प्रयागराज : आपराधिक अदालतों को फैसला सुनाने के बाद मामले पर पुनर्विचार की शक्ति नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार, प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक अदालतें किसी मामले में फैसला सुना चुकी हैं तो उन्हें दोबारा उसी मामले में पुनर्विचार की शक्ति नहीं है। वह केवल लिपिकीय या अंकगणीतीय त्रुटि को ही ठीक कर सकती हैं। इसके अलावा उसमें बदलाव या समीक्षा नहीं कर सकती हैं। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने मेरठ के याची गोविंद उर्फ अरविंद व तीन अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

कोर्ट ने कहा कि एक बार फैसला सुनाने के बाद उसी मामले को फिर से गुणदोष के आधार पर विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ऐसा करती है तो यह पहले के आदेश में बदलाव या समीक्षा होगी, जो सीआरपीसी की धारा 362 द्वारा पूरी तरह प्रतिबंधित है। हाईकोर्ट ने मोतीलाल बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने लिपिकीय या अंकगणितीय त्रुटि को ठीक करने के अलावा उस पर नए सिरे से विचार करने से मना कर दिया था।

मामले में मेरठ सत्र न्यायालय ने याची के खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत नए सिरे से विचार करने के लिए सम्मन किया  था, जिसे याची ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी। उसका तर्क था कि मेरठ सत्र न्यायालय इस मामले में एक बार फैसला सुना चुकी है। इसके बाद दोबारा इस मामले को गुणदोष के आधार सुनवाई कर फैसला सुनाने के लिए उसे सम्मन किया है।

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