रिश्ते खत्म! कांग्रेस से ‘आजाद’ हुए कई और नेता, गुलाम नबी बनाएंगे नई पार्टी
श्रीनगर। गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस से रिश्ते खत्म हो गए हैं। उन्होंने सोनिया गांधी को लिखे 5 पन्नों के लंबे पत्र में कांग्रेस के सभी पदों को छोड़ने और प्राथमिक सदस्यता तक से इस्तीफा दे दिया। उनके इस फैसले का असर जम्मू-कश्मीर कांग्रेस में भी दिखा है। उनके समर्थन में जम्मू कश्मीर के 5 …
श्रीनगर। गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस से रिश्ते खत्म हो गए हैं। उन्होंने सोनिया गांधी को लिखे 5 पन्नों के लंबे पत्र में कांग्रेस के सभी पदों को छोड़ने और प्राथमिक सदस्यता तक से इस्तीफा दे दिया। उनके इस फैसले का असर जम्मू-कश्मीर कांग्रेस में भी दिखा है। उनके समर्थन में जम्मू कश्मीर के 5 पूर्व विधायकों जी. एम. सरूरी, हाजी अब्दुल राशिद, मोहम्मद अमीन भट, गुलजार अहमद वानी और चौधरी मोहम्मद अकरम ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
जम्मू-कश्मीर के PCC अध्यक्ष जी. एम. सरूरी ने कहा कि गुलाम नबी आजाद साहब ने जो फैसला लिया है और उनके समर्थन में हम 5 विधायकों ने इस्तीफा दिया है।
आरएस छिब ने कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद कहा कि गुलाम नबी आजाद से हमारी बात दो महीने से चल रही थी। उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि वह जल्दी ही इस्तीफा देने वाले हैं।
उन्होंने कहा कि गुलाम नबी आजाद को अपनी इच्छा के विपरीत पर काम करना पड़ रहा था। उनके पास पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं बचा था। इस बीच कुछ महीने पहले ही कांग्रेस छोड़ने वाले सीनियर नेता सुनील जाखड़ का भी रिएक्शन आया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से कांग्रेस चल रही है, उस हालात में अस्तित्व बचना भी मुश्किल है।
गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि कांग्रेस आज मुसीबत में है, सबको भाजपा और RSS के खिलाफ लड़ना है। लड़ाई के समय युद्ध से भागना पार्टी के साथ धोखा है। पार्टी ने उन्हें सब कुछ दिया है। ऐसे समय में आपका फर्ज़ है उस कर्ज़ को चुकाना।
बता दें कि गुलाम नबी आजाद ने कांग्रेस छोड़ने के बाद नई पार्टी बनाने का ऐलान भी किया है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में मेरे बहुत से सारे मित्र हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के तीन साल पूरे हो चुके हैं। हालांकि आजाद की जन्मस्थली जम्मू डिवीजन का डोडा इलाका है। इसके बावजूद उनकी पहचान कश्मीर घाटी के नेता के रूप में रही है। ऐसे में अगर गुलाम नबी आजाद नई पार्टी बनाने के बाद बीजेपी के साथ किसी गठबंधन का फैसला करते हैं तो उन्हें बड़ा लाभ मिलता नहीं दिख रहा। वहीं अगर नई पार्टी के साथ अकेले दम पर चुनाव लड़ते हैं तो अपना अस्तित्व बचाए रखने में कामयाब हो सकते हैं। इसकी वजह भी है।
दरअसल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद गुपकार अलायंस बना। नैशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के श्रीनगर स्थित आवास 1, गुपकार रोड पर 4 अगस्त 2019 को कश्मीर के आठ दलों ने बैठक की। इसके बाद ही जम्मू-कश्मीर के आठ दलों ने केंद्र सरकार के खिलाफ नया गठबंधन गुपकार अलायंस बनाने का ऐलान किया। 22 अगस्त 2020 को सात सियासी दलों ने एक बार फिर मीटिंग की। लेकिन हाल ही में फारूक अब्दुल्ला ने ऐलान किया कि राज्य में भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर उनकी पार्टी अकेले ही लड़ेगी। ऐसे में गुपकार अलायंस का अस्तित्व खत्म हो चुका है।
दरअसल गुलाम नबी आजाद भले ही लंबे समय तक कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में रहे हैं, लेकिन वह जम्मू-कश्मीर में भी अच्छी पकड़ रखते हैं। वह उन नेताओं में से एक हैं, जिनकी पकड़ घाटी के साथ ही जम्मू तक में है। यही वजह है कि उनके इस्तीफे का असर दिख रहा है और कई नेताओं ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान कर दिया है।
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