भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट 'विक्रम-1' लॉन्च, श्रीहरिकोटा से भरी उड़ान... अंतरिक्ष में रचा गया नया इतिहास
डिजिटल डेस्कः भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए 18 जुलाई यानी की आज का दिन बेहद ही खास है। हैदराबाद की स्पेस स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पहले ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) से लॉन्च कर दिया है। इस मिशन का नाम 'आगमन' रखा गया है। अगर यह लॉन्च सफल रहता है तो पहली बार किसी भारतीय निजी कंपनी का विकसित रॉकेट सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा (Orbit) में स्थापित किया गया। यह लॉन्च भारत के निजी अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
यह सफलता केवल स्काईरूट एयरोस्पेस के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के तेजी से उभरते प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए भी बड़ी उपलब्धि है। वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र में किए गए सुधारों के बाद निजी कंपनियों को रॉकेट, उपग्रह और लॉन्च सेवाओं के क्षेत्र में काम करने की अनुमति मिली थी, जिसके सकारात्मक परिणाम अब सामने आने लगे हैं।
इससे पहले स्काईरूट एयरोस्पेस ने 2022 में विक्रम-S नामक सब-ऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था। हालांकि उस मिशन में उपग्रह को कक्षा में स्थापित नहीं किया गया था। विक्रम-1 मिशन का उद्देश्य कई ग्राहकों के छोटे उपग्रहों को पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर ऊंचाई वाली लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित करना है।
यह मिशन विक्रम-1 के तीन विकासात्मक (डेवलपमेंट) अभियानों में पहला है। इन परीक्षणों की सफलता के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस इस रॉकेट को नियमित व्यावसायिक (कमर्शियल) लॉन्च सेवाओं के लिए तैयार करेगी।
2022 के बाद अब पहला ऑर्बिटल मिशन
स्काईरूट एयरोस्पेस ने वर्ष 2022 में विक्रम-एस नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। हालांकि वह मिशन केवल परीक्षण उड़ान थी। इस बार विक्रम-1 का लक्ष्य कई ग्राहकों के छोटे सैटेलाइट को पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित करना है। यह कंपनी के तीन विकासात्मक ऑर्बिटल मिशनों में पहला मिशन होगा।
कार्बन कंपोजिट तकनीक से बना है विक्रम-1
विक्रम-1 की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता इसका पूरी तरह कार्बन-कंपोजिट संरचना से निर्मित है। स्काईरूट के सीईओ पवन कुमार चंदाना के अनुसार, यह दुनिया का पहला ऐसा ऑर्बिटल रॉकेट है जो पूरी तरह कार्बन कंपोजिट से तैयार किया गया है। यह सामग्री स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्की होती है, जिससे रॉकेट का वजन कम और प्रदर्शन बेहतर होता है।
रॉकेट में तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है। इसकी क्षमता 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर ऊंची कक्षा में पहुंचाने की है।
सिर्फ सैटेलाइट नहीं, भारत के तीन महान वैज्ञानिकों को भी देगा श्रद्धांजलि
विक्रम-1 मिशन को खास बनाने वाली एक अनोखी पहल भी है। इस रॉकेट के साथ भारत के तीन महान वैज्ञानिकों की माइक्रो मूर्तियां भी अंतरिक्ष भेजी गई।
इनमें शामिल हैं—
-
डॉ. सी.वी. रमन – भारत के पहले विज्ञान नोबेल पुरस्कार विजेता।
-
डॉ. विक्रम साराभाई – भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक।
-
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम – भारत के मिसाइल मैन और पूर्व राष्ट्रपति।
इन मूर्तियों का आकार मात्र 800 माइक्रोन (0.8 मिलीमीटर) है, यानी ये चावल के एक दाने से भी छोटी हैं और इन्हें सामान्य आंखों से देख पाना संभव नहीं है।
तेलंगाना के माइक्रो आर्टिस्ट ने बनाया अनोखा संग्रह
इन सूक्ष्म मूर्तियों को तेलंगाना के वारंगल निवासी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के माइक्रो आर्टिस्ट अजय कुमार मत्तेवाड़ा ने तैयार किया है। उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर 2023 में काम शुरू हुआ और तीनों मूर्तियों को तैयार करने में 140 घंटे से अधिक समय लगा।
इनके निर्माण में स्टेनलेस स्टील, शुद्ध चांदी, 24 कैरेट सोना, सिरेमिक पाउडर और कार्बन फाइबर का उपयोग किया गया। बाद में इन्हें 18 कैरेट सोने से बने एक छोटे रॉकेट मॉडल के भीतर स्थापित किया गया।
अजय ने इसे अपने 40 वर्षों के कला जीवन का सबसे बड़ा सम्मान बताते हुए कहा कि उनकी बनाई कलाकृति अब अंतरिक्ष के इतिहास का हिस्सा बनने जा रही है।
चार चरणों वाला आधुनिक लॉन्च व्हीकल
विक्रम-1 एक चार-स्टेज लॉन्च व्हीकल है। इसके पहले तीन चरणों में ठोस ईंधन (Solid Fuel) का उपयोग किया गया है, जबकि चौथे चरण में पुनः चालू किए जा सकने वाला लिक्विड इंजन लगाया गया है। यह तकनीक सैटेलाइट को उसकी निर्धारित कक्षा में अधिक सटीकता से स्थापित करने में मदद करती है।
कैसे हुई स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत?
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने की थी। वर्ष 2020 में निजी स्पेस सेक्टर को अनुमति मिलने के बाद कंपनी ने ऑर्बिटल रॉकेट विकसित करने की दिशा में तेजी से काम किया और अब विक्रम-1 उसी प्रयास का सबसे बड़ा परिणाम है।
