कूड़े के पहाड़ सामूहिक नागरिक उदासीनता के स्मारक
मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद और दिल्ली के साथ-साथ लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में कूड़े के पहाड़ सरकारों की नाकामी से ज्यादा हमारी सामूहिक नागरिक उदासीनता के स्मारक हैं।
मुझे कचरा उत्पन्न करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उसके प्रभाव को नियंत्रित करने और उसे साफ करने में सहयोग करने की मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है। देश की सर्वोच्च अदालत की यह तल्ख टिप्पणी केवल एक कानूनी अवलोकन नहीं है, बल्कि यह हमारे आधुनिक भारतीय समाज के उस पाखंडी चेहरे पर एक करारा तमाचा है, जिसे हम रोज सुबह अपने घरों के बाहर कचरा फेंकते हुए देखते हैं। उच्चतम न्यायालय ने भोपाल नगर निगम के मामले का दायरा बढ़ाकर जब इसे पूरे देश पर लागू किया, तो न्यायपालिका असल में हमारे शहरों को निगल रहे उस अदृश्य संकट को रेखांकित कर रही थी, जिसे हम अक्सर नगर निकायों के मत्थे मढ़ देते हैं।
सच तो यह है कि मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद और दिल्ली के साथ-साथ लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों में कूड़े के पहाड़ सरकारों की नाकामी से ज्यादा हमारी सामूहिक नागरिक उदासीनता के स्मारक हैं। इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच जब हम मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की ओर देखते हैं, तो व्यवस्था को कोसने वाले हमारे सारे बहाने धरे के धरे रह जाते हैं। देश के सबसे स्वच्छ शहर का गौरव लगातार अपने नाम करने वाले इंदौर ने साबित किया है कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जन-भागीदारी एक साथ मिल जाएं, तो चमत्कार मुमकिन है।
इंदौर में रात के समय सड़कों की सफाई होती है, लोग कचरा गाड़ियों का इंतजार करते हैं और वहां का बच्चा-बच्चा भी सड़क पर कुछ भी फेंकने से पहले सोचता है। सवाल यह उठता है कि अगर हमारे ही देश के संसाधनों और उसी कानून के दायरे में रहकर इंदौर साफ हो सकता है, तो देश के बाकी शहर क्यों नहीं? क्यों दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगर कूड़े के ढेरों के नीचे दबने को मजबूर हैं? जवाब सीधा है, इंदौर की सफलता का राज वहां का ढांचा नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों की बदली हुई सोच और चेतना है, जिसकी देश के बाकी हिस्सों में घोर कमी है।
हम एक ऐसे अजीबोगरीब समाज में तब्दील हो चुके हैं, जो अपने आलीशान कमरों को चमकाने के लिए तो बेताब रहता है, लेकिन जैसे ही पैर चौखट के बाहर पड़ते हैं, पूरी सड़क को कूड़ाघर मान लेता है। ठोस कचरा प्रबंधन नियम के कड़े मानकों के बावजूद जमीनी हकीकत जस की तस है। घरों से निकलने वाले गीले, सूखे और घरेलू खतरनाक कचरे को अलग-अलग करना आज भी अधिकांश भारतीयों के लिए एक अनावश्यक सिरदर्दी है। हम जैविक, रासायनिक, इलेक्ट्रॉनिक और प्लास्टिक कचरे को एक ही थैली में भरकर इस निश्चिंतता के साथ सड़क पर फेंक देते हैं कि इसे साफ करना केवल किसी सफाई कर्मचारी का काम है। समाज की यह सोच न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि मानवीय और व्यावहारिक रूप से पूरी तरह अमानवीय है।
हम इस कड़वी हकीकत को भूल रहे हैं कि अगर हम लापरवाही और कूड़े से अपने ही शहर को बर्बाद कर रहे हैं, तो यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि जब पूरा शहर ही बर्बाद हो जाएगा, तो हमारा अपना घर कैसे सुरक्षित रह सकता है? प्रदूषण, बीमारियां और जहरीला भूजल किसी के घर की दीवार देखकर नहीं रुकते। आज हमारे देश की नदियां ठोस कचरे के कारण दम तोड़ रही हैं, जमीन जहरीली हो चुकी है और हवा में प्लास्टिक की गंध घुल चुकी है। इसके बावजूद हमारा पढ़ा-लिखा वर्ग व्यवस्था को कोसने के अलावा अपनी जीवनशैली में रत्ती भर भी बदलाव करने को तैयार नहीं है। सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध का मजाक उड़ाना हमारी आदत बन चुका है।
यह समझना होगा कि कचरा संकट का समाधान केवल जिलाधिकारियों को छह हफ्ते का अल्टीमेटम देने या जिला प्रशासनों द्वारा जुर्माने वसूलने से नहीं होगा। जब तक देश का हर नागरिक, हर घर और हर संस्था इंदौर के नागरिकों की तरह इस बात को आत्मसात नहीं करेगी कि कचरा पैदा करने वाला ही उसके निस्तारण के लिए प्राथमिक रूप से जवाबदेह है, तब तक कोई भी कानून इस देश को स्वच्छ नहीं बना सकता। नियम तोड़ने पर बिजली या पानी की अस्थायी आपूर्ति रोकने जैसी सख्त कार्रवाई का निर्देश यह चेतावनी है कि प्रकृति और न्यायपालिका अब और ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेंगी। समय आ गया है कि हम अपनी इस आत्मघाती सोच को बदलें, क्योंकि अगर शहर डूबेगा, तो हमारे घर भी नहीं बचेंगे।
यह हमारे देश के प्रशासनिक तंत्र और नागरिक बोध की सबसे बड़ी त्रासदी है कि आज समाज के हर बुनियादी विषय पर हमें देश की अदालतें जगा रही हैं। चाहे शहरों में जलभराव की समस्या हो, सड़कों के जानलेवा गड्ढे हों या फिर बस्तियों के किनारे खड़े कूड़े के पहाड़, जब तक न्यायपालिका का हंटर नहीं चलता, तब तक न तो हमारा विशाल प्रशासनिक अमला अपनी गहरी नींद से जागता है और न ही आम नागरिक अपने कर्तव्यों को लेकर सचेत होते हैं। नियमों का पालन कराने के लिए बार-बार अदालतों द्वारा बिजली-पानी काटने जैसी चेतावनी देना यह साफ करता है कि हमारी स्थानीय संस्थाएं और नगर निकाय अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल साबित हुए हैं। अगर देश की सर्वोच्च अदालत को ही यह तय करना पड़ेगा कि किस शहर का कचरा कैसे उठेगा और किसकी जवाबदेही क्या होगी, तो फिर इस भारी-भरकम सरकारी व्यवस्था और स्थानीय स्वायत्त शासन का औचित्य ही क्या रह जाता है ?
