संपादकीय : युवा संवाद की सियासत

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भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम की पहली बैठक में मिशन 2029, आगामी विधानसभा चुनाव, बूथ स्तर तक संगठन की मजबूती और ‘सेवा संकल्प अभियान’ पर जोर स्वाभाविक और रणनीतिक भी है। यह टीम ऐसे समय में काम संभाल रही है, जब 2027 में उत्तर प्रदेश सहित कई महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव सामने हैं, इसलिए संगठन का चुनावी मोड में आना सामान्य है, लेकिन इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण संकेत चुनावी तैयारियों से अधिक युवाओं और जेन-जी तक पहुंच बनाने के निर्णय में छिपा है।

भाजपा ने जेन-जी और युवाओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद बढ़ाने उनकी अपेक्षाएं जानने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित कई दिग्गज नेताओं की आउटरीच टीम बनाई है। यह केवल संगठनात्मक विस्तार नहीं, बदलती मतदाता संरचना की स्वीकारोक्ति है, इसीलिए सोशल मीडिया पर संदेश प्रसारित करने के अलावा भाजपा युवाओं के बीच जाकर उनकी बात सुनने को महत्व देते दिख रही है। इसका एक कारण कांग्रेस की पहल भी है। इससे यह संकेत मिलता है कि विपक्ष ने युवाओं के असंतोष को राजनीतिक भाषा देने की कोशिशें शुरू कर दी है। पुणे में कार्यक्रम से पहले एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच तनाव भी बताता है कि छात्र राजनीति फिर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का सक्रिय मैदान बन सकती है। 

भाजपा के लिए चुनौती इसलिए गंभीर है कि उसके सामने केवल विपक्ष नहीं, बल्कि रोजगार, परीक्षा और भविष्य की अनिश्चितता से जूझती एक विशाल युवा आबादी है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 15-29 वर्ष के करीब 8.7 करोड़ युवा न शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न प्रशिक्षण में। यह आंकड़ा 2021 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण पर आधारित है, इसलिए आज की वास्तविक संख्या संभव है इससे अधिक ही हो। विडंबना यह भी है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 से अब तक 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिए जाने के बावजूद कौशल और रोजगार के बीच भारी अंतर बना हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार में हैं। भाजपा के लिए युवा संवाद की असली परीक्षा यह होगी कि युवा भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहा है। जो जानने से ज्यादा यह सुनना चाहता है कि उसकी डिग्री का उपयोग कहां होगा, परीक्षा की प्रक्रिया विश्वसनीय होगी या नहीं, नौकरी कब मिलेगी और कौशल प्रशिक्षण के बाद आमदनी का रास्ता क्या होगा। लंबे समय से सत्ता में रही पार्टी के सामने इन सवालों के उत्तर केवल योजनाओं और आंकड़ों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से देने होंगे। 

आने वाले चुनावों में ‘यूथ कनेक्ट’ इसलिए महज राजनीतिक फैशन नहीं रहेगा। शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, रोजगार, कौशल, स्टार्टअप, अप्रेंटिसशिप और युवाओं की सामाजिक गतिशीलता चुनावी विमर्श के केंद्रीय विषय बन सकते हैं। भीड़ राजनीति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन स्थायी राजनीतिक परिवर्तन तभी होगा जब संवाद शिकायत से नीति और नीति से अवसर तक पहुंचे। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए संदेश स्पष्ट है— युवा अब केवल वोट बैंक नहीं, प्रश्न पूछने वाला राजनीतिक पक्ष है। जो दल उसकी आवाज सुनने के साथ उसके सवालों का ठोस उत्तर देगा, वही चुनावी राजनीति में बढ़त बनाएगा।