कम होता खेत का आकार और घाटे की खेती
बीते एक दशक के दौरान विभिन्न सरकारी योजनाओं के बावजूद खेती-किसानी लाभ का सौदा बन नहीं पाई। खेती की लागत तो बढ़ी, लेकिन मौसमी जोखिम, बीज-खाद के बढ़ते दाम और मंडी में मनमानी के चलते किसान कर्जे में ही दबा रहा। बारीकी से आकलन करें तो देखते हैं कि घटती जोत या खेत का आकार किसानी को कर्जे से उबरने नहीं दे रही। बढ़ती आबादी और परिवारों में होते बंटवारे के चलते खेतों के लगातार छोटे टुकड़े हो रहे हैं, जिससे खेत छोटे होते जा रहे हैं। जब खेत का आकार छोटा है, तो यदि अत्याधुनिक मशीनरी का प्रयोग करेंगे तो लागत तो बढ़ेगी, लेकिन फसल अपेक्षित मात्रा में होगी नहीं। कागजों पर खेत और किसान बढ़ रहे हैं, लेकिन खेती घट रही है। भारतीय खेती-किसानी की इस चुनौती के लिए व्यापक सामाजिक और सहकारी क्रांति के जरूरत है, वरना कम होते रकबा किसी दिन खेती को शून्य कर देंगे।
जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम ने खेती के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। गांवों में खेती के साथ पशु पालन या ऐसे ही कुटीर उद्योग की बात तो होती है, लेकिन क्या किसान और उसके परिवार के पास इसके लिए समय और संसाधन होते हैं? इस पर गंभीरता से विचार न करने के चलते कागजों पर दमकती योजनाएं जमीनी धरातल पर बिसूरती दिखती हैं। सीमांत किसानों के पास एक एकड़ से भी कम खेती रह गई है। देश के किसानों के खेत का आकार सवा दो हेक्टेयर से घटकर एक हेक्टेयर रह गया है। इसमें साल दर साल गिरावट दर्ज की जा रही है।
देश में किसानों की कुल संख्या 14.57 करोड़ हो चुकी है, जो पांच साल पहले 13.83 करोड़ थी। इनमें लघु व सीमांत किसानों की संख्या 86 फीसद है। वे किसान जिनके पास कृषि योग्य भूमि एक हेक्टेयर (लगभग 2.5 एकड़) से कम होती है, वे सीमांत और एक हेक्टेयर से दो हेक्टेयर (लगभग पांच एकड़) वाले किसान लघु कहलाते हैं। पिछले एक दशक में सीमांत किसानों की संख्या साढ़े तीन करोड़ से बढ़कर दस करोड़ हो गई। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और कृषि निर्भर राज्य में लघु व सीमांत किसान 92 फीसद से भी अधिक हैं। विदित हो कि वर्ष 1970-71 में सीमांत किसानों की संख्या 3.62 करोड़ थी, जो 2015-16 में बढ़कर 9.98 करोड़ पहुंच गई, जबकि बड़े किसान 27.66 लाख थे, उनकी संख्या घटकर 8.31 लाख रह गई है।
एक बात देखी गई है कि जिन राज्यों में भूमि सुधार सही तरीके से नहीं हुए वहां बड़े किसानों की संख्या सर्वाधिक है। जैसे कि हरियाणा जैसे छोटे राज्य में बड़े किसानों की संख्या 41 हजार है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मात्र 23 हजार बड़े किसान हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में लघु व सीमांत किसान 93 फीसद हैं। इन किसानों के लिए खेती के दम पर दो वक्त का भोजन जुटाना भी असंभव होता है और ये मजबूरी में बड़े शहरों में अनियोजित श्रम सेक्टर में काम करते हैं। अब तो देश में बड़े किसानों की कुल संख्या 8.31 लाख ही बची है। आज जरूरत है कि छोटे किसान मिल-जुल कर कुछ प्रयास करें। जब एक अकेला छोटा किसान बाजार में जाता है, तो न तो वह खाद-बीज सस्ते दाम पर खरीद पाता है और न ही अपनी फसल को सही दाम पर बेच पाता है। इसका समाधान 'समूह की शक्ति' में है।
किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से जब 100-200 किसान एक साथ आते हैं, तो वे सामूहिक रूप से इनपुट खरीद सकते हैं और सीधे बड़ी कंपनियों या मंडियों से मोलभाव कर सकते हैं। इससे लागत कम होती है और मुनाफे में वृद्धि होती है। केवल पारंपरिक फसलों (जैसे गेहूं, धान) पर निर्भर रहकर छोटे खेतों से परिवार का खर्च नहीं चलाया जा सकता। छोटे किसानों को एकीकृत कृषि मॉडल अपनाना होगा। इसके तहत खेत के एक हिस्से में अनाज, एक हिस्से में उच्च मूल्य वाली सब्जियां और साथ में डेयरी, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन या मशरूम उत्पादन जैसी गतिविधियां जोड़नी होंगी। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
