हजार दफ्तर और हर काम की एक ‘कीमत’
रिश्वत अब व्यवस्था की आदत बन चुकी है। कई बार सामान्य नागरिक का काम बिना इस ‘अतिरिक्त कीमत’ के आगे बढ़ता ही नहीं। रिश्वत पर जड़ खामोशी को दो जुलाई 2026 में दिल्ली के महाराजा अग्रसेन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के बीटेक छात्र आर्यन निषाद ने डिजिटल चुनौती दी। उन्होंने Bribes.fyi (ब्राइब्स डॉट एफवाईआई) बनाया है।भारत में रिश्वत अब जेब से निकलकर व्यवस्था की आदत बन चुकी है; कई बार सामान्य नागरिक का काम बिना इस ‘अतिरिक्त कीमत’ के आगे बढ़ता ही नहीं।
थाने की मेज से तहसील की फाइल, आरटीओ की खिड़की से पासपोर्ट कार्यालय तक- ‘कुछ करना पड़ेगा’ जैसे वाक्यों ने भ्रष्टाचार को चुपचाप सामाजिक स्वीकृति दे दी है। इसी जड़ खामोशी को दो जुलाई 2026 में दिल्ली के महाराजा अग्रसेन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के बीटेक छात्र आर्यन निषाद ने डिजिटल चुनौती दी। उन्होंने Bribes.fyi (ब्राइब्स डॉट एफवाईआई) बनाया- एक मंच, जहां नागरिक पहचान छिपाकर रिश्वत की मांग दर्ज कर सकते हैं। विभाग, शहर, रकम और रिश्वत दी या ठुकराई- इतनी जानकारी से ही भ्रष्टाचार का नया नक्शा उभरने लगा।
इस पहल की असली धार उसकी सादगी में थी। न लंबी शिकायत प्रक्रिया, न दफ्तरों की दौड़, न पहचान उजागर करने की मजबूरी। नागरिक के अनुभव को सीधे आंकड़े में ढाल दिया गया। शुरुआती रिपोर्टों में पुलिस विभाग सबसे आगे रहा; उसके बाद आरटीओ, राजस्व एवं भूमि रिकॉर्ड और पासपोर्ट कार्यालय सामने आए। 250 से अधिक शहरों से शिकायतें जुड़ीं और कई मामलों में मांगी गई रकम हजारों रुपये तक बताई गई। वेबसाइट ने स्पष्ट किया कि आंकड़े स्वैच्छिक रिपोर्टों पर आधारित हैं, पूरे भारत का वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं। फिर भी सीमित दायरे ने इसका महत्व कम नहीं किया। पहली बार लोगों की बिखरी पीड़ा एक साझा, सार्वजनिक डिजिटल तस्वीर में उभरने लगी।
सबसे चुभता संकेत शायद आंकड़ों के बीच छिपा वही सच था। कई लोगों ने रिश्वत देने से इनकार किया और फिर भी उनका काम हो गया। यह भ्रष्टाचार की उस पुरानी दलील पर सीधा सवाल है कि रिश्वत हर बार ‘मजबूरी’ होती है। जब बिना पैसे काम हो सकता है, तो फिर पैसे की मांग क्यों? Bribes.fyi ने यही सवाल समाज के सामने रख दिया। यहां भ्रष्टाचार अब धुंधली चर्चा नहीं, बल्कि रकम, विभाग और स्थान के साथ दर्ज अनुभव था। मानचित्र पर उभरते बिंदु महज शिकायतें नहीं थे; वे उस नागरिक आक्रोश के निशान थे, जिसे सरकारी फाइलें और मौखिक शिकायतें अक्सर निगल जाती हैं।
किसी छोटे डिजिटल प्रयोग का इतनी तेजी से सार्वजनिक बहस बन जाना असाधारण था। कुछ ही घंटों में लाखों क्लिक और 50 लाख से अधिक (करीब 5 मिलियन) रिक्वेस्ट की खबरों ने Bribes.fyi को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया। सोशल मीडिया पर छात्रों, नागरिकों और तकनीक से जुड़े लोगों में चर्चा तेज हुई। एंजेल इन्वेस्टर डॉ. अनिरुद्ध मालपानी की ₹30,000 की मदद ने इसके आगे बढ़ने की संभावना दिखाई, लेकिन लोकप्रियता के साथ दुरुपयोग, शिकायतों की विश्वसनीयता, कानूनी सुरक्षा और वित्तीय ढांचे के सवाल उठे। वेबसाइट स्वेच्छा से ऑफलाइन कर दी गई। टीम ने इसे सावधानी का कदम बताया। बाद में अनिश्चितकालीन ब्रेक की घोषणा करते हुए डेटा स्थायी रूप से डिलीट करने और वेबसाइट हमेशा के लिए बंद करने की बात कही गई; फिर भी डेटा और कानूनी ढांचे पर सवाल बने रहे।
Bribes.fyi की असली कहानी कोड से आगे, लोकतंत्र की उस जमीन पर शुरू होती है, जहां नागरिक और व्यवस्था आमने-सामने होते हैं। वेबसाइट बनाना आसान है, लेकिन उसे सुरक्षित, भरोसेमंद और लंबे समय तक जनहित में चलाना कठिन। भारत में सरकारी शिकायत तंत्र मौजूद हैं, फिर भी कई नागरिक वहां जाने से कतराते हैं— डर रहता है कि काम न अटके, अधिकारी नाराज न हो या शिकायतकर्ता की पहचान मुसीबत न बन जाए। गुमनाम रिपोर्टिंग ने इसी डर में एक दरार खोली। मगर वायरल होने के बाद मंच संभालना कठिन हो गया। इससे स्पष्ट है— तकनीक अकेले भ्रष्टाचार की जड़ नहीं काट सकती; उसे कानूनी संरक्षण, सख्त मॉडरेशन, विश्वसनीय सत्यापन और संस्थागत सहयोग चाहिए।
अब प्रश्न यह नहीं कि Bribes.fyi कितनी शिकायतें बटोर सकता था; असली प्रश्न है- उनका अंजाम क्या होता? यदि किसी विभाग, शहर या कार्यालय से बार-बार रिश्वत की शिकायतें मिलें, तो क्या निगरानी तंत्र हरकत में आना चाहिए? क्या ऐसे आंकड़े भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसियों के लिए शुरुआती चेतावनी बन सकते हैं? नागरिक जोखिम लेकर सूचना दे और व्यवस्था उसे महज डिजिटल शोर मानकर टाल दे, तो शिकायत मंच का मकसद अधूरा रहेगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
