मुरादाबाद : वकीलों की हड़ताल से फंसी 400 से अधिक बंदियों की जमानत

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हड़ताल का प्रभाव : जेल की 23 बैरकों में समय काट रहे बंदी, कई बीमार भी, 137 महिला बंदियों के साथ रह रहे आठ बच्चे

निर्मल पांडेय, अमृत विचार। हापुड़ की घटना के बाद अधिवक्ताओं (वकील) की कलमबंद हड़ताल के बुधवार को 15 दिन बीत गए, लेकिन वकील झुकने को तैयार नहीं हैं। वह भी बिना मांग पूरी किए हड़ताल वापस लेने के मूड में नहीं हैं। कोर्ट-कचहरी सब बंद है। वकील न्यायिक कार्य से विरत हैं। पुराने मामलों में वादकारी आकर पेशी की अगली तारीख लेकर लौट रहे हैं।

अधिवक्ताओं की हड़ताल से चरमारा रही जिला कारागार की व्यवस्थाएं

  • 3500 बंदी जिला कारागार में हैं निरुद्ध
  • 717 बंदियों की क्षमता है कारागार की
  • 300 से अधिक बंदी हड़ताल के बीच और बढ़े
  • 153 बंदी औसतन एक-एक बैरक में है

जिला कारागार में निरुद्ध बंदियों को झेलनी पड़ रही है। इन वकीलों के चक्कर में उनकी जमानत नहीं हो पा रही है। जमानत न होने से जिला कारागार की व्यवस्थाएं भी बिगड़ने लगी हैं। क्षमता से कई गुना अधिक बंदी मुरादाबाद जेल में निरुद्ध हैं और लगभग हर रोज नए-नए बंदी जेल में दाखिल हो रहे हैं। कुल मिलाकर बंदियों की जेल से निकासी वकीलों की हड़ताल प्रारंभ होने के दिन 30 अगस्त से बंद है। मुरादाबाद जिला कारागार तीन जिलों के बंदी निरुद्ध हैं। इसमें अमराेहा, संभल और मुरादाबाद जिले के बंदी शामिल हैं। वर्तमान में इस जेल में 3500 से भी अधिक बंदी निरुद्ध हैं, जबकि यह जेल केवल 717 बंदियों की क्षमता वाली है। इसमें 137 महिला बंदी हैं। कहने का मतलब है जेल में क्षमता से साढ़े चार गुना से भी अधिक बंदी निरुद्ध हैं।

 अब ऐसे में सहजता से अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक-एक बैरक में बंदी किस तरह से समय काट रहे होंगे। जेल में कुल 23 बैरक हैं। बैरक की इस संख्या के हिसाब में प्रत्येक बैरक में औसतन 153 बंदी रह रहे हैं। अब कहने को तो जेल में व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं। बंदियों को कोई समस्या नहीं है लेकिन, हकीकत बंदियों की संख्या और जेल में जगह से साफ हो जाती है। पूर्व के दिनों में पेशी पर आए एक बंदी ने न्यायालय परिसर में बताया भी था कि बैरक में लेटने तक को जगह नहीं है। किसी तरह से जिला कारागार में समय बिता रहे हैं। उसने यह भी बताया था कि लेटने-बैठने तक की दिक्कत के कारण भी कई बंदी बीमार हो जाते हैं। कुछ बुजुर्ग बंदी हैं, उन्हें और अधिक तकलीफ हो रही है। बंदियों के पैरोकार बताते हैं कि वकीलों की हड़ताल के कारण न्यायालय में वकालतनामा दाखिल नहीं हो पा रहा है। इस कारण कोर्ट में भी कार्रवाई पूरी नहीं हो पा रही है। इसी कारण बंदियों की जमानत फंसी हुई है।


हड़ताल से अधिवक्ता संग वादकारी-बंदी भी प्रभावित
दि बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी के संयुक्त सचिव खलील अहमद का कहना है कि हड़ताल से वादकारियों एवं बंदियों पर ही नहीं प्रभाव पड़ रहा है बल्कि अधिवक्ता भी प्रभावित हो रहे हैं। उन्हाेंने बताया कि वादकारी न्यायालय में आ रहे हैं और पेशी की तारीख लेकर लौट रहे हैं। कोई बेल नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि मुरादाबाद में करीब 5000 अधिवक्ता हैं। इनमें अधिकांश के पास कई-कई ऐसे बंदियों के मुकदमे हैं, जिनमें उनकी हड़ताल के दिनों में जमानत हो सकती थी। संयुक्त सचिव ने बताया कि उनके पास खुद 8-10 मुकदमे हैं जिनमें बीते 13-14 दिनों में संबंधित बंदियों की जमानत हो सकती थी। लेकिन, समस्या ये है कि हापुड़ में जिस तरह से पुलिस ने अधिवक्ताओं पर लाठियां भांजी हैं वह भी उचित नहीं है। अधिवक्ताओं का सम्मान बना रहे, इसके लिए ही पूरे प्रदेश के के अधिवक्ता एकजुट होकर उप्र बार काउंसिल के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन, सरकार उनकी मांगों पर विचार ही नहीं कर ही है। उन्होंने बताया कि अब गुरुवार को वह सभी लोग वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन करेंगे और प्रदेश सरकार का पुतला भी फूंकेंगे।

अधिवक्ताओं की हड़ताल से न्यायिक कार्य लगभग ठप हैं। बंदियों की जमानत नहीं हो पा रही है। हड़ताल के दिनों में एक भी बंदी की जमानत नहीं हो पाई है। वैसे यदि हड़ताल न चल रही होती तो कम से कम 400 बंदी जमानत पाकर अपने घर पहुंच गए होते। हां, इस बीच 300 से अधिक नए बंदी और जेल में आ गए हैं। जेल में जगह का अभाव है लेकिन, क्या किया जा सकता है। कोशिश रहती है कि जेल में कोई अव्यवस्था न फैलने पाए। - पवन प्रताप सिंह, वरिष्ठ जेल अधीक्षक

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