सौर ऊर्जा से प्रदूषण को काबू करना संभव 

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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सूर्य ऊर्जा का सबसे बड़ा स्त्रोत है और यह ऊर्जा का एक प्राकृतिक स्त्रोत भी है। सच तो यह है कि सौर ऊर्जा (अक्षय ऊर्जा) सूर्य से प्राप्त होने वाली प्राकृतिक तथा जिसका कभी क्षय नहीं होता और असीम ऊर्जा है। यह ऊर्जा न केवल हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के ही अनुकूल है, बल्कि भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने का सबसे विश्वसनीय साधन भी है। अक्षय ऊर्जा (रिनिवेबल एनर्जी) वे ऊर्जा स्रोत हैं, जो हमें प्रकृति से निरंतर रूप से प्राप्त होते हैं और कभी भी समाप्त नहीं होते हैं। 

इन्हें बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से पुनः उत्पन्न हो जाती हैं। भौगोलिक दृष्टि से भारत दक्षिण एशिया या यूं कहें कि भारत मुख्यतः उत्तरी उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) कटिबंधीय क्षेत्र में स्थित है। यही कारण है कि हमारे देश में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार देश में औसतन 300 से अधिक दिन सूर्य की रोशनी रहती है, जिससे बड़े पैमाने पर सौर बिजली उत्पादन संभव है। -सुनील कुमार महला

भारत में सौर ऊर्जा (सोलर एनर्जी) को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कई सौर योजनाएं (सोलर स्कीम्स) चलाई जा रही हैं। इनका उद्देश्य अक्षय ऊर्जा को प्रोत्साहन देना, बिजली की कमी को दूर करना और प्रदूषण कम करना है। पिछले कुछ समय से सरकार ने ‘राष्ट्रीय सौर मिशन’(2010) और ‘कुसुम योजना’(2019), सौर छत योजना (ग्रिड कनेक्टेड रूफटोप सोलर स्कीम), सोलर पार्क योजना, सौर स्ट्रीट लाइट योजना, देशभर में रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन को आसान बनाने के लिए ‘सरल पोर्टल’ जैसी अनेक योजनाओं के माध्यम से किसानों और आम नागरिकों को सौर पैनल लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है। आज सौर ऊर्जा से न केवल घरों और उद्योगों को बिजली मिल रही है, बल्कि गांवों में सिंचाई और रोशनी की व्यवस्था भी हो रही है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग बढ़ाने के लिए भारत की पहल पर 2015 में अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (इंटरनेशनल सोलर एलांयस) यानी कि आईएस का भी गठन किया गया है। भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा उत्पादक देश बन गया है और हमारे देश की यह उपलब्धि भारत की अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती प्रगति का प्रतीक है। 

आंकड़े बताते हैं कि वर्तमान में देश की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगभग 82 गीगावॉट से भी कहीं ज्यादा तक पहुंच चुकी है, जबकि 2014 में यह केवल 2.6 गीगावॉट थी। अन्य आंकड़े भारत की सौर ऊर्जा क्षमता 125 गीगावाट तक बताते हैं। इस तेज वृद्धि के साथ भारत अब चीन और अमेरिका के बाद तीसरे स्थान पर है। दरअसल सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक कुल विद्युत उत्पादन का 50 प्रतिशत हिस्सा अक्षय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त किया जाए। राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य सौर ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी हैं। भारत की यह उपलब्धि न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक प्रतिबद्धता को भी मजबूत बनाती है। यह उपलब्धि ऐसे दौर में हासिल हुई है, जब दुनियाभर में सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे कुल ऊर्जा में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी भी बढ़कर 8.8 फीसदी पहुंच गई है। 

सोलर एनर्जी का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इससे देश को विदेशी ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है और देश आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होता है। इतना ही नहीं, सोलर एनर्जी दूरदराज इलाकों में बिजली पहुंचाने का सस्ता और सरल तरीका है तथा इससे ग्रामीण विकास में मदद मिलती है। सोलर एनर्जी से जहां एक ओर रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, वहीं दूसरी ओर बंजर जमीन पर सोलर प्लांट लगाकर उसे उपयोगी बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं, सोलर एनर्जी में दीर्घकालिक निवेश (लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट) लाभ भी मिलता है। हालांकि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अभी भी हमारे देश को ग्रिड स्थिरता, भंडारण एकीकरण और वित्तीय व्यवहार्यता में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन अच्छी बात यह है कि वर्ष 2018 की सौर ऊर्जा क्षमता 21.6 गीगावाट से बढ़कर जून 2023 तक 70.10 गीगावाट हो गई और भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 280 गीगावाट सौर क्षमता प्राप्त करना है, जो उसके 500 गीगावाट नवीकरणीय लक्ष्य का आधार होगा।
 
आज कार्बन उत्सर्जन एक बहुत बड़ी समस्या बनती चली जा रही है। ऐसे में कार्बन उत्सर्जन के संकट पर काबू पाने के लिए दुनियाभर में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है और इस दिशा में हमारे देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। गौरतलब है कि नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत सदैव नायाब पहलें करता रहा है और केंद्र सरकार की ओर से शुरू किए गए विभिन्न अभियानों ने इन प्रयासों को गति दी है, लेकिन इन तमाम प्रयासों के बावजूद देश की कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता में करीब-करीब आधी क्षमता की कोयला और गैस आधारित विद्युत परियोजनाएं हैं। कोयला और गैस आधारित परियोजनाएं कार्बन उत्सर्जन का मुख्य स्रोत हैं। इनसे भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। वायु प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग में इनका योगदान अत्यधिक होता है। 

वास्तव में, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर भी इनके नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा (सौर ऊर्जा) की ओर संक्रमण इन्हें कम करने का समाधान है। हालांकि, आज भी सौर ऊर्जा क्षेत्र में अनेक चुनौतियां विद्यमान हैं। मसलन, सौर पैनलों की उच्च प्रारंभिक लागत निवेशकों के लिए बाधा बनती है। मौसम और जलवायु पर निर्भरता उत्पादन को अस्थिर बना देती है। पर्याप्त भूमि की कमी, खासकर शहरी क्षेत्रों में, विस्तार में रुकावट डालती है। सौर पैनलों का जीवनकाल और कार्यक्षमता धीरे-धीरे घटती है। ऊर्जा भंडारण (बैटरी) की लागत और क्षमता सीमित है। ग्रिड से कनेक्टिविटी और तकनीकी इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी समस्या पैदा करती है। उत्पादन और अपशिष्ट प्रबंधन में पर्यावरणीय चुनौतियां होती हैं। इतना ही नहीं, नीति और वित्तीय प्रोत्साहनों में असंगति निवेश को प्रभावित करती है। इन सभी के बीच आज जरूरत इस बात की है कि आवासीय प्रयोजन से सौर ऊर्जा के अधिकाधिक इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाए तथा घरों में रूफटॉप सोलर का अपेक्षा के अनुरूप विस्तार पर बल दिया जाए।