मानव मेधा और विवेक की परीक्षा एआई से नहीं
यूजीसी-नेट एग्जाम पेपर बनाने और ट्रांसलेट करने में एआई का इस्तेमाल हुआ था, जिसके बाद खराब तरीके से हुए तीन टेस्ट कैंसिल करने में छह हफ़्ते की बिना वजह की जो देरी हुई वह भी विवाद की जड़ है।
नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट के विवाद के बारे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि सवालों का ड्राफ्ट बनाने के लिए एआई का इस्तेमाल हुआ था। अलबत्ता नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने एआई के इस्तेमाल से किया इनकार है, जबकि मंत्रालय के एक अधिकारी ने एड-हॉक अर्थात लापरवाही से पेपर सेटिंग का हवाला दिया। परीक्षा पेपर सेट करने के लिए एआई का प्रयोग इतनी बड़ी बात नहीं, जितना यह कि हम एक ऐसे भंवर में फंसने को तत्पर प्रतीत होते हैं, जिससे व्यापक सूचना स्रोत या डाटा बेस तक पहुंच रखने वाले एआई के लार्ज लैंग्वेज मॉडल मानव मेधा और विवेक की परीक्षा लेने लगेंगे।
पेपर सेट करने के लिए एआई की मदद लेना सिर्फ सांकेतिक तौर से ठीक है, लेकिन व्यापक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में यह नैतिकता और इंसानियत के मौलिक स्तर का उल्लंघन है। विवादित परीक्षाओं का घटनाक्रम तय करना इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना, यह कि एआई के इस्तेमाल के लिए उन सीमाओं को तय करना, जहां से आगे वह यह तय न करने लग जाए कि हम कितना विवेकशील और जागरूक हैं।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की परीक्षा प्रणाली को सख्त करना शुरू कर दिया है। शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने 18 अगस्त को उच्च शिक्षा विभाग के सचिव, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के महानिदेशक और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसमें भविष्य की परीक्षाओं में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा की गई थी।
सामान्य तरीके में चार-पांच एक्सपर्ट्स का पैनल क्वेश्चन पेपर सेट करता है। शंका जाहिर करने और आरोप लगाने वाले एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोई पैनल था, तो यह अजीब है कि पिछले सालों के इतने सारे सवाल कैसे चुने गए और, नए प्रश्न क्यों नहीं गढ़े जा सके। पेपर सेटर्स और एग्जामिनर्स के पास इन सवालों के जवाब नहीं थे, जिन्होंने क्वेश्चन पेपर्स डिज़ाइन किए थे और जो परीक्षार्थियों को वितरित किए गए थे। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के डायरेक्टर जनरल अभिषेक सिंह ने एआई के इस्तेमाल से इनकार करते हुए कहा है कि पेपर सेट होने के बाद ‘ह्यूमन रिव्यू’ किया गया था, अर्थात मानवीय समीक्षा की गई, परंतु गलतियों पर ध्यान कैसे नहीं गया, इस पर वे चुप साध गए।
क्वेश्चन पेपर्स की व्यापक जांच से यह मालूम हुआ कि इन्हें प्री-अरेंज करने, अर्थात एक मॉडल पेपर बनाने के लिए एआई का ही इस्तेमाल हुआ है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी से जुड़े पुराने सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स ने कुछ समय पहले ही कहा था कि एआई का इस्तेमाल न सिर्फ़ यूजीसी-नेट के सवाल सेट करने में बल्कि नीट-यूजी के पेपर्स को ट्रांसलेट करने में भी किया गया था। उन्होंने गलतियों के स्केल और नेचर के लिए इंसानी जांच की कमी को ज़िम्मेदार ठहराया। पेपर्स सेटर्स यह भी मालूम नहीं कर पाए कि जीएस घूरिये भारत के एक नामी सोशल साइंटिस्ट हुए।
मुख्य प्रश्न यह है कि एआई के इस्तेमाल की इजाज़त किसने दी और सवाल लिखने के लिए कौन से टूल्स इस्तेमाल किए गए? क्या क्वालिफाइड एक्सपर्ट्स ने सवालों की जांच की थी, जिसके लिए तथाकथित तौर पर एजेंसी ने एग्जाम मटीरियल, खासकर ट्रांसलेशन, तैयार करने में एआई को इंटीग्रेट किया था? ऐसा मालूम होता है कि एजेंसी के अधिकारी आंसर-कीज़ इसलिए डिक्लेयर नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि पेपर्स एड-हॉक तरीके से अथवा कहें तो एआई के इस्तेमाल से लापरवाही से डिज़ाइन किए गए थे। गड़बड़ियों के सामने आने के बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के रवैये पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सोशियोलॉजी की परीक्षा की कड़ी आलोचना हुई। उम्मीदवारों ने शिकायत की कि, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर विद्वानों के नाम गलत लिखे गए थे। शब्दावली उलझी हुई थी। अनुवाद अजीब थे और सवाल तय सिलेबस से मेल नहीं खाते थे। खबरों के मुताबिक, जॉर्ज रिट्ज़र को पुट्ज़र, टैल्कोट पार्सन्स को पारसोव, जीएस घूरिये को घुनये लिखा गया था और मार्था नुसबाम का नाम भी गलत लिखा गया था। इंग्लिश के पेपर में बड़े पैमाने पर सवालों के दोहराए जाने को लेकर अलग चिंता जताई गई।
उम्मीदवारों का आरोप था कि 150 में से लगभग 67 सवाल पहले हुई यूजीसी–नेट परीक्षा में पूछे जा चुके थे। कुछ का तो यह भी दावा था कि जवाब के विकल्पों का क्रम भी वही रखा गया था, जो कि पुराने से लिफ्ट किया गया। कॉमर्स के उम्मीदवारों ने भी बताया कि कई सवाल पिछली परीक्षाओं से दोहराए गए थे, जिनमें टैक्सेशन, ब्रेक-ईवन एनालिसिस, कैपिटल स्ट्रक्चर और सर्विस मार्केटिंग से जुड़े सवाल शामिल थे। ये सवाल कैसे दोहराए गए, इसका पक्का पता नहीं चल पाया है।
महत्त्वपूर्ण स्तर की राष्ट्रीय परीक्षाओं के लिए अनुवाद, आयोजन और उनके लिए तैयारी करने में ऑटोमेटेड सिस्टम का कितना इस्तेमाल किया गया और क्या उस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद इंसानी एकेडमिक समीक्षा ठीक से की गई या नहीं, यह साफ़ होना जरूरी है। यूजीसी-नेट भारत के विश्वविद्यालयों में टीचिंग और रिसर्च करियर के लिए योग्यता तय करता है, इसलिए परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता बहुत अहम है।
नए दावों ने खराब पेपर-सेटिंग से आगे बढ़कर विवाद को और गहरा कर दिया है, क्योंकि ये दावे सवाल उठाते हैं कि एआई के इस्तेमाल की मंज़ूरी किसने दी, कौन से टूल इस्तेमाल किए गए, क्या काबिल एक्सपर्ट्स ने हर सवाल की जांच की और मंत्रालय की राय के बावजूद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने परीक्षा रद्द करने में देरी क्यों की। अब मुख्य सवाल यह नहीं है कि तीन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में इतनी गलतियां कैसे हुईं, बल्कि यह कि परीक्षा प्रक्रिया का कितना हिस्सा मशीनों के हवाले कर दिया गया था और क्या मशीनों द्वारा लार्ज लैंग्वेज मॉडल की मदद से तैयार की गई चीज़ों की जांच के लिए पर्याप्त काबिल लोग मौजूद थे।
