हिन्दी भारत की जनभाषा, राजभाषा है फिर भी यह आज भी राष्ट्रभाषा नहीं
विभिन्न स्रोतों के अनुसार भारत में 121 भाषायें, 270 मातृबोलियां हैं और इनमें से मात्र 22, भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची सूची भाग अ में प्रमुखता से वर्णित हैं। भाग ब में 99 अन्य बोली – भाषाओं का जिक्र है। लफ़्फाजी करें तो यह भारत के वैविध्यपूर्ण प्रतिभा की अभिव्यक्ति है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर …
विभिन्न स्रोतों के अनुसार भारत में 121 भाषायें, 270 मातृबोलियां हैं और इनमें से मात्र 22, भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची सूची भाग अ में प्रमुखता से वर्णित हैं। भाग ब में 99 अन्य बोली – भाषाओं का जिक्र है। लफ़्फाजी करें तो यह भारत के वैविध्यपूर्ण प्रतिभा की अभिव्यक्ति है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर देखें तो विश्वस्तर पर हमारी सृजनात्मकता की राह में यही सबसे बड़ा रोड़ा भी है। विश्व के सभी विकसित देशों की अपनी एक प्रमुख भाषा है। हमारी निज भाषा कौन है, भारत का क्षेत्रीय बुद्धिजीवी इस पर शोर करने लगता है।
बंगला, मराठी, मलयालम, कन्नड़, तमिल, तेलगू, असमिया गुजराती आदि भारतीय भाषाओं के बुद्धिजीवी, सभी सर्वथा उचित ही अपनी अपनी भाषा के श्रेष्ठता बोध से ग्रस्त हैं। किन्तु एक तरह से ये सभी भाषायें ही हिन्दी की दुश्मन बनी हुई हैं, सहयोग के बजाय वे डाह रखती हैं। मगर दुखद यह है कि भाषाओं के इस ढ़ेर के बावज़ूद भी हमारा बहुत कम साहित्य ऐसा है जिसे हम राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय स्तर का साहित्य उद्घोषित कर सकें।
मेरी थोड़ी बहुत गति साइंस फिक्शन यानि विज्ञान कथा में है। चीन, कोरिया, जर्मन, फ्रांस, चेक, रोमानिया, जापान, बेल्जियम आदि के साईंस फिक्शन के विद्वान मुझसे इन्डियन साइंस फिक्शन पर प्रायः लिखने का अनुरोध करते रहते हैं। मुझे उन्हें समझाने में बड़ी असुविधा, असहजता और पीड़ा होती है कि भारत में किसी एक भाषा का /में साइंस फिक्शन साहित्य नहीं है, वह कई कई क्षेत्रीय भाषाओं में बिखरा हुआ है। उन्हें भी बड़ा आश्चर्य होता है, क्यों कि उन सभी की साहित्यिक /बौद्धिक अभिव्यक्ति की प्रमुख भाषा है और वह प्रायः केवल एक ही है।
हमारी इस विवशता या कमजोरी का फायदा गुलामी की भाषा में पारंगत जमीन से कटे अंग्रेजी के साहित्यकार बखूबी उठाते रहे हैं। वे यही दर्शाते हैं कि श्रेष्ठ भारतीय विज्ञान कथा साहित्य केवल और केवल अंग्रेजी में है जबकि यह एक बहुत बड़ा झूठ है। हिन्दी, बंगला, कन्नड़, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू आसामी आदि में स्तरीय विज्ञान कथा साहित्य उपलब्ध है। मगर अंग्रेजी में या अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित न होने के कारण उसका पाठक वर्ग बहुत सीमित है।
काश बौद्धिक विमर्श की भारत की केवल एक भाषा होती जिससे हम अपनी अन्तरराष्ट्रीय पहचान स्थापित कर पाते। मगर हम भाषायी क्षेत्रवाद की लड़ाई में निरंतर अपनी पहचान खोते जा रहे हैं और एक विदेशी भाषा के आज भी मुहताज बने हुये हैं। आखिर हिन्दी में क्या कमी है? संख्या के हिसाब से यह विश्व में चौथे नंबर पर बोली जा रही है। भारत की जनभाषा (लिंगुआ फ्रैंक) भी यही है। राजभाषा भी। फिर भी यह आज भी राष्ट्रभाषा नहीं है।
आखिर संस्कृत कभी पूरे भारत में बुद्धिजीवियों की भाषा थी। आज भी समूचे भारत में संस्कृत को लेकर कोई विरोध नहीं है, हां असमर्थता अवश्य है। वह भी समय रहते दूर हुई होती तो हमारे अन्तरराष्ट्रीय अभिव्यक्ति की यह एक सक्षम भाषा होती। शायद अब भी ऐसा हो सकता है? ऐसी व्याकरण सम्मत, प्रवाहमयी भाषा विश्व में शायद ही कोई हो। आज इसी भाषा में होने के कारण ही ऋग्वेद से लेकर एक विपुल ज्ञान स्रोत का वांग्ङमय संरक्षित है। इस भाषा में ही रचित श्रीमद्भगवद्गीता अन्तरराष्ट्रीय स्तर का ग्रंथ है।
हमें भाषा के मामले में अपने टुच्चे आग्रहों को छोड़ना होगा। बिना इसके वैश्विक स्तर पर हमारी पहचान बननी मुश्किल है। हम ‘भारतीय अंग्रेज़ी’ के जरिये विश्व साहित्य के मुकाबले नहीं खड़े हो सकते। एक से एक उत्कृष्ट सृजन विदेशियों के द्वारा अंग्रेजी में पहले से ही उपलब्ध हैं और नित नयी कृतियां बेस्ट सेलर बन रही हैं।
हम नोबेल नहीं पाते, आस्कर नहीं ले पाते? ह्यूगो, नेबुला नहीं ले पाते? आखिर क्यों? हमारी अंग्रेजी का प्रायः दोयम दर्जे का साहित्य उनके मुकाबले नहीं ठहरता। गीतांजलि को नोबेल मिला तब जब वह अंग्रेजी में अनूदित हुई। मैं क्षेत्रीय भाषाओं का विरोधी नहीं हूं। मगर उस क्षेत्रीय राजनीति के चलते जिससे हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सपना साकार नहीं हो पा रहा है देश की प्रगति के बड़े अवरोधकों के रुप में देखता हूं।
शायद आज हमारा राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाना चाहिए। या फिर अन्य प्रादेशिक या क्षेत्रीय भाषाओं के सृजनात्मक मौलिक साहित्य को अधिकाधिक हिन्दी में अनूदित कर उनका विशाल पाठक वर्ग बनाया जाय, साथ ही हिन्दी को भी और समृद्ध किया जाय।
- डॉ. अरविंद मिश्रा
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