पहनावे पर नहीं, परवरिश पर हो बहस: महिलाओं के कपड़ों से चरित्र तय करने की सोच कब बदलेगा समाज?

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी ने फिर उठाया सवाल—महिलाओं के पहनावे को अपराध, चरित्र और नैतिकता से जोड़ना कितना उचित? असली बदलाव कपड़ों में नहीं, सोच और परवरिश में लाने की जरूरत।

दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले ने एक बार फिर समाज के सामने उस पुराने और असहज सवाल को खड़ा कर दिया है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि कोई लड़की या महिला क्या पहनना चाहती है, यह उसकी निजी पसंद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है। किसी लड़की के जींस पहनने को यह कहकर गलत ठहराना कि इससे वह युवा लड़कों को बिगाड़ सकती है, ऐसी मानसिकता को दर्शाता है जो न केवल चिंताजनक है, बल्कि सामाजिक रूप से अस्वीकार्य भी है। इस टिप्पणी ने उस बहस को फिर सामने ला दिया है कि आखिर किसी व्यक्ति के कपड़ों का उसके चरित्र, नैतिकता या दूसरे व्यक्ति के आचरण से क्या संबंध है? कपड़ा मनुष्य की जरूरत भी है और उसकी पसंद की अभिव्यक्ति भी। कपड़ों के लिए सही और गलत का फैसला समाज की सामूहिक पसंद से नहीं किया जा सकता। खासकर किसी महिला के पहनावे को उसके चरित्र का प्रमाण मान लेना एक ऐसी सोच है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को संकीर्ण सामाजिक धारणाओं के तराजू पर तौलती है। 

सच कहें तो प्रश्न केवल कपड़ों का नहीं, बल्कि सोच और सत्ता-संबंधों का है। सदियों से समाज के कई हिस्सों में महिलाओं के जीवन से जुड़े निर्णयों पर पुरुष प्रधान व्यवस्था का प्रभाव रहा है। उन्हें क्या पहनना चाहिए, कहां जाना चाहिए, किससे बात करनी चाहिए और कैसे व्यवहार करना चाहिए, इन सब पर सामाजिक अपेक्षाओं की लंबी सूची बना दी गई। समय बदला, शिक्षा बढ़ी, कानून मजबूत हुए और महिलाओं ने सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई, लेकिन कुछ पुरानी मानसिकताएं आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या तब होती होती है जब महिलाओं के पहनावे को यौन अपराधों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। बलात्कार, छेड़छाड़ या किसी भी प्रकार की यौन हिंसा के पीछे अपराधी की मानसिकता, उसकी इच्छा, उसका निर्णय और कानून की अवहेलना होती है, पीड़ित के कपड़े इसका कारण नहीं हो सकते। अपराध का उत्तरदायित्व हमेशा अपराध करने वाले पर होना चाहिए, पीड़ित पर नहीं।

Delhi High Court on women's attire

महिलाओं के कपड़ों से आगे सोचने की जरूरत

समाज को भी अपने नजरिए पर पुनर्विचार करना होगा। किसी महिला का पहनावा चर्चा, मजाक, टिप्पणी या चरित्र-निर्णय का सार्वजनिक विषय नहीं होना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना होगा कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल वही करना नहीं है जो हमें पसंद हो, बल्कि दूसरों को उनकी वैध स्वतंत्रता के साथ जीने देना भी है। जिस दिन हम किसी महिला के कपड़े देखकर उसके चरित्र का अनुमान लगाना बंद कर देंगे, उसी दिन हम एक अधिक स्वस्थ और समान सामाजिक सोच की ओर बढ़ेंगे। हमारा समाज यदि सचमुच सुरक्षित और सभ्य बनना चाहता है तो उसे महिलाओं के कपड़ों की लंबाई नापने के बजाय अपनी सोच की गहराई मापनी होगी। क्योंकि बदलने की जरूरत महिलाओं के पहनावे में नहीं, उस नजरिए में है जो आज भी उनके कपड़ों को उनकी स्वतंत्रता से बड़ा मानता है।

पीड़ित को कटघरे में खड़ा करने की सोच

पहनावे को लेकर ऐसी टिप्पणियां केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला नहीं करतीं, बल्कि पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा करने की प्रवृत्ति को भी मजबूत करती हैं। जब किसी महिला से पूछा जाता है कि उसने ऐसे कपड़े क्यों पहने, वह उस स्थान पर क्यों गई या इतनी देर तक बाहर क्यों रही, तो अनजाने में सवाल अपराधी के बजाय पीड़ित से पूछे जाने लगते हैं। यह दृष्टिकोण न्याय की मूल भावना के विपरीत है। किसी अपराध की जांच में तथ्य, प्रमाण और आरोपी का आचरण महत्वपूर्ण होना चाहिए, न कि पीड़ित के कपड़ों से उसके चरित्र का अनुमान लगाना। 

निजता और गरिमा का अधिकार

यहां निजता और गरिमा का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है। संविधान व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। किसी व्यक्ति की निजी पसंद, जब तक वह कानून का उल्लंघन नहीं करती, उसके व्यक्तिगत क्षेत्र का हिस्सा है। इसलिए किसी महिला के कपड़ों को लेकर पड़ोसी, रिश्तेदार, समाज या किसी मुकदमे में आरोपी पक्ष अनावश्यक सवाल उठाए, तो यह केवल असभ्य टिप्पणी नहीं रह जाती, यह उसकी गरिमा और स्वतंत्र निर्णय के अधिकार को प्रभावित करने वाली मानसिकता का रूप ले सकती है। समाज को यह समझना होगा कि किसी की पसंद से असहमति होना अलग बात है और उस पसंद को नियंत्रित करने का अधिकार समझ लेना बिल्कुल अलग बात। 

ड्रेस कोड और नैतिक निगरानी में फर्क

हालांकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं है कि सामाजिक संवेदनशीलता पूरी तरह समाप्त हो जाए। हर सार्वजनिक स्थान, पेशे और परिस्थिति के अपने व्यावहारिक या संस्थागत नियम हो सकते हैं। विद्यालय, कार्यस्थल, धार्मिक स्थल या किसी विशेष पेशे में निर्धारित ड्रेस कोड हो सकता है। लेकिन ऐसे नियमों और किसी व्यक्ति की निजी पसंद को नियंत्रित करने वाली नैतिक निगरानी में अंतर समझना जरूरी है। नियम यदि समान रूप से लागू हों और उनका उद्देश्य व्यवस्था या सुरक्षा हो, तो उनका अपना औचित्य है, लेकिन केवल महिलाओं के कपड़ों को नैतिकता का पैमाना बनाना लैंगिक भेदभाव को जन्म देता है।

परवरिश से बदलती है सोच

इस पूरी बहस का एक और महत्वपूर्ण पक्ष बच्चों और युवाओं की परवरिश से जुड़ा है। यदि किसी लड़के को यह सिखाया जाता है कि लड़की का पहनावा उसके व्यवहार का निमंत्रण है, तो समस्या लड़की के कपड़ों में नहीं, उस शिक्षा में है। लड़कों को बचपन से यह समझाने की जरूरत है कि सामने वाला व्यक्ति स्वतंत्र इच्छा और गरिमा रखने वाला इंसान है। किसी की सहमति के बिना उसे छूना, परेशान करना, पीछा करना या यौन टिप्पणी करना गलत है, चाहे सामने वाला व्यक्ति कोई भी कपड़े पहने हो। व्यक्तिगत सीमाओं, सहमति और सम्मान की शिक्षा घर और विद्यालय दोनों जगह दी जानी चाहिए। माता-पिता की भूमिका इस बदलाव में सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है। बेटियों से केवल यह कहना कि “ऐसे कपड़े मत पहनो” पर्याप्त समाधान नहीं है। बेटों से भी यह कहना जरूरी है कि “किसी के कपड़ों से तुम्हें उसके प्रति अधिकार नहीं मिल जाता।” लड़कियों को सुरक्षा के नाम पर लगातार सीमित करने के बजाय लड़कों को जिम्मेदारी, संयम, सम्मान और सहमति का अर्थ समझाना अधिक प्रभावी सामाजिक उपाय है। सुरक्षा का भार केवल महिलाओं के कंधों पर डाल देना वास्तव में समस्या के मूल कारण से बच निकलना है।

आखिर समाज को यह तय करना होगा कि वह महिलाओं के कपड़ों की लंबाई नापेगा या अपनी सोच की गहराई। बदलाव पहनावे में नहीं, उस नजरिए में जरूरी है जो आज भी कपड़ों को महिला की स्वतंत्रता से बड़ा मानता है।

— नृपेन्द्र अभिषेक, नृप, लेखक, नई दिल्ली

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