मोहन राकेश की अद्भुत कलात्मक क्षमता
सुभाष बाशी अपनी प्रेमिका मिन्नी से मिलकर ऑटो रिक्शा से वापस आता है। रास्ते में एक बर्फ की दुकान खुली नहीं थी सो वह लौट आया, लेकिन तब तक देखा एक सरदार जी उस रिक्शे में बैठ गए। उसके मना करने पर लहीम-शहीम सरदार जी ने पहले उसे धमकाया, फिर चाकू निकालकर गाली बकते हुए उसे दौड़ा लिया और वह यानी बाशी भागता हुआ किसी गली में घुस गया। उसके बाद जिस महेंद्र नामक व्यक्ति के यहां वह रहता है, उसके बहुत अधिक दबाव डालने पर पुलिस में रिपोर्ट नहीं करना चाहा, लेकिन एक परिचित रिपोर्टर ने यह खबर छाप दी और फिर उस सरदार जी यानी नत्था सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद इस नत्था सिंह की शिनाख्त करने का खतरनाक कार्य करने पर बाशी को मजबूर किया जाने लगा। देखने में साधारण सी घटना लग सकती है, पर कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे ही इस कथ्य का साधारण रूप असाधारण बनने लगता है।-श्याम सुंदर चौधरी, कानपुर
यदि शुरुआत से देखें तो पहली पंक्ति ही कितनी मारक है, ‘अजीब बात थी, खुद कमरे में होते हुए भी बाशी को कमरा खाली लग रहा था’ बाशी के साथ जो कुछ हुआ उसने उसके अंदर यह एहसास भर दिया कि उसका वजूद बिल्कुल शून्य है। उसका जिंदा होना या न होना इस समाज, देश के लिए कोई महत्व नहीं रखता है। एक आम आदमी का जीवन जीना किस कदर यंत्रणादायक हो जाता है। यह बाशी अच्छी तरह समझ चुका था तभी उसे लग रहा था कि वह जहां है, वहां नहीं है। उससे तो अधिक महत्वपूर्ण थीं, उस कमरे की दीवारें, मेज और कुर्सियां। व्यक्ति का किसी जगह पर होना तभी सार्थक होता है जब वह अपनी उपस्थिति को महसूस करे। जैसे बाशी कमरे में है, किंतु अपनी उपस्थिति को अनुभव नहीं कर पाता इसलिए उसे वह कमरा खाली लगता है। अपने इसी खालीपन के कारण उसे समय का भी सही अंदाजा नहीं हो पा रहा था। उसे कभी लगता जैसे समय बहुत जल्दी बीत रहा है और कभी लगता बहुत धीरे-धीरे। उसके भीतर का डर वास्तव में चाहता है कि समय वहीं थम जाए, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो एक समय ऐसा आएगा जब वह खतरा उसके सामने आकर खड़ा हो जाएगा। जब उसके भीतर का आम आदमी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उठकर खड़ा होना चाहता है तब उसे लगता यह सब नाटक हो रहा है। यदि व्यवस्था उसके भीतर के आम आदमी के पक्ष में होती तो उस चाकू वाले को उपयुक्त सजा मिल गई होती और उसके भीतर किसी भी प्रकार का डर जगह न बनाता। ऐसे में उसे समय बहुत देर से गुजरता हुआ लगा। वह यदि कोई बड़ा मंत्री होता या कोई शक्ति संपन्न व्यक्ति तो क्या इस तरह डरता हुआ इस कमरे में बैठा रहता?
‘हथेली पर बने शब्द इतने अधिक हो गए कि सब मिलकर आढ़ी-तिरछी लकीरों का एक गुंजल्क बन गए, जो पूरी तरह मिट नहीं सके” ठीक उसी तरह समाज, व्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून, सुरक्षा, आदि शब्दों के बीच एक साधारण सा जीवन जीने वाला आम आदमी छटपटा रहा है। कई बार उसे लगता है कि यह देश उसके लिए नहीं है। इस समाज में यहां की सड़कों, दुकानों और बाजारों पर बार-बार अपमानित होना ही उसके जीवन का एक बहुत बड़ा सत्य है और इस भयानक सत्य से आम आदमी को निजात दिलाने के लिए जो भी संस्थाएं बनी हैं, वो शक्ति संपन्न लोगों के लिए हैं, उसके जैसों
के लिए नहीं।
पुलिस वाले भी उसे कभी डराते हैं, तो कभी हतोत्साहित करते हैं। थानेदार ने कहा, ‘हां, हां, रिपोर्ट आपको जरूर लिखवानी चाहिए। इन गुंडों से मत्था लेने में यूं थोड़ा-बहुत खतरा तो रहता ही है और कुछ न करे आप पर एसिड ही डाल दें। ऐसा उन्होंने दो-एक बार किया भी है।’ दूसरी ओर डीएसपी का संवाद भी हिम्मत तोड़ने वाला है, ‘वह तो बेचारा सिर्फ दलाली करता है’ डीएसपी ने जरूरी फाइलों पर दस्तखत करते हुए कहा, ‘कत्ल-वत्ल करने का उसका हौसला नहीं पड़ सकता’ हम उसके खिलाफ कार्यवाही नहीं करेंगे, आपको डरना बिलकुल नहीं चाहिए।’
यहां तक कि चीफ क्राइम रिपोर्टर भी इस मामले में अपनी भूमिका किस तरह निभाता है, जरा देखिए, ‘आप पहला काम यह कीजिए कि जाकर अपनी रिपोर्ट वापस ले लीजिए। थानेदार मेरा वाकिफ है, आप चाहें तो उससे मेरा नाम ले सकते हैं कि पंडित माधोप्रसाद ने यह राय दी है। वह अकेला नहीं है। एक बहुत बड़ा गिरोह उसके साथ है। हम लोग उनसे उलझ लेते हैं, क्योंकि एक तो हम इन सबको पहचानते हैं और दूसरे हिफाजत के लिए रिवाल्वर-वाल्वर अपने साथ रखते हैं। ये भी जानते हैं कि जितने बड़े गुंडे ये दूसरों के लिए हैं उतने ही बड़े गुंडे हम इनके लिए हैं। इसीलिए हमसे डरते भी हैं, पर आप जैसे आदमी को तो ये एक दिन में साफ कर देंगे- आपको इनसे बचकर रहना चाहिए।’
इस एक पैरा के संवाद में ही उस क्राइम रिपोर्टर का पूरा चरित्र बेनकाब हो जाता है। एक तरफ वह कहता है कि नत्था सिंह जैसे लोग उससे डरते हैं, क्योंकि ऐसे लोग जानते हैं कि क्राइम रिपोर्टर उन लोगों से भी बड़ा गुंडा है, तो फिर क्यों वह बाशी से रिपोर्ट वापस लेने को कहता है? वह रिपोर्टर खुद ही अगर एक बार नत्था को धमका दे तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि बाशी को हाथ भी लगा सके, लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ है नहीं। वास्तव में रिपोर्टर की नत्था सिंह से दोस्ती है।
मोहन राकेश जिस तरह के वाक्यों का सृजन करते हैं उसमें एक अद्भुत सा रोमान्टिज्म दिखाई देता है। किसी भी बात को वाक्यों में इस तरह पिरोते थे मानो फुटपाथ पर कोई खूबसूरत नायिका एक सिंथेटिक साड़ी में लिपटी पैदल चली जा रही है और उसके कमर पर पड़ता बल पीछे से देखने वाले की धड़कन बंद कर दे, सम्मोहित कर दे। बाशी के मनोभावों को राकेश ने बहुत खूबसूरती से चित्रित किया है। उसके भीतर का डर, उसके नर्वस ब्रेक डाउन को भी उतने ही प्रभावशाली ढंग से राकेश ने उभारा है, ‘कोई चीज हलक में चुभ रही थी-एक नोक की तरह। बार-बार थूक निगलकर उस चुभन को मिटा लेना चाहता।
कभी उसे लगता कि किसी हाथ ने उसका गला दबोच रखा है और यह चुभन गले पर कसते हुए नाखूनों की है। तब वह जैसे अपने को उन हाथों से छुड़ाने के लिए छटपटाने लगता।’ राकेश की भाषा में सरलता के साथ-साथ जो व्यंजना का मिश्रण रहता है वह उनके समय के किसी और रचनाकार में शायद ही दिखाई पड़ता हो। यह व्यंजना की प्रधानता उनकी भाषा में कहीं भी न तो बनावटी लगती है और न ही ठुंसी हुई, बल्कि प्रेम से पाठक की उंगली थामे वह खूबसूरत भाषा उनकी कहानी के पथ पर सफर करा जाती है।
