Gonda News: ढाई हजार साल पुराने करोहानाथ धाम में अशोक स्तंभ के भग्नावशेष पर विराजे भोलेनाथ

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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राज शुक्ला, अमृत विचार। इतिहास और आस्था के अद्भुत संगम का साक्षी मनकापुर के करौहामान गांव के निकट स्थित करौहानाथ मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के साथ इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि ढाई हजार वर्ष पुराने अशोककालीन स्तंभ के भग्नावशेष पर बाद में भगवान शिव की स्थापना की गई। यही वजह है कि इस धाम में बौद्ध परंपरा, सम्राट अशोक की विरासत और शैव आस्था एक साथ दिखाई देती है।

बौद्ध साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख तोरणवस्तु के नाम से मिलता है। इसे श्रावस्ती से साकेत जाने वाले प्राचीन मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने भी यहां प्रवास कर धर्म का उपदेश दिया था। बौद्ध परंपरा में राजा बिम्बिसार की महारानी खेमा के यहां प्रवास और अंगुलीमाल के उद्धार की कथा का भी इस क्षेत्र से संबंध बताया जाता है।

Lord Bholenath

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार क्षेत्र के महत्व को देखते हुए सम्राट अशोक ने यहां स्तूप, विहार और विशाल स्तंभ का निर्माण कराया था। कालांतर में स्तंभ नष्ट होकर भग्नावशेष में बदल गया। बाद में गहड़वाल वंश के राजा गोविन्द चन्द्र देव (1110-1156 ई.) ने इसके अवशेष को शिवलिंग स्वरूप में प्रतिष्ठित कर मंदिर की स्थापना कराई। इस तरह यहां बौद्ध और शैव परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

करौहानाथ मंदिर की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यहां बौद्ध परंपरा की स्मृतियां, अशोककालीन विरासत, गहड़वाल काल की धार्मिक आस्था और आधुनिक दौर में राजघराने के संरक्षण की कहानी एक साथ दिखाई देती है। मंदिर परिसर इतिहास के कई युगों को अपने भीतर समेटे हुए है। हर सोमवार गूंजता हर-हर महादेव इस प्राचीन धरोहर को आज भी आस्था और इतिहास के जीवंत संगम के रूप में स्थापित करता है।

राजघराने ने भी संवारी धरोहर

Ashoka Pillar

करोहानाथ मंदिर के संरक्षण और विकास में मनकापुर राजघराने की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। वर्ष 1904 में राजा रघुराज प्रताप सिंह ने मंदिर का संगमरमर से पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद वर्ष 2012 में राजा आनंद सिंह के प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद मंदिर का जीर्णोद्धार, विस्तार और पुनर्निर्माण कराया गया। पर्यटन विभाग के सहयोग से परिसर का सौंदर्यीकरण भी हुआ।

करौंदे के पेड़ से शिवलिंग निकलने की मान्यता

मंदिर से जुड़ी लोककथा भी श्रद्धालुओं के बीच खासा आकर्षण रखती है। स्थानीय पुजारी रमेश गिरि के अनुसार पहले यहां घना जंगल था। जंगल की कटाई के दौरान करौंदे के पेड़ को काटने पर उसमें से रक्त की धारा निकलने की बात कही जाती है। मान्यता है कि इसी स्थान से शिवलिंग प्राप्त हुआ था। स्थानीय लोगों का दावा है कि शिवलिंग पर आज भी कुल्हाड़ी जैसे निशान दिखाई देते हैं। इसी कारण भगवान शिव को बाबा करोहानाथ के नाम से जाना जाता है। हालांकि इन लोककथाओं का ऐतिहासिक सत्यापन अलग विषय है, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था में इनका विशेष महत्व है।

16 सोमवार जलाभिषेक की मान्यता

मंदिर में प्रत्येक सोमवार श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। भक्त बाबा करोहानाथ का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि लगातार 16 सोमवार तक जलाभिषेक करने से मनोकामना पूरी होती है। महाशिवरात्रि, अधिक मास, मलमास और कजरी तीज पर यहां विशेष भीड़ उमड़ती है और परिसर मेले में तब्दील हो जाता है। गोण्डा के अलावा आसपास के जिलों तथा नेपाल से भी श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।

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