बाक़र गंज के सैयद…
उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले के बाक़र गंज के निवासी ख़ुद को ईरान से आए सैयद इकरामुद्दीन अहमद का वंशज मानते हैं। जानेमाने क़िस्सागो असग़र वजाहत वहां के निवासियों के इस दावे की सच्चाई पता लगाने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के साथ निकल पड़ते हैं एक रोमांचक यात्रा पर। इस यात्रा के दौरान वे पाठकों …
उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले के बाक़र गंज के निवासी ख़ुद को ईरान से आए सैयद इकरामुद्दीन अहमद का वंशज मानते हैं। जानेमाने क़िस्सागो असग़र वजाहत वहां के निवासियों के इस दावे की सच्चाई पता लगाने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के साथ निकल पड़ते हैं एक रोमांचक यात्रा पर।
इस यात्रा के दौरान वे पाठकों को अपने साथ-साथ हुमायूं काल से लेकर अवध के नवाबों के उत्थान-पतन और हिंदुस्तान में पसर रही फ़िरंगी हुकूमत के अंदरख़ाने तक भी ले चलते हैं।
कई छोटी-छोटी ऐतिहासिक कहानियों को बुनकर लिखी यह किताब भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान को भी बयां करती है और बताती है किस तरह विदेशों से आए लोग भारत की मिट्टी के ही होकर रह गए। सोलहवीं शताब्दी से शुरू हुआ यह आख्यान आज़ाद भारत में अपने आख़िरी पड़ाव पर पहुंचता है।
उस काल के विभिन्न साम्राज्यों के ऐतिहासिक वैभव, सत्ता हथियाने के लिए होनेवाले षड्यंत्र, दांवपेच इन कहानियों में सजीव हो उठते हैं। अवध के भूले-बिसरे गांवों, क़स्बों की ऐतिहासिकता से रूबरू कराती है यह किताब।
बाक़र गंज के सैयद के पन्नों से गुज़रते हुए लेखक का गहरा और व्यापक अध्ययन झलकता है। यह किताब उन लोगों के लिए है, जो इतिहास को रोचक शैली में पढ़ना पसंद करते हैं। पुस्तक की भाषा में उर्दू और फ़ारसी शब्दों का इस्तेमाल है, पर इनसे किसी भी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं होती।
ज़रूरत है तो बस इसे इत्मीनान से पढ़ने की। यदि आप फ़ास्ट रीडिंग पसंद करनेवालों में से हैं तो हो सकता है कि अचानक बदलनेवाली कहानियां आपको जोड़कर न रख सकें। लेकिन कुल मिलाकर यह अपने तरह की एक बेतरीन किताब है, जो ऐतिहासिक रिपोर्टिंग के रास्ते खोल रही है।
