संपादकीय: एक ऐतिहासिक प्रक्षेपण
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक स्पेस इकोनॉमी का भरोसेमंद स्तंभ बनता जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड की वाणिज्यिक डील के तहत श्रीहरिकोटा से अपने सबसे ताकतवर रॉकेट एलवीएम-3 के जरिये अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेस मोबाइल के 6100 किलोग्राम वजनी ‘ब्लू बर्ड ब्लॉक-2’ सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करना ऐतिहासिक इसलिए है, क्योंकि यह भारत का अब तक का सबसे भारी और तकनीकी रूप से जटिल कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च है, जिसे महज 52 दिन की तैयारी में और बिना किसी बाहरी सहयोग के, मात्र डेढ़ किलोमीटर के अंतर से कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचाया गया।
इससे पहले 4,000 किलो से ज्यादा के सेटेलाइट के लिए अमेरिका या फ्रांस से मदद लेनी होती थी। साथ ही इसरो ने एस 200 बूस्टर को नियंत्रित करने वाले नए कंट्रोल सिस्टम का परीक्षण भी कर लिया, जिसे गगनयान में इस्तेमाल होना है। इससे भारत ‘सिर्फ वैज्ञानिक मिशन’ करने वाले देश से आगे बढ़कर वैश्विक स्पेस सर्विस प्रोवाइडर की भूमिका में मजबूती से खड़ा होता दिख रहा है।
‘ब्लू बर्ड ब्लॉक-2’ का उद्देश्य स्पेस से सीधे धरती पर मौजूद सामान्य स्मार्टफोन्स तक बिना किसी डिश, टॉवर या अतिरिक्त एंटीना के 4जी या 5जी कनेक्टिविटी पहुंचाना है। दरअसल यह एक उड़ता हुआ मोबाइल टॉवर है। इसकी सिग्नल पकड़ने की क्षमता इतनी अधिक है कि पहाड़ों, रेगिस्तानों और समुद्र के बीच भी नेटवर्क की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है। पुरानी पीढ़ी की तुलना में यह प्रणाली लगभग दस गुना अधिक शक्तिशाली है, जो दूरस्थ इलाकों के लिए क्रांतिकारी साबित होगी।
स्वाभाविक सवाल है कि क्या इसका लाभ भारतीय मोबाइल उपभोक्ताओं को मिलेगा? तकनीकी रूप से हां, क्योंकि यह नेटवर्क वैश्विक कवरेज के लिए डिजाइन किया गया है। हालांकि, शुरुआती चरण में इसकी सेवाएं महंगी हो सकती हैं, क्योंकि स्पेस-टू-फोन तकनीक अभी नई है, लेकिन जैसे-जैसे सेटेलाइट कॉन्स्टेलेशन बढ़ेगा और प्रतिस्पर्धा आएगी, कीमतों में गिरावट तय मानी जा सकती है। दीर्घकाल में यह आपदा प्रबंधन, सीमावर्ती क्षेत्रों, समुद्री संचार और डिजिटल समावेशन के लिए गेम-चेंजर होगा।
प्रक्षेपण के बाज़ार में इसरो का मुकाबला अब स्पेसएक्स जैसी कंपनी से है, जिसका रॉकेट फाल्कन-9 लो अर्थ ऑर्बिट तक 22,800 किलोग्राम ले जाने और रीयूजेबल होने के चलते आक्रामक प्रतिस्पर्धा देता है, लेकिन इसरो की ताकत विश्वसनीयता और सटीकता है, जिसे कंपनियां ज्यादा महत्व देती हैं। इसरो आज भी छोटे रॉकेट्स और पीएसएलवी के क्षेत्र में सबसे किफायती विकल्पों में गिना जाता है। अगला कदम रीयूजेबल लॉन्च व्हिकल का है। ‘सूर्य’ कोडनेम वाले भारतीय रीयूजेबल रॉकेट पर काम चल रहा है, इस दशक के अंत तक प्रारंभिक परीक्षण की उम्मीद है। तब लागत और प्रतिस्पर्धा दोनों मोर्चों पर हम मजबूत होंगे। एलवीएम-3 को ही गगनयान मिशन के लिए चुना गया है। हालिया सफलता ने गगनयान के रास्ते को और स्पष्ट कर दिया है।
