स्मॉग के दौर में सांसों की सुरक्षा : आईआईटी कानपुर की स्मार्ट ‘आयरन लंग’
सर्दी के मौसम में दिल्ली समेत उत्तर भारत के अधिकतर शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण से कमजोर होते फेफड़ों को अब घर बैठे आसानी से मजबूत बनाया जा सकेगा। इस काम के लिए आईआईटी कानपुर ने पारंपरिक ‘आयरन लंग’ मशीन के स्थान पर एक आधुनिक ‘आयरन लंग’ डिवाइस विकसित की है। यह डिवाइस फेफड़ों के व्यायाम और स्वास्थ्य की निगरानी के लिए एक स्मार्ट रेस्पिरेटरी कंडीशनिंग सिस्टम जैसी है। इससे चिकित्सा क्षेत्र में खासकर फेफड़े से संबंधित रोगों से पीड़ित लोगों को बड़ी राहत वायु प्रदूषण मिलने की उम्मीद है। खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों को फेफड़े से जुड़ी समस्या का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ता है। ऐसे में आईआईटी कानपुर की सेंसर आधारित डिवाइस से उनके लिए फेफड़ों की मॉनिटरिंग करना बेहद आसान हो जाएगा। यह डिवाइस वायु प्रदूषण या अन्य स्थितियों के कारण कमजोर हुए फेफड़ों को मजबूत करने के लिए व्यायाम करने में मदद करती है। इसे फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। -मनोज त्रिपाठी, कानपुर
जिम और घर दोनों जगह कर सकते हैं इस्तेमाल
‘आयरन लंग’ स्मार्ट वेलनेस डिवाइस को आईआईटी कानपुर के इन्क्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर के स्टार्टअप मेदांत्रिक ने काफी कम लागत विकसित किया है। इसे चलाना काफी आसान है। यह डिवाइस पारंपरिक ‘आयरन लंग’ मशीन, जो कि एक बड़ा बेलनाकार वेंटिलेटर था और जिसे पोलियो महामारी के दौरान बनाया गया था, के विपरीत एक आधुनिक, एआई-पावर्ड श्वसन प्रशिक्षण उपकरण है। यह डिवाइस हर रोज फेफड़े की एक्सरसाइज कराती है और तुरंत यह परिणाम भी बताती है कि आपकी एक्सरसाइज से फेफड़ों को कितना लाभ मिला है। ट्रेडमिल की तरह यह मशीन जिम और घर दोनों जगह इस्तेमाल की जा सकती है। मेद्रांत्रिक के सीईओ प्रियरंजन तिवारी ने बताया कि इस डिवाइस की मदद से फेफड़ों का रोज व्यायाम कराया जा सकता है। इससे फेफड़ों को मजबूती मिलती है। उनके मुताबिक इस डिवाइस को अलग-अलग उम्र और शारीरिक बनावट वाले लोगों के लिए अलग-अलग मोड में काम करने के लिए तैयार किया गया है। इसकी तकनीक को पेटेंट कराया जा चुका है, अब यह प्रोडक्ट के रूप में बाजार में आने के लिए तैयार है।
15 मिनट की एक्सरसाइज से फेफड़े स्वस्थ
इस डिवाइस में एक कुर्सी, मानीटर, श्वसन व्यायाम टूल को आपस में जोड़ा गया है। इस पूरे सेट की कीमत करीब 55 हजार रुपये है। डिवाइस में हर व्यक्ति को अपने लिए अलग स्मार्ट कार्ड लगाना होगा। इस स्मार्ट कार्ड में उपयोगकर्ता की उम्र, वजन, लंबाई और क्षेत्र की जानकारी दर्ज रहेगी। इसी आधार पर फेफड़े की आदर्श स्थिति की एक रिपोर्ट डिवाइस तैयार कर देगी। इसमें लोगों के फेफड़ों की कार्य क्षमता के अनुरूप व्यायाम विशेषज्ञों के सुझाए तरीकों को हिस्सा बनाया गया है। इससे व्यायाम करते समय की जाने वाली गलतियों की जानकारी मिलेगी और सही तरीके से व्यायाम करना सीखा जा सकेगा। इससे श्वसन क्षमता को बढ़ाने में सुविधा मिलेगी। इस डिवाइस के जरिए प्रतिदिन 15 मिनट व्यायाम करने से ही एक हफ्ते में फेफड़ों की स्थिति में सुधार होने लगता है। इस डिवाइस में लगने वाले श्वांस लेने वाले उपकरण की कीमत 100 रुपये रखी गई है, जिसे डिवाइस में आसानी से फिट किया जा सकता है।
पुरानी आयरन लंग मशीन की कहानी
आयरन लंग एक पुरानी, बड़ी धातु की मशीन है, यह उन लोगों को सांस लेने में मदद करती थी, जिनकी श्वसन मांसपेशियां लकवाग्रस्त हो जाती थीं। यह मशीन एक वायुरोधी सिलेंडर होती है, जिसमें मरीज का शरीर अंदर रहता है और सिर बाहर रखकर उसे लिटाया जाता है। इस तरह मशीन अंदर के शरीर में हवा के दबाव को बदलकर फेफड़ों को फैलाने और सिकोड़ने में मदद करती है, इससे प्राकृतिक रूप से सांस लेने जैसा प्रभाव पैदा होता है। इस मशीन का आविष्कार 1920 के दशक में पोलियो के गंभीर मामलों के इलाज के लिए किया गया था, जब मांसपेशियों के लकवाग्रस्त होने के कारण मरीज सांस नहीं ले पाते थे।
70 साल तक लोहे के फेफड़ों से सांस लेते रहे अलेक्जेंडर
पॉल अलेक्जेंडर ने अपनी जिंदगी के 70 साल आयरन लंग मशीन में बंद होकर गुजारे थे। उन्हें 6 साल की उम्र में साल 1952 में पोलियो हो गया था। पॉल का जन्म अमेरिका में वर्ष 1946 में हुआ था और 1952 में अमेरिका में इतिहास का सबसे बड़ा पोलियो फैला था। यह बीमारी इतनी तेजी से फैल रही थी कि हजारों बच्चे इसका शिकार हो गए थे। इनमें पॉल भी शामिल थे। उनके शरीर में गर्दन के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त होने के कारण काम नहीं कर रहा था। इससे उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी। ऐसे में एक बार उन्होंने आयरन लंग मशीन की शरण ली, तो फिर उससे बाहर ही नहीं निकल पाए। पिछले साल 78 साल की उम्र में पॉल का निधन हो गया था। इसके साथ ही पॉल इतिहास में सबसे लंबे वक्त तक मशीनी फेफड़ों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति बन गए। इसके लिए उनका नाम गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में पहले ही दर्ज किया जा चुका था।
