संपादकीय : समुद्र में साझेदारी

Amrit Vichar Network
On

हिंद-प्रशांत की सामरिक प्रतिस्पर्धा केवल युद्धपोतों और मिसाइलों की होड़ नहीं रह गई है। समुद्री निगरानी, सूचना-साझेदारी, आपूर्ति-शृंखला, बंदरगाहों और समुद्री मार्गों पर प्रभाव- ये सभी अब शक्ति-संतुलन के औजार हैं। ऐसे में भारत और जापान के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग संबंधी समझौता समुद्री क्षेत्र की जागरूकता, सूचनाओं के आदान-प्रदान, खोज एवं बचाव तथा मानवीय सहायता जैसे व्यावहारिक सहयोग को मजबूत करने के साथ युद्धपोतों के डिजाइन और निर्माण में संयुक्त संभावनाओं का द्वार बनेगा। 

इस समझौते का सबसे बड़ा महत्व चीन के संदर्भ में है, चीन दक्षिण चीन सागर में अपने विस्तृत समुद्री दावों, पूर्वी चीन सागर में जापान के साथ विवाद और हिंद महासागर में बंदरगाहों तथा समुद्री गतिविधियों के विस्तार के जरिए अपनी सामरिक पहुंच बढ़ा रहा है। भारत और जापान दोनों के लिए चिंता यह है कि समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता और मौजूदा स्थिति को किसी ताकत के दबाव से कैसे निकाला जाए।

नया समझौता चीन को तत्काल रोक देने वाला कोई सैन्य कवच नहीं है। उसका वास्तविक प्रभाव ‘निवारण’ में होगा। यदि भारतीय नौसेना और जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स के पास अधिक साझा समुद्री सूचना, बेहतर निगरानी, संयुक्त अभ्यास और परस्पर परिचालन अनुभव होगा, तो हिंद-प्रशांत में किसी भी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाना और उस पर सामूहिक प्रतिक्रिया देना आसान रहेगा। भारत के लिए इसका अर्थ हिंद महासागर में अपनी समुद्री जागरूकता बढ़ाना और जापान के लिए पश्चिमी प्रशांत से आगे विश्वसनीय साझेदारी का विस्तार है। सितंबर में यदि शी जिनपिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली आते हैं, तो यह समझौता भारत की स्थिति को और स्पष्ट करेगा। चीन के साथ संवाद और तनाव-नियंत्रण की जारी कोशिशों के बीच भारत का संदेश यह होगा कि संवाद का अर्थ सामरिक निष्क्रियता नहीं है।

जापान की अपनी सुरक्षा चिंताएं भी इस साझेदारी की वजह हैं। पुतिन के दौरे के बाद रूस के साथ कुरील द्वीप संबंधी विवाद तीखा होता जा रहा है। इसके साथ चीन-रूस सैन्य निकटता और उत्तर कोरिया-रूस संबंध जापान के रणनीतिक संकट को और जटिल बनाते हैं। जापान द्वारा 2027 तक ‘शील्ड’ नामक बहुस्तरीय तटीय रक्षा व्यवस्था विकसित करने की योजना भी रूस को खटक रही है।

ईरान युद्ध से बदलती अमेरिकी प्राथमिकताओं के बीच टोक्यो स्वाभाविक रूप से बहुस्तरीय साझेदारियां चाहता है। अमेरिका उसका प्रमुख सुरक्षा सहयोगी बना रहेगा, लेकिन भारत भी विशेष महत्व रखता है। जापान से नजदीकी रूस से उसके पुराने संबंधों पर क्या असर डालेगी देखना होगा, हालांकि पुतिन से मोदी की निकटता और जापान के साथ भारत की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी विरोधाभासी नहीं हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष सैन्य दबाव के बजाय सामरिक संकेत के बतौर होगा। 

फिलहाल नई दिल्ली का उद्देश्य किसी एक धुरी में शामिल होना नहीं, बल्कि विभिन्न शक्तियों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखते हुए रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रखना है। इस समझौते की असली परीक्षा कागज पर नहीं, समुद्र में होगी। यदि सूचना-साझेदारी से लेकर संयुक्त अभ्यास, जहाजों की मरम्मत, तकनीक हस्तांतरण और युद्धपोत निर्माण तक सहयोग वास्तविक क्षमता में बदलता है, तभी यह चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति के सामने प्रभावी संतुलन पैदा करेगा।