मनोकामना मंदिर: जहां बारहों मास उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

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Edited By Anjali Singh
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हिंदू मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ और सावन माह तीर्थाटन अथवा देवी देवताओं के दर्शन और मनौतियों का होता है। ऐसे में देखा जा रहा है कि इस समय श्रद्धालु देवी-देवताओं के दर्शन हेतु बड़ी संख्या में निकले हुए हैं। श्रद्धालुओं का कोई जत्था भारत में स्थित शक्ति पीठों के दर्शनार्थ निकला हुआ है, तो कोई अपने पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में स्थित देवी-देवताओं के दर्शनार्थ चल पड़ा है।

भारत के पड़ोसी मित्र राष्ट्र नेपाल को हिमालयी राष्ट्र भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में दुनियाभर में जितने भी देव स्थल है, उसमें नेपाल का भी जिक्र प्रमुखता से आता है। नेपाल में हिंदुओं की आस्था के प्रमुख धर्मस्थलों में काठमांडू स्थित बाबा पशुपतिनाथ का प्रमुख स्थान है। उसके बाद सुदूर पहाड़ों पर वास करने वाले प्रभु नाथ, मुक्ति नाथ, सूपा देवराली और मनोकामना देवी मंदिर का नाम आता है। इन सभी देवी-देवताओं की अपनी अपनी महत्ता और महात्म्य है। इन दिनों नेपाल के इन सभी देव स्थलों के दर्शनार्थ भारतीय श्रद्धालुओं का जत्था निकला हुआ है। काठमांडू के बाबा पशुपतिनाथ को छोड़ लगभग सभी देवस्थल तक पहुंचना आसान नहीं है, फिर भी श्रद्धा और भक्ति भाव से लबरेज श्रद्धालु सुदूर पहाड़ों पर स्थित देवी-देवताओं तक पहुंच ही जाते हैं।

नेपाल के सुदूरवर्ती पहाड़ पर स्थित देवी स्थानों में एक मनोकामना देवी का मंदिर भी है। नेपाल के गोरखा जिले में स्थित एक हजार तीन सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित मनोकामना मंदिर देवी भगवती यानी पार्वती के अवतार को समर्पित एक विख्यात और पवित्र हिन्दू शक्ति पीठ है। मनोकामना का शाब्दिक अर्थ है मन की इच्छा पूरी करने वाली! जाहिर है श्रद्धालु जब नेपाल के देव स्थलों के दर्शनार्थ जाते हैं, तो मनोकामना मंदिर का दर्शन उनकी प्राथमिकताओं में होता है।

रहस्यमयी कथाओं से भरा है मंदिर का इतिहास 

जनश्रुति के अनुसार इस मंदिर की स्थापना 17 वीं शताब्दी यानी 1678 ईसवी में गोरखा के राजा राम शाह के शासन काल में हुआ है। पौराणिक कथाओं और स्थानीय निवासियों के अनुसार राजा राम शाह की पत्नी अलौकिक दिव्य शक्तियों की रानी थीं। इसकी जानकारी केवल उनके भक्त लखन थापा को थी। ऐसा कहा जाता है कि राजा राम शाह अपनी रानी के इस रहस्यमयी शक्तियों से नावाकिफ थे। राजा राम शाह को जब रानी में इस दिव्य शक्ति की जानकारी हुई तो कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। उस वक्त सती प्रथा का प्रचलन था सो रानी अपने पति की चिता के साथ सती हो गईं। इस घटना से रानी के भक्त लखन थापा को बहुत कष्ट हुआ था। सती होने के पहले रानी ने लखन थापा को वचन दिया था कि वह किसी न किसी रूप में एक बार फिर प्रकट होंगी। लखन थापा इसी दिन की प्रतीक्षा में गोरखा जिले के पहाड़ों पर भटकता रहा तभी उसे एक दिन खबर मिली कि पहाड़ के ही एक किसान को अपने खेत में ऐसा पत्थर मिला है, जिसमें दूध और रक्त एक साथ बह रहा है। 

लखन थापा यह खबर सुनते ही उस किसान के खेत में पंहुच गया। खून और दूध के रिसाव वाले पत्थर को देख उसे दिव्य शक्तियों वाली रानी का दिया हुआ वचन याद आ गया कि “किसी भी रूप में वे एक बार फिर प्रकट होंगी”। लखन थापा ने रानी का स्मरण करते हुए उस स्थान पर तप और साधना प्रारंभ कर दी। लखन थापा के साधना के कुछ ही दिन बाद पत्थर से दूध और रक्त का रिसाव बंद हो गया। बाद में इसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण हुआ, जिसे मनोकामना मंदिर कहा गया। इस मंदिर के प्रारंभिक पुजारी लखन थापा थे। जैसा कि बताया गया कि आज भी मनोकामना मंदिर के जो पुजारी हैं वे लखन थापा के ही वंशज हैं, जो मगर समुदाय से आते हैं। बताते हैं कि नेपाल के जनक पृथ्वी नारायण शाह ने इस मंदिर का दर्शन कर नेपाल के प्रथम राजा के दायित्व की शुरुआत की थी।

मंदिर तक पंहुचने के लिए केबल कार है सुरक्षित माध्यम 

इस मंदिर तक पंहुचने के लिए मुगलिंग नामक स्थान से केबल कार से जाना होता है। मुगलिंग नेपाल का ऐसा सेंटर है, जहां चाहे जिस ओर से काठमांडू जाइए, यहां आना ही होता है। मुगलिंग से काठमांडू की दूरी सौ किलोमीटर है और काठमांडू से मनोकामना मंदिर की दूरी 140 किलोमीटर है, जबकि मुगलिंग से मनोकामना मंदिर की दूरी 40 किलोमीटर है, जो पहाड़ों के ऊपर होकर जाता है। मुगलिंग से ही मंदिर तक जाने के लिए मनोकामना केबल कार की सुविधा उपलब्ध है, जो 15-20 मिनट में मंदिर के निकट तक पहुंचा देती है। मनोकामना मंदिर के दर्शन के लिए यूं तो कोई खास समय तय नहीं है, लेकिन दशहरा के समय यहां भारी भीड़ उमड़ती है। दशहरा नेपाल का प्रमुख हिंदू पर्व है, जो पूरे दस दिन तक मनाया जाता है। इस दौरान नेपाल के सरकारी संस्थाओं में पूरे दस दिन तक छुट्टियां रहती हैं। अष्टमी के दिन मनोकामना मंदिर पर बलि चढ़ाने की परंपरा आज भी कायम है। मनोकामना मंदिर तक जाने के लिए केबल कार के अलावा सड़क मार्ग भी है, लेकिन यह काफी जोखिम भरा होता है यहां दुर्घटनाओं की संभावना सदैव बनी रहती है। इसलिए लोग केबल कार से ही जाना पसंद करते हैं।

यशोदा श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार