मघा के बरसे माता के परसे
कहावत है-“मघा के बरसे और माता के परसे ही आत्मा तृप्त होती है।” अर्थात मघा नक्षत्र में हुई वर्षा धरती को और मां के हाथ का भोजन मनुष्य को तृप्त करता है। लोकमान्यता है-“मघा न बरसे, भरे न खेत; मां न परसे, भरे न पेट।” मघा 27 नक्षत्रों में से एक है। भारतीय परंपरा में वर्षा ऋतु के आठ नक्षत्र माने गए हैं, जो आद्रा से हस्त तक माने जाते हैं। मघा को तेज बारिश, गरजते बादलों और तेज हवाओं वाला नक्षत्र माना गया है।
इसकी बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें और झकोरती हवा लोकजीवन में अलग ही पहचान रखती हैं। तुलसीदास ने भी लिखा है-“बूंद अघात सहहि गिरि कैसे, खल के बचन संत सह जैसे।” मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत में नागमती के विरह के आंसुओं की तुलना मघा की वर्षा से करते हुए लिखा है-“बरसे मघा झकोर झकोरी, मोर दुई नयन चुअय जस ओरी।” वीर रस के कवियों ने भी गोलियों की बौछार की तुलना मघा की बूंदों से की है। आल्हा में मघा के गरजते बादलों और तेज बारिश का सुंदर वर्णन मिलता है।
लेकिन इस वर्ष उत्तर भारत में मघा ने लोकविश्वास के अनुरूप वर्षा नहीं की। कहीं तेज बारिश हुई तो कहीं बादल बिना बरसे ही निकल गए। आषाढ़ और सावन भी कई क्षेत्रों में सूखे और अतिवृष्टि के बीच बीते। बुंदेलखंड समेत अनेक इलाकों में किसान बारिश की बाट जोहते रहे। धान की फसल बचाने के लिए उन्हें महंगा डीजल खरीदकर सिंचाई करनी पड़ी। मघा के बाद पूर्वा नक्षत्र आता है, जिसमें एक धार पानी बरसने की लोकमान्यता है। घाघ की कहावत है-“मघ मारे, पुरब संभारे।” मगर इस बार मघा ही धरती को धोखा दे गई।
इसी बीच हरतालिका तीज का पर्व भी आता है। मान्यता है कि पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनकी सखियां उन्हें जंगल में ले गईं, जहां उन्होंने शिव की आराधना की। इसी प्रसंग की स्मृति में हरतालिका तीज मनाई जाती है। इस वर्ष पहाड़ों में अतिवृष्टि और बादल फटने की घटनाएं हुईं, जबकि मैदानों में कई जगह पर्याप्त बारिश नहीं हुई। मौसम के इस असंतुलन ने खेती को प्रभावित किया है। बदलते जलवायु चक्र के बीच मौसम की सटीक भविष्यवाणी भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। यही कारण है कि मौसम विज्ञान को आधुनिक रडार और अत्याधुनिक तकनीक से मजबूत करने की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है। धरती आज भी मघा की उस भरपूर बारिश की प्रतीक्षा में है, जो खेतों को सींचे और किसान के चेहरे पर संतोष की मुस्कान लौटा सके।
शिवचरण चौहान, लेखक
