बरेली: केंद्रीय कारागार में क्रांतिकारियों ने की थी ऐतिहासिक भूख हड़ताल
बरेली, अमृत विचार। केंद्रीय कारागार बरेली जंग-ए-आजादी की कई गाथाएं समेटे हुए है। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में जेलों के अंदर बंदी क्रांतिकारियों की बगावत के कई किस्से हैं। इनमें काकोरी मुकदमें के बंदियों की भूख हड़ताल ऐसी घटना है जिसने उन दिनों देश भर में चर्चा बटोरी। भूख हड़ताल के दौरान क्रांतिकारियों को दी …
बरेली, अमृत विचार। केंद्रीय कारागार बरेली जंग-ए-आजादी की कई गाथाएं समेटे हुए है। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में जेलों के अंदर बंदी क्रांतिकारियों की बगावत के कई किस्से हैं। इनमें काकोरी मुकदमें के बंदियों की भूख हड़ताल ऐसी घटना है जिसने उन दिनों देश भर में चर्चा बटोरी। भूख हड़ताल के दौरान क्रांतिकारियों को दी जाने वाली यात्नाओं के बारे में सुनकर सिहरन पैदा होती है।
उन दिनों चर्चित काकोरी मुकदमें के क्रांतिकारियों को केंद्रीय कारागार बरेली में रखा गया था। यह वह क्रांतिकारी थे जिन्हे लंबे कारावास की सजा सुनाई गई थी। स्थानीय मांगों को लेकर मन्मथनाथ गुप्ता, शचींद्रनाथ बख्शी, मुकुंदीलाल और राजकुमार सिन्हा समेत सैकड़ों बंदियों ने यहां भूख हड़ताल शुरू कर दी। क्रांतिकारी जेल के राजनीतिक बंदियों को बेहतर सुविधाएं देने और उनके अधिकारों के लिए भूख हड़ताल पर चले गए। जिससे अनशन कर रहे क्रांतिकारियों की हालत कई बार बिगड़ी मगर वह टस से मस नहीं हुए।

क्रांतिकारियों की मांग थी कि उन्हे बेहतर खाना दिया जाए, राजनीतिक बंदियों से श्रम न कराया जाए, लिखने-पढ़ने के लिए कागज कलम और अखबार मुहैया कराया जाए। इन मांगों को जेल प्रशासन द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा था। भूख हड़ताल खत्म कराने के लिए क्रांतिकारियों को बलात्पान कराया जाता था। जबरदस्ती नली डालकर दूध पिलाने के प्रयास किए जाते। जिससे क्रांतिकारियों की स्थिति बिगड़ती चली गई।

भूख हड़ताल को खत्म कराने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने लाहौर जेल से उनके नाम एक तार भेजा। भगत सिंह ने अपने पिता सरदार किशन सिंह के जरिए भी हड़ताल खत्म कराने का प्रयास किया, गणेश शंकर विद्यार्थी की कोशिश भी बेकार गई। आखिर में 53वें दिन क्रांतिकारियों की मांगे सरकार द्वारा मान ली गईं तब जाकर भूख हड़ताल खत्म की गई।

दामोदर स्वरूप सेठ ने किया भूख हड़ताल का प्रचार प्रसार
काकोरी के क्रांतिकारियों की इस हड़ताल को आज भी ऐतिहासिक भूख हड़ताल माना जाता है। ब्रिटिश काल के दौरान जेल के अंदर हुई यह ऐसी बगावत थी जिसने अंग्रेज हुकूमत को झुकने पर मजबूर कर दिया। क्रांतिकारी दामोदर स्वरूप सेठ आंदोलन के दौरान बरेली के अखबारों से लगातार जेल अंदर हो रही भूख हड़ताल को खूब प्रचारित कर रहे थे जिसकी वजह से अनशनकारी बंदियों का जनसमर्थन भी बढ़ता चला गया। अखबारों में छपने वाले समाचारों की कतरने भी चोरी छिपे क्रांतिकारियों को प्राप्त होती थीं।

फैल गई थी क्रांतिकारियों की मौत की अफवाह
भूख हड़ताल के दौरान एक बार केंद्रीय कारागार के बाहर लोगों की भीड़ जुट गई। जेल के अंदर अनशनकारियों की मौत की अफवाह फैल गई। जिसके बाद लोग केंद्रीय कारागार के बाहर जमा होने लगे हालांकि यह सूचना गलत थी। बता दें कि जिस समय काकोरी के बंदी बरेली केंद्रीय कारागार में लाए गए तब यहां बंगाल के क्रांतिकारी गणेश घोष और प्रतुल भट्टाचार्य को नजरबंद रखा गया था। क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने काकोरी के शहीदों पर पहली पुस्तक इसी जेल के भीतर लिखी, जिसे गणेश घोष के छूटने पर बाहर भिजवाया, छपने के बाद यह किताब जब्त कर ली गई।

चंद्रशेखर आजाद ने बनाई थी क्रांतिकारियों को आजाद कराने की योजना
चंद्रशेखर आजाद ने तो बरेली कारागार में बंद इन क्रांतिकारियों को जबरन छुड़ाने की तैयारी भी कर ली थी। इसके लिए वह बरेली आए और बाहर रहे पुराने क्रांतिकारी दामोदर स्वरूप सेठ से संपर्क स्थापित किया। यह सूचना जेल के भीतर अनशनकारी क्रांतिकारियों तक भी पहुंचा दी गई, लेकिन उनकी नाजुक हालत को देखते हुए योजना स्थगित करनी पड़ी।
उपरोक्त तथ्य लेखक सुधीर विद्यार्थी की पुस्तक बरेली एक कोलाज से लिए गए हैं
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