सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो…एक पथ, बलि के लिए तैयार हो।

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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह की आज 114वीं जयंती है। वे एक भारतीय हिंदी और मैथिली भाषा के कवि, निबंधकार, स्वतंत्रता सेनानी, देशभक्त और अकादमिक थे। उनके जन्मदिन के अवसर पर देश में कई जगहों पर कई तरह के प्रोग्राम चल रहे हैं। उनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर में हुआ था। दिनकर के …

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह की आज 114वीं जयंती है। वे एक भारतीय हिंदी और मैथिली भाषा के कवि, निबंधकार, स्वतंत्रता सेनानी, देशभक्त और अकादमिक थे। उनके जन्मदिन के अवसर पर देश में कई जगहों पर कई तरह के प्रोग्राम चल रहे हैं। उनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर में हुआ था। दिनकर के पिता रवि सिंह साधारण किसान थे। उन्होंने कई प्रमुख कविताएं लिखीं जो पूरी भारत में व्याख्यात है। उन कविताओ‍ं में से एक ये कविता है जिसे हम आपसे रूवरू करा रहे हैं।

रामधारी सिंह दिनकर की प्रिय कविता-

सत्य का जिसके हृदय में प्यार हो,
एक पथ, बलि के लिए तैयार हो ।

फूँक दे सोचे बिना संसार को,
तोड़ दे मंझधार जा पतवार को ।

कुछ नई पैदा रगों में जाँ करे,
कुछ अजब पैदा नया तूफां करे।

हां, नई दुनिया गढ़े अपने लिए,
रैन-दिन जागे मधुर सपने लिए ।
बे-सरो-सामां रहे, कुछ गम नहीं,
कुछ नहीं जिसको, उसे कुछ कम नहीं ।

प्रेम का सौदा बड़ा अनमोल रे !
निःस्व हो, यह मोह-बन्धन खोल रे !

मिल गया तो प्राण में रस घोल रे !
पी चुका तो मूक हो, मत बोल रे !

प्रेम का भी क्या मनोरम देश है !
जी उठा, जिसकी जलन निःशेष है ।
जल गए जो-जो लिपट अंगार से,
चाँद बन वे ही उगे फिर क्षार से ।

प्रेम की दुनिया बड़ी ऊंची बसी,
चढ़ सका आकाश पर विरला यशी।

हाँ, शिरिष के तन्तु का सोपान है,
भार का पन्थी ! तुम्हें कुछ ज्ञान है ?

है तुम्हें पाथेय का कुछ ध्यान भी ?
साथ जलने का लिया सामान भी ?
बिन मिटे, जल-जल बिना हलका बने,
एक पद रखना कठिन है सामने ।

प्रेम का उन्माद जिन-जिन को चढ़ा,
मिट गए उतना, नशा जितना बढ़ा ।

मर-मिटो, यह प्रेम का शृंगार है।
बेखुदी इस देश में त्योहार है ।

खोजते -ही-खोजते जो खो गया,
चाह थी जिसकी, वही खुद हो गया।
जानती अन्तर्जलन क्या कर नहीं ?
दाह से आराध्य भी सुन्दर नहीं ।

‘प्रेम की जय’ बोल पग-पग पर मिटो,
भय नहीं, आराध्य के मग पर मिटो ।

हाँ, मजा तब है कि हिम रह-रह गले,
वेदना हर गांठ पर धीरे जले।

एक दिन धधको नहीं, तिल-तिल जलो,
नित्य कुछ मिटते हुए बढ़ते चलो ।
पूर्णता पर आ चुका जब नाश हो,
जान लो, आराध्य के तुम पास हो।

आग से मालिन्य जब धुल जायगा,
एक दिन परदा स्वयं खुल जायगा।

आह ! अब भी तो न जग को ज्ञान है,
प्रेम को समझे हुए आसान है ।

फूल जो खिलता प्रल्य की गोद में,
ढूंढ़ते फिरते उसे हम मोद में ।
बिन बिंधे कलियां हुई हिय-हार क्या?
कर सका कोई सुखी हो प्यार क्या?

प्रेम-रस पीकर जिया जाता नहीं ।
प्यार भी जीकर किया जाता कहीं?

मिल सके निज को मिटा जो राख में,
वीर ऐसा एक कोई लाख में।

भेंट में जीवन नहीं तो क्या दिया ?
प्यार दिल से ही किया तो क्या किया ?

चाहिए उर-साथ जीवन-दान भी,
प्रेम की टीका सरल बलिदान ही।

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