जेठ मास सी तपे दोपहरी, मैं सावन बन जाऊं…

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

जेठ मास सी तपे दोपहरी, मैं सावन बन जाऊं तुमको। पतझड़ के वीरानेपन में, मैं गुलशन बन जाऊं तुमको। भूल गया सब अपनेपन में, अंतर मन की बात सुनो तुम, सारा प्यार लुटाकर तुमपर, मैं साजन बन जाऊं तुमको। अमर कहानी लैला मंजनू, इतना तुमको प्यार करूं मैं। तुम राधा बन जाओ मेरी, मैं कान्हा …

जेठ मास सी तपे दोपहरी,
मैं सावन बन जाऊं तुमको।

पतझड़ के वीरानेपन में, मैं
गुलशन बन जाऊं तुमको।

भूल गया सब अपनेपन में,
अंतर मन की बात सुनो तुम,
सारा प्यार लुटाकर तुमपर,
मैं साजन बन जाऊं तुमको।

अमर कहानी लैला मंजनू,
इतना तुमको प्यार करूं मैं।

तुम राधा बन जाओ मेरी,
मैं कान्हा बन जाऊं तुमको।
प्रेम तरंगें उठें अधरों से,
अंग-अंग सब महक उठे।

तुम खिलकर बन जाओ चंपा,
मैं गहना बन जाऊं तुमको।
पार उतरना इस जीवन के,
प्रेम सत्य से सजा हुआ है।

तुम मेरा हृदय मन जाओ,मैं
धड़कन बन जाऊं तुमको।

मेनका रंभा उर्वशी अप्सरा,
यह सब स्वर्ग कहानी है।
तुम मेरी सांसें बन जाओ,
मैं जीवन बन जाऊं तुमको।।

  • डॉ. रजनीश गंगवार

यह भी पढ़े-

सूरदास की सुध लेने गोवर्धन आए मुंबई से शेखर सेन…

संबंधित समाचार