ति कि अज़ीज़ उल हक उनके अनुसंधान में प्रमुख सहायक थे, के बाद उन्हें 5,000 रुपये का मानदेय देने की घोषणा की गई। बाद में हेम चंद्र बोस को भी यही मानदेय देने की घोषणा की गई। रिचर्ड हेनरी ने पहले अज़ीज़ उल हक की मदद को अहम बताया और बाद में हेम चंद्र बोस के योगदान को सबसे महत्वपूर्ण माना।

हेम चंद्र बोस ने फिंगरप्रिंट के क्षेत्र में कई अन्य अहम योगदान दिए। उन्होंने टेलीग्राफ द्वारा फिंगरप्रिंट को शीघ्र भेजने के कोड और दस अंगुलियों के बजाय एक अंगुली के फिंगरप्रिंट वर्गीकरण की विधि का आविष्कार किया। उन्होंने दो प्रमुख किताबें लिखीं- “फिंगरप्रिंट कम्पैन्यन” और “हींट्स ऑन फिंगरप्रिंट्स विद अ टेलीग्राफिक कोड फॉर फिंगर इंप्रेशंस”। उनकी टेलीग्राफिक कोड पर आधारित पुस्तक 1916 में प्रकाशित हुई, और इसके पाँच साल बाद स्कॉटलैंड यार्ड के चीफ इंस्पेक्टर चार्ल्स स्टॉकले कॉलिन्स ने 1921 में “अ टेलीग्राफिक कोड फॉर फिंगरप्रिंट फॉर्मूली” प्रकाशित की। फिर भी, अंग्रेजों ने एक बार फिर हेम चंद्र बोस के साथ अन्याय करते हुए श्रेय कॉलिन्स को दे दिया।

कहा जाता है कि बंटवारे के बाद अज़ीज़ उल हक़ का परिवार पाकिस्तान चला गया, जबकि हेम चंद्र बोस के पौत्र बंगाल पुलिस में डीआईजी के पद से सेवानिवृत्त हुए। जे. बेरी ने अपनी किताब "एडवांसस इन फिंगरप्रिंट टेक्नॉलजी" में लिखा है कि एडवर्ड हेनरी ने चतुराई से अपने भारतीय सहयोगियों, खान बहादुर अज़ीज़ उल हक़ और राय बहादुर हेम चंद्र बोस द्वारा विकसित की गई वर्गीकरण प्रणाली को अपने नाम से प्रसिद्ध करवा लिया। कहा जाता है कि हक़ ने अपने करीबी लोगों से यह कहा था कि उन्होंने धैर्यपूर्वक हेनरी को यह प्रणाली समझाई, लेकिन हेनरी उसे पूरी तरह से समझ ही नहीं पाए। दोनों के योगदान को सरकारी पत्राचार में उलझा दिया गया, और मानद उपाधि व मानदेय की मात्र घोषणा कर उनके नाम से इस आविष्कार का श्रेय छीन लिया गया-जो आज तक उन्हें नहीं मिला।

इस कहानी में भारतीय अधिकारियों के योगदान और उनके साथ हुई अन्यायपूर्ण अनदेखी, साथ ही प्राचीन भारतीय ग्रंथों से फिंगरप्रिंटिंग विज्ञान की प्रेरणा को न मानने का जो इतिहास है, वह आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है। विशेष रूप से, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नेशनल ऑटोमैटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टमजैसे अत्याधुनिक तकनीक आकार ले रहीं हैं। इतिहास से हमें यह सीखने की आवश्यकता है कि हमारी नई खोजों और तकनीकी उपलब्धियों को वैश्विक स्तर पर पहचान मिले। इस बार हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे आविष्कार और योगदान, जैसे पहले नजरअंदाज हुए थे, वैसे फिर कभी न हो, और दुनिया में भारत की वैज्ञानिक प्रगति का सम्मान हो। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

 

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