लाल इमारतों वाला वैभवशाली जीवंत शहर बीकानेर
राजस्थान में बीकानेर एक जीवंत शहर है, जिसका अपना अनूठा इतिहास है। इसे लाल शहर भी कहा जाता है। हालांकि बीकानेर का नाम आते ही भुजिया और नमकीन का स्वाद जुबान पर आ जाता है। हम ट्रेन से सुबह बीकानेर पहुंचे और यहां सैर-सपाटे के लिए दो दिन रखे थे। होटल में फ्रेश होने के बाद सबसे पहले हमने जूनागढ़ किला देखने का कार्यक्रम बनाया। यह रेलवे स्टेशन से करीब तीन किमी और हमारे होटल से डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित था। यह एक ऐतिहासिक और भव्य किला है। किले का मूल नाम चिंतामणि था और यह एक खाई से घिरा हुआ था। बाद में, 1902 में शाही परिवार के लालगढ़ नामक नए महल में स्थानांतरित होने के बाद इसका नाम बदलकर जूनागढ़ कर दिया गया, जिसका अर्थ है ‘पुराना किला’। इसका निर्माण राजा राय सिंह ने 1589 से 1594 के बीच कराया था। यह लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना है, जिसमें मुगल और राजस्थानी वास्तुकला का अद्भुत मिश्रण दिखता है। इसके भीतर कई खूबसूरत महल, जैसे बादल महल और अनूप महल स्थित हैं। जूनागढ़ किला न केवल एक ऐतिहासिक स्मारक है, बल्कि एक जीवंत संग्रहालय भी है। - विनीत गुप्ता, कानपुर
चार महलों से घिरा डूंगर निवास चौक
जूनागढ़ किले ने अपने इतिहास में कई युद्ध और घेराबंदी देखीं, लेकिन इस पर कभी किसी शत्रु का कब्जा नहीं रहा। यह किला लगभग 5.28 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है और 37 बुर्जों और सात द्वारों वाली एक ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। किले का मुख्य प्रवेश द्वार सूरज पोल है, जो पूर्व दिशा की ओर है और सूर्य देवता के चित्रों से सुशोभित है। अन्य द्वार दौलत पोल, चांद पोल, करण पोल, फतेह पोल, फूल महल पोल और लक्ष्मी नाथ पोल हैं। किले में कई प्रांगण हैं, जो अंदर स्थित विभिन्न संरचनाओं को आपस में जोड़ते हैं। इनमें सबसे प्रमुख प्रांगण डूंगर निवास चौक है, जो चार महलों करण महल, अनूप महल, चंद्र महल और गंगा महल से घिरा हुआ है।
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इन महलों की भव्य आंतरिक साज-सज्जा देखने वाली है। किले में हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित कई मंदिर हैं, जैसे हर मंदिर (भगवान विष्णु का मंदिर), रतन बिहारी मंदिर (भगवान कृष्ण का मंदिर), लक्ष्मी नाथ मंदिर (भगवान विष्णु और लक्ष्मी का मंदिर) और शिव मंदिर हैं। ये मंदिर मूर्तिकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। किले में कई संग्रहालय हैं, जिनमें बीकानेर के इतिहास और संस्कृति से संबंधित कलाकृतियों, हथियारों, वेशभूषा, आभूषणों, चित्रों, पांडुलिपियों और अन्य वस्तुओं का समृद्ध संग्रह प्रदर्शित किया गया है। यह देश का एकमात्र किला है, जहां पर्यटकों को महाराजा राय सिंह जी ट्रस्ट की ओर से निःशुल्क गाइड उपलब्ध कराए जाते हैं।
राजपूताना, इस्लामी और यूरोपीय वास्तुकला की झलक लालगढ़ पैलेस
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महाराजा गंगासिंह ने 1902 में इस भव्य राजमहल का निर्माण, अपने स्वर्गीय पिता महाराजा लाल सिंह की स्मृति में करवाया था। इसके वास्तुशिल्प की रूपरेखा की अवधारणा, एक अंग्रेज वास्तुविद् ‘सर स्विंटन जैकब’ द्वारा की गई थी। यह महल लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है तथा राजपूताना, इस्लामी तथा यूरोपीय वास्तुकला के मिश्रण से इसे मूर्तरूप प्रदान किया गया है। वर्तमान में इसे हैरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। इसके एक हिस्से में श्री सादुल म्युज़ियम है।
करणी माता मंदिर यहां होती है चूहों की पूजा
बीकानेर यात्रा के अगले दिन हम दुनियाभर में चूहों के लिए प्रसिद्ध करणी माता मंदिर पहुंचे। यह मंदिर बीकानेर से 30 किमी की दूरी पर देशनोक गांव में स्थित है। इसे ‘टैम्पल ऑफ रैट्स’ कहा जाता है। बताया गया कि यहां लगभग 25,000 काले चूहे हैं, जिन्हें ‘कबा’ कहते हैं। इनकी पवित्रता इस बात से उजागर होती है कि यदि किसी के पांव से कोई चूहा दबकर मर जाए, तो उसे चांदी का चूहा बनवाकर करणी माता के चरणों में चढ़ाना पड़ता है। एक किंवदंती के अनुसार करणी माता के सौतेले बेटे लक्ष्मण की एक तालाब में डूबने से मृत्यु हो गई थी। करणी माता ने यमराज से उन्हें जीवित करने के लिए प्रार्थना की। यमराज ने पहले मना कर दिया फिर इस शर्त पर मान गए कि उस दिन के बाद से लक्ष्मण तथा करणी माता के सभी वंशज चूहे के रूप में जिंदा रहेंगे। इसके बाद से चूहों को पवित्र मानकर मंदिर में भक्त लड्डू व दूध की बड़ी परातें चढ़ाते हैं, जिन्हें चूहे खाते-पीते हैं। चूहों का खाया हुआ प्रसाद सत्कार माना जाता है। गर्भगृह में करणी माता की मूर्ति स्थापित है। करणी माता मंदिर का द्वार सफेद संगमरमर से बनी एक सुंदर संरचना है। बड़ी संख्या में नव विवाहित यहां माता का आशीर्वाद लेने आते हैं।
राजसी वास्तुकला वाला प्रसिद्ध गजनेर पैलेस
गजनेर थार का अतुलनीय गहना है। 1784 में बीकानेर के महाराजा गज सिंह जी ने गजनेर पैलेस की स्थापना की थी। यह अपनी राजसी वास्तुकला, गजनेर झील के किनारे शांत वातावरण, वन्यजीव अभयारण्य और शाही जीवनशैली के अनुभव के लिए प्रसिद्ध है। यह महल लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। यहां पर अब लक्जरी सुविधाएं और प्रकृति-प्रेमी गतिविधियां जैसे सफारी, बर्ड वॉचिंग उपलब्ध हैं। यह शाही परिवार के साथ ही अतिथियों के लिए शिकारगाह और आरामगाह था। अब इसे एक हेरिटेज होटल में बदल दिया गया है।
राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र
राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केन्द्र एशिया का अपनी तरह का एकमात्र केन्द्र हैं, जहां ऊंटों का रखरखाव तथा उन पर अनुसंधान और प्रजनन संबंधित कार्य किए जाते हैं। शहर के करीब स्थित यह केन्द्र 2000 एकड़ से अधिक भूमि पर फैला है तथा इसका संचालन भारत सरकार द्वारा किया जाता है।
