यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस को याद आया संगठन
समझा जाता है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिला संगठनों की कार्यशैली पर गौर किया है और इसी वजह से उसे जिला संगठन की मजबूती का खयाल आया।
वरिष्ठ पत्रकार
आजकल यूपी में कांग्रेस संगठन को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की कवायद जोर शोर से चल रही है। इसकी शुरुआत नए सिरे से जिला अध्यक्षों के चयन से हो रही है। यूपी के सभी 75 जिलों में दो लेयर आब्जर्वर उतार दिए गए हैं। एक पार्टी के केंद्रीय संगठन और दूसरे यूपी की कमेटी से भेजे गए हैं। ये आब्जर्वर अपनी तैनाती वाले जिलों में एक सप्ताह गुजारेंगे। विधानसभावार पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक करेंगे और उन्हीं से मौजूदा अध्यक्ष की कार्यशैली का फीडबैक लेंगे और यदि मौजूदा अध्यक्ष को बदलना हो, तो किसे मौका दिया जाए, इस पर चर्चा करेंगे।
यूपी में रायशुमारी से जिलाध्यक्षों के चयन की यह प्रक्रिया संभवतः पहली बार या मुद्दतों बाद देखने को मिल रही है। इस प्रक्रिया में अध्यक्ष पद के दावेदारों का आवेदन पहले ही लिया जा चुका है। कांग्रेस के एक यूपी प्रवक्ता के अनुसार एक जिले से मौजूदा जिलाध्यक्ष सहित कम से पांच छः लोगों ने अध्यक्ष की दावेदारी के लिए आवेदन कर रखा है। कांग्रेस के भीतर संगठन को लेकर इस प्रयोग की तारीफ हो रही है, कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी और समर्थक यूपी कांग्रेस संगठन में आमूलचूल परिवर्तन के लिए इसे अच्छा प्रयास मान रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बात की आशंका भी है कि कहीं कांग्रेस की यह कवायद नई बोतल में पुरानी शराब न सिद्ध हो।
यूपी कांग्रेस के जिला संगठन की अभी जो मौजूदा हालत है, अपवाद स्वरूप एकाध जिलों को छोड़ दें तो बेहतर नहीं है। इस बात से कांग्रेस का केंद्रीय और प्रदेश संगठन अच्छी तरह वाकिफ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में साफ देखा गया कि अधिकांश जिला संगठन पूरी तरह खामोश था। जहां कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे, वहां भी और जहां सपा उम्मीदवार मैदान में थे, वहां भी। लोकसभा का यह चुनाव कांग्रेस और सपा मिल कर लड़े थे और अनुपात के हिसाब से दोनों ही दलों को बेहतर कामयाबी मिली थी। डबल इंजन की सरकार के बावजूद भाजपा यहां बुरी तरह पिट गई थी, यहां तक कि वह अयोध्या सीट भी हार गई थी। 17 सीट पर लड़कर कांग्रेस छः सीटें जीत पाई थी। कांग्रेस का जिला संगठन यदि थोड़ा भी ईमानदार और सक्रिय होता तो उसे अमरोहा, महराजगंज, देवरिया, कानपुर तथा गोरखपुर की बांसगांव सीट भी हाथ लग जाती।
समझा जाता है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिला संगठनों की कार्यशैली पर गौर किया है और इसी वजह से उसे जिला संगठन की मजबूती का खयाल आया, हालांकि दो साल पहले यूपी के कुछ जिलों में जिलाध्यक्ष बदले भी गए थे, लेकिन इन दो सालों में उनसे भी कोई उम्मीद नहीं दिखी। बेशक प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने अपना तीन साल का कार्यकाल ठीक-ठाक पूरा किया है, लेकिन उनका हाल बिना सैनिक के सेनापति जैसा ही है। यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस की यह कवायद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अभी जैसा कि कांग्रेस और सपा में तारतम्य देखा जा रहा है, उस हिसाब से ज्यादा उम्मीद है कि दोनों दल विधानसभा का चुनाव साथ लड़ें।
उधर, दोनों ओर से कुछ उत्साही नेता अलग-अलग चुनाव लड़ने की बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे। कांग्रेस के सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद की बयानबाजी कांग्रेस को असहज करती है। मुस्लिम मतदाताओं का रुझान सपा और कांग्रेस की ओर है, लेकिन मात्र इनके ही वोटों से न सपा जीत सकती है और न ही कांग्रेस! जिला संगठन में ऐसे लोगों का चयन जरूरी है, जो ऐसे बड़बोले नेताओं का काउंटर कर सकें। कांग्रेस को जिला संगठन के नवनिर्माण में इस बात का ख्याल रखना होगा। जिस जेन जी ने 2014,19 और 24 में भाजपा पर भरोसा जताया था, अब उनका भरोसा टूट रहा है। दिल्ली का जंतर-मंतर और झारखंड के छात्र आंदोलन का संदेश यही है। राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में उमड़ती भीड़ भी युवाओं के करवट बदलने का संकेत है।
इन युवा वोटरों को अन्यत्र छिटकने से रोकने के लिए मजबूत जिला संगठन जरूरी है। सब कुछ कांग्रेस का केंद्रीय संगठन ही नहीं कर सकता, इसके लिए जिलों में जो आब्जर्वर भेजे गए हैं, उन्हें ज्यादा सतर्क रहकर जिलाध्यक्षों का चयन करना होगा। लोकसभा चुनाव में साफ देखा गया कि जहां सपा उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे, वहां कांग्रेस संगठन बड़ी चालाकी से दूसरे दल के उम्मीदवार की मदद कर भाजपा को फायदा पहुंचाने में मशगूल था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम से कम चार लोकसभा सीटों का चुनाव सपा इसी वजह से हार गई। यूपी में कांग्रेस का हाल किसी से छुपा नहीं है। 2022 में प्रियंका गांधी का धूम मचाता नारा ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ की हवा फुस्स हो गई थी। सिर्फ दो विधायक विधानसभा तक पहुंच पाए थे। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
