माघ मेला 2026: साधना का ‘मिनी कुंभ’
हिंदू धर्म के अनुसार माघ माह में संगम नगरी में स्नान करने से मन और कर्म की शुद्धता हो जाती है। इसे देखते हुए संगम में माघ स्नान की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। संत, महात्माओं के टेंट लग गए हैं। आम आदमी जिन्हें कल्पवास करना है वे भी तैयारियों में जुटे हैं। श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं (मकर संक्रांति) तब सभी देवता, दान, तीर्थ और मनुष्य तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम में स्नान करते हैं। मत्स्य पुराण में उल्लेख है कि माघ मास में संगम स्नान से दस हजार तीर्थों की यात्रा के बराबर पुण्य मिलता है।
श्रीहरि विष्णु को समर्पित महीना
पद्म पुराण में उल्लेख है कि माघ में पवित्र नदियों में स्नान करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और पापों से मुक्ति मिलती है। इस माह में सूर्य उपासना का विशेष महत्व है, क्योंकि सूर्य मकर राशि में जब प्रवेश करते हैं, तो उस दिन मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। माघ मास का सबसे बड़ा महत्व प्रयागराज के संगम में स्नान से जुड़ा है। क्योंकि यहीं गंगा, यमुना और अदृश्य हो चुकी सरस्वती नदी का संगम होता है। मान्यता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने यहां प्रथम यज्ञ किया था।
सहस्र वर्षों की तपस्या का फल
माघ मास में संगम स्थान से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। संगम में प्रत्येक माघ मास में मेला लगता है। इस दौरान पौष मास की पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक लाखों श्रद्धालु संगम तट पर कल्पवास करते हैं। कल्पवासियों के लिए सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने का विधान है। इस दौरान श्रद्धालु प्रभु के नाम का जप, हवन आदि करते हैं। मान्यता है कि कल्पवास से सहस्र वर्षों की तपस्या का फल मिलता है। माघ मेले के दौरान पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी, माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के दिन स्नान का विशेष महत्व है। इनमें मौनी अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। माघ पूर्णिमा पर स्नान से अक्षय पुण्य मिलता है और देवता संगम में अवतरित होते हैं। तिल का दान और उपयोग इस मास में विशेष है, क्योंकि तिल गर्म प्रकृति का होता है।
व्यक्तिगत शुद्धि का माध्यम भी
माघ मास और संगम स्नान हमें सादगी, तप और आध्यात्म की याद दिलाता है। यह न केवल व्यक्तिगत शुद्धि का माध्यम है, बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है, जहां सभी वर्ग के लोग एक साथ स्नान करते हैं। यदि संगम नहीं जा सकते हैं, तो गंगा जल घर में लाकर स्नान करना चाहिए। इस मास में हमें जीवन में संयम और भक्ति का संदेश भी मिलता है, जो मोक्ष तक ले जाता है।
कल्पवास 21 नियम संयम पर आधारित
पद्म पुराण में कल्पवास के मुख्य 21 नियम बताए गए हैं, जो कठोर संयम पर आधारित हैं। इनका पालन करने से चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। नियमों में सत्य बोलना, अहिंसा का पालन, इंद्रिय संयम (ब्रह्मचर्य), क्रोध न करना, दूसरों की निंदा न करना, झूठ न बोलना, चोरी व लोभ न करना, मोह का त्याग, गंदगी न करना, भूमि पर शयन, एक समय सात्विक भोजन, मौन व्रत, दान, जप-तप और ध्यान, सूर्य को अर्घ्य, देवपूजन, सत्संग और भजन-कीर्तन, विचारों को रखना, हिंसा रहित जीवन और ब्रह्म मुहूर्त में उठना शामिल है।
कब कौन सा स्नान
साल 2026 में माघ मेले की शुरुआत 3 जनवरी को पौष पूर्णिमा के दिन होकर समापन 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के साथ होगा।
पौष पूर्णिमा स्नान- 3 जनवरी।
मकर संक्रांति स्नान- 14 जनवरी।
मौनी अमावस्या स्नान - 18 जनवरी।
वसंत पंचमी स्नान - 23 जनवरी।
माघी पूर्णिमा स्नान - 1 फरवरी।
महाशिवरात्रि स्नान - 15 फरवरी।
गंगा, यमुना और सरस्वती नदी के पवित्र संगम तट प्रयागराज में माघ मास में स्नान, दान और दर्शन का विशेष महत्व है। इस दौरान यहां आयोजित होने वाला माघ मेला हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और धार्मिक आयोजनों में से एक है। इसे ‘मिनी कुंभ’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि माघ माह में पवित्र संगम में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है और जन्म तथा मृत्यु के बंधन से छुटकारा मिलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि इस मेले में देश ही नहीं विदेशों से भी लोग आकर पुण्य का आशीर्वाद लेते हैं। माघ मेले में कुल छह तिथियां ऐसी होती हैं, जिनमें स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
करौली शंकर महादेव, तृतीय मठाधिपति- मिश्रीमठ, हरिद्वार।
