रामनगरी में झूलनोत्सव की अनोखी छटा, हिंडोलों पर विराजे आराध्य; भक्ति, प्रेम और संगीत से सराबोर अयोध्या

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
On

मणि पर्वत से शुरू होती है झूलनोत्सव की परंपरा, पांच हजार मंदिरों में सजते हैं भव्य हिंडोले; सावन में उमड़ रहा श्रद्धालुओं का सैलाब

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन आदर्श और मर्यादा की पराकाष्ठा है। उनके मानव जीवन में बहुत कम ऐसे अवसर देखने को मिलते हैं, जब वह अपनों के बीच अपने प्रेम का खुलकर इजहार करते हैं। ऐसा नहीं कि वह प्रेम नहीं करते। वह अपनों और अपने भक्तों से प्रेम की भी पराकाष्ठा तक प्रेम करते हैं। इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन उनका लौकिक प्रेम कम ही स्थानों पर दृष्टव्य होता है।

रामनगरी का झूलनोत्सव श्रीराम का माता सीता सहित अन्य के प्रति लौकिक प्रेम का अनूठा उदाहरण है। जहां हिंडोले पर विराजमान होकर वह लौकिक से पारलौकिक प्रेम का मार्ग दिखाते हैं। स्वयं भी आनंदित होते हैं और अपने भक्तों को भी प्रेम के जरिए चरम आनंद प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। प्रेम का यह दृश्य केवल दृश्य भर नहीं होता बल्कि अंतरंग प्रेम और आनंद की अनुभूति कराता है। यहां का झूलनोत्सव वह है जहां भक्ति, परंपरा और मर्यादित प्रेम का संगम दिखता है, महसूस किया जाता है। भक्त इसके आनंद में डूब जाते है। इसीलिए झूलनोत्सव को रामनगरी अयोध्या का अनूठा पर्व कहा जाता है। शायद यही कारण है कि अयोध्या में सावन के झूलनोत्सव को देखने, महसूस करने और इसमें डूब जाने के लिए प्रदेश ही नहीं देश भर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। 

शाम होने के साथ ही गलियां भक्तों से आबाद हो जाती है। वह गली-चौबारे से होते हुए मंदिरों के जगमोहन में आयोजित होने वाले गीत-संगीत में उस प्रेम की तलाश करते हैं। जिससे आनंद के साथ आराधना का मार्ग मिले, वह इसमें डूबे और लौकिक जगत में प्रेम के जरिए पारलौकिक जगत की यात्रा के लिए अपने को तैयार कर सकें। इन दिनों अयोध्या इसी भक्ति, प्रेम और आनंद में डूबी हुई है। जगह-जगह, मंदिर-मंदिर भक्ति की रसधार बह रही है। लाखों श्रद्धालु इसका आनंद ले रहे हैं। इसमें गोते लगा रहे हैं। मान्यता है कि यह परंपरा त्रेता युग में शुरू हुई तब से आज तक अनवरत चल रही है।        

Ayodhya Jhulanotsav 2026 (2)

मणिपर्वत मेले से शुरू होता है झूलनोत्सव

मुख्य झूलनोत्सव की शुरूआत अयोध्या के प्रसिद्ध मणि पर्वत के मेले से होती है। यह मेला सावन शुक्ल पक्ष तृतीया को लगता है। इसे हरियाली तीज कहते हैं। मणि पर्वत की एक अलग पौराणिक कथा है। हनुमानगढ़ी के पुजारी रमेश दास बताते हैं मां जानकी की विदाई के समय उनके साथ एक दिव्य मणि जनकपुर चली गई थी। बाद में महाराज जनक ने बड़ी संख्या में मणियों को अयोध्या भेज दिया। महाराज दशरथ ने इन मणियों को अयोध्या में विद्याकुंड के पास सुरक्षित रखने का आदेश दिया। इन्हीं मणियों से बना मणिपर्वत बाद में झूलनोत्सव का केंद्र बना। ये मणियां सावन शुक्ल पक्ष तृतीया को अयोध्या पहुंची थीं, तभी से उस दिन को कजरी तीज के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। मणिपर्वत पर झूलन महोत्सव की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी भक्तों को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है।

झूला झूलने पालकी में मणिपर्वत पहुंचते हैं आराध्य

अयोध्या के आराध्य भगवान श्रीराम सहित माता सीता और तीनों भाई सबसे पहले मणि पर्वत पर मौजूद वृक्षों की डालियों पर झूला झूलने के लिए पहुंचते हैं। इसके लिए मंदिरों के चल विग्रह को पालकी और रथ यात्रा में मंदिर से मणि पर्वत तक लाया जाता है। मंदिरों में दो तरह के विग्रह होते हैं। एक जो एक ही स्थान पर स्थिर रहते हैं और दूसरे वह जिन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। इन्हें चल विग्रह कहा जाता है।

जब गाजे बाजे के साथ एक-एक करके अयोध्या के प्रमुख मंदिरों से रथ यात्रा निकाली जाती है। आराध्य श्रीराम सहित अन्य के चल विग्रह को रथ यात्रा और पालकियों में श्रंखलाबद्ध ढंग से मणिपर्वत लाया जाता है। उस समय अद्भुत दृश्य उत्पन्न होता है। संतों की टोली से भक्त तक आह्लादित होते हैं। वह आराध्य की रथ यात्रा को देख मुदित होते हैं।  नेत्रों से बूंदें टपकने लगती हैं। 

सावन प्रतिपदा से होती है शुरुआत

अयोध्या के कुछ मंदिरों में झूलन उत्सव सावन मास की प्रतिपदा से ही शुरू हो जाती है। इनमें रंग महल, सतगुरु सदन गोलाघाट जैसे मंदिर शामिल है। अयोध्या के सभी मंदिरों में एक साथ झूलनोत्सव की शुरूआत सावन शुक्ल तृतीया तिथि को मणि पर्वत मेले से होती है।

सावन पूर्णिमा तक रहती धूम

अयोध्या में सावन के झूलनोत्सव की धूम 12 दिनों तक रहती है। तृतीया को मणि पर्वत से शुरू हुआ झूलन उत्सव रक्षा बंधन अर्थात सावन पूर्णिमा तिथि तक चलता है। इसके लिए तैयारियां महीनों पूर्व से की जाती है। सजाया-संवारा जाता है। इस दौरान अयोध्या के मंदिरों की छटा बदली-बदली दिखती है। 

Ayodhya Jhulanotsav 2026

भादौं पंचमी तक चलता है उत्सव

सदगुरु सदन गोलाघाट, रंग महल, लक्ष्मण किला, चारुशीला, राम हर्षण कुंज, रामकथा कुंज आदि मंदिरों में झूलन उत्सव का समापन भादौं मास की पंचमी तिथि को होता है। सबसे खास विअहुति भवन का झूलनोत्सव होता है। यहां के पुजारी विद्या भूषण बताते हैं कि यहां का झूलनोत्सव श्रावण शुक्ल पंचमी से शुरू होकर भादौं पंचमी तक चलता है। इस मंदिर में भगवान सीताराम जी की आराधना विवाह पर आधारित होती है यहां पर वर्ष भर भगवान की पूजा कोहबर में की जाती है। भादौं पंचमी के समापन के अवसर पर इन सभी मंदिरों में स्वरूप सम्मेलन का भी आयोजन किया जाता है।

श्रद्धालुओं की उमड़ती है भारी भीड़

प्रभु श्रीराम के दर्शन करने और झूलनोत्सव को अद्भुत छटा देखने के लिए राम मंदिर में इन दिनों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। मंदिर के जगमोहन में झूला झूलते आराध्य के विग्रह के सम्मख गीत-संगीत की महफिल देर शाम में सजती है। लोग अपलक इस छवि को निहारते हैं। गीत-संगीत के बीच भक्ति रस में सराबोर हो जाते हैं।   

5000 मंदिरों में मनाया जाता है झूलनोत्सव

अयोध्या में झूलनोत्सव का पर्व छोटे-बड़े लगभग पांच हजार मंदिरों में मनाया जा रहा है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, कनक भवन, हनुमानगढ़ी और रंगमहल सहित अयोध्या के लगभग 5000 मठ-मंदिरों में भगवान को फूलों से सजे चांदी के भव्य हिंडोले (झूलों) पर झुलाया जाता है।

झूला झूलने के साथ होती है उत्सव की शुरुआत

सावन शुक्ल पक्ष तृतीया को मणि पर्वत पर मौजूद वृक्षों की डालों पर झूले डाले जाते हैं। इन झूलों पर कनक बिहारी सरकार को विराजमान किया जाता है। इसके बाद संत जन और भक्त उन्हें धीरे-धीरे झूला झुलाते हैं। भगवान की सखियां के रूप में लोक कलाकार अपनी कला से भगवान को रिझाते हैं। एक साथ सैकड़ों की संख्या में झूलों पर चल विग्रह के रूप में श्रीराम, माता सीता सहित तीनों भाई झूला झूलने का दृश्य अविस्मरणीय छवि निर्मित करता है। आयोजन के बाद यात्रा मंदिरों को लौटती है। इसी शाम से ही अयोध्या में झूलनोत्सव की शुरूआत हो जाती है।

खास रहा श्रीराम जन्म भूमि मंदिर में झूलनोत्सव

इस साल श्रीराम जन्म भूमि मंदिर में झूलनोत्सव विशिष्ट रहा। इसकी शुरूआत हुई। सावन शुक्ल पक्ष तृतीया को राम मंदिर से चल विग्रह की रथ यात्रा निकाली गई। उसे मंदिर परिसर के कुबेर टीला तक ले जाया गया। यहां आराध्य को झूला झुलाया गया। इसके बाद 12 दिन तक चलने वाले झूलनोत्सव की शुरूआत मंदिर में हो गई। मंदिर के गर्भ गृह में चांदी का झूला डाला गया। राम लला को इस पर विराजमान किया गया। प्रतिदिन राम लला को झूला जुलाने के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है।

अयोध्या में फैल रही इत्र व फूलों की खूशबू

झूलनोत्सव का त्योहार अद्भुत है। शाम होते ही अयोध्या की गलियां महकने लगती है। चारों ओर से फूलों के साथ इत्र की खूशबू आने लगती है। मंदिरों की दहलीज पर कदम रखते ही मन अद्भुत खूशबू से भर जाता है। कदम स्वतः मठ मंदिरों की ओर बढ़ जाते हैं। यह देर रात तक महकती रहती है। लोग श्रद्धा में डूबकर आनंदित होते हैं।

अयोध्या की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक झूला मेला

अयोध्या का प्रसिद्ध झूलनोत्सव समृद्ध धार्मिक के साथ सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से यह मेला भगवान राम और माता सीता के प्रेम और आनंद का प्रतीक तो है ही अयोध्या की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी दिखाता है। जहां एक साथ धर्म के साथ ही भक्ति और संगीत का अनूठा संगम होता है। भक्त भगवान को झूला झुलाकर अपनी भक्ति और प्रेम व्यक्त करते हैं तो पखवारे भर चलने वाला यह मेला लोगों को एक साथ लाता है और उत्सव की भावना का संचार करता है। मेला अयोध्या में पर्यटन को बढ़ावा देता है। स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचाता है। लाखों की संख्या में आने वाले श्रद्धालु खान पान के साथ कुछ न कुछ खरीदारी करते हैं ऐसे में यहां के होटल, धर्मशाला, मठ मंदिरों के साथ ही दुकानदारों को बड़ा आर्थिक लाभ होता है।

बह रही सुर, संगीत और भक्ति की त्रिवेणी

सावन के महीने में झूलनोत्सव के दौरान अयोध्या में सुर, संगीत और भक्ति की त्रिवेणी देर रात तक बहती है। अंधेरा होने के साथ ही मंदिरों के जगमोहन से घुंघूरूओं की आवाज के साथ स्वर लहरियां गूंजती है। सामने चांदी के हिंडोले पर कनक बिहारी सरकार का झूला होता है। एक भक्त उन्हें धीरे-धीरे झूला झुलाता है। श्रद्धालु दर्शन कर अविभूत होते हैं। सामने महफिल सजती है। संत, धर्माचार्यो के साथ भक्तों की जमात बैठती है। तबले की थाप, हारमोनियम की धुन पर आराध्य को भक्ति संगीत सुना रिझाया जाता है। भजन-कीर्तन, कजरी गीत और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संत और भक्त आनंदित होते हैं। यह क्रम देर रात तक चलता है। आरती के साथ प्रसाद वितरण होता है। ऐसा पूरे सावन मंदिरों में चलता रहता है।

बढ़ गई सरयू के घाटों की रौनक

सरयू के घाटों की रौनक इन दिनों बढ़ी हुई है। देश भर के कोने कोने से आने वाले श्रद्धालुओं का जमावड़ा है। वह कई-कई दिन रुककर सावन झूला मेले का आनंद ले रहे हैं। अयोध्या वासियों के साथ उनकी दिन चर्या बदल गई है। रात्रि में भ्रमण कर मंदिर-मंदिर दर्शन पूजन और महफिलों में हिस्सा लेने के बाद सोना। फिर सुबह जल्दी उठकर सरयू स्नान के लिए निकल पड़ना। मुंबई से आए सतीश परांजपे कहते हैं सावन झूला मेले में आनंद बरसता है। सुबह से शाम तक अयोध्या में घूमना और शाम होते ही मंदिरों में भक्ति संगीत मन को सराबोर कर रही है।

-राजेंद्र कुमार पांडेय, अयोध्या

यह भी पढ़ेंः एक साल से जारी रामकोट की नित्य परिक्रमा... वर्षगांठ पर उमड़ा रामभक्तों का सैलाब; जयघोष से गूंज उठी अयोध्या

संबंधित समाचार