गांधी तीर्थ, जलगांव : तकनीक और विचार से जुड़ने का अद्भुत अनुभव
हिंसा, असहिष्णुता और वैचारिक विभाजन के इस दौर में महात्मा गांधी को नए सिरे से समझने की जरूरत और गहरी हो जाती है। महाराष्ट्र के जलगांव में स्थित ‘गांधी तीर्थ’ इसी तलाश का उत्तर देता है। यह स्थल हमें बताता है कि गांधी को समझना केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि उनके विचारों से सीधे जुड़ने की एक जीवंत प्रक्रिया है। आधुनिक तकनीक, शोधपूर्ण प्रस्तुति और संवेदनशील क्यूरेशन के माध्यम से ‘गांधी तीर्थ’ महात्मा गांधी के जीवन, संघर्ष और मूल्यों को जिस तरह सजीव करता है, वह इसे एक साधारण दर्शनीय स्थल से कहीं आगे ले जाता है।
‘गांधी तीर्थ’ का बड़ा आकर्षण यह है कि यह महात्मा गांधी को केवल ‘महापुरुष’ के रूप में नहीं, बल्कि मोहनदास करमचंद गांधी एक जिज्ञासु बालक, प्रयोगशील युवा, संघर्षरत वकील और सतत साधक के रूप में सामने रखता है। इस तीर्थ की सबसे अनोखी विशेषता इसकी ऑडियो गाइड तकनीक है। हेडफोन के माध्यम से जैसे ही हम एक-एक खंड में प्रवेश करते हैं, गांधी का जीवन, उनके विचार और उनके समय की परिस्थितियां हमारे भीतर उतरने लगती हैं। यह यात्रा पोरबंदर के एक सामान्य से घर से शुरू होकर दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह और भारत के स्वतंत्रता संग्राम तक पहुंचती है।-कुमार सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार
स्पष्टता और संदर्भ की गहराई
महात्मा गांधी के जीवन कार्यों पर आधारित विश्व का पहला आडियो गाइड संग्रहालय भ्रमण के अनुभव को विशेष बनाती है। यह साधारण जानकारी नहीं, बल्कि एक तरह का संवाद है, जो दर्शक को भीतर तक छू लेता है। आवाज, संगीत, ऐतिहासिक उद्धरण और दृश्य एक साथ मिलकर ऐसा अनुभव रचते हैं कि दर्शक केवल देख नहीं रहा होता, बल्कि उस समय को जी रहा होता है। यह तकनीक गांधी के विचारों से भावनात्मक और बौद्धिक दोनों स्तरों पर जोड़ देती है। संग्रहालय के 31 से अधिक खंड टच स्क्रीन, बाइस्कोप, डिजिटल बुक्स, थ्री-डी मैंपिंग, एनिमेशन, ऐतिहासिक तस्वीरें, दुर्लभ फुटेज, गांधी के भाषणों की आवाज और समकालीन घटनाओं का दृश्यांकन आदि सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, मानो इतिहास किताबों से निकलकर हमारे सामने खड़ा हो गया हो। चरखा, नमक सत्याग्रह, दांडी यात्रा, असहयोग आंदोलन ये सब केवल घटनाएं नहीं रह जातीं, बल्कि मानवीय संवेदना और नैतिक साहस की कहानियां बन जाती हैं। इन प्रस्तुतियों में भावुकता नहीं, बल्कि विचार की स्पष्टता और संदर्भ की गहराई दिखाई देती है।
साधन की पवित्रता और साध्य की नैतिकता
‘गांधी तीर्थ’ में यह बात बार-बार उभरकर आती है कि गांधी का जीवन किसी एक दिन, एक घटना या एक आंदोलन से परिभाषित नहीं होता। उनका जीवन सतत प्रयोगों की प्रयोगशाला था सत्य के प्रयोग, अहिंसा के प्रयोग, आत्मसंयम और सामाजिक न्याय के प्रयोग। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ उनके संघर्ष से लेकर भारत में किसानों, मजदूरों और महिलाओं के प्रश्नों तक हर जगह गांधी का आग्रह एक ही रहा: साधन की पवित्रता और साध्य की नैतिकता। गांधी तीर्थ यह भी स्पष्ट करता है कि गांधी के लिए राजनीति सत्ता का खेल नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी थी। सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और करुणा ये उनके लिए नारे नहीं, जीवन की पद्धति थे। प्रदर्शनी में यह बात उभरकर आती है कि गांधी के प्रयोग केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं थे, बल्कि शिक्षा, समाज, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण तक फैले हुए थे। यहां यह भी प्रभावी ढंग से दिखाया गया है कि गांधी केवल राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि समाज सुधारक, शिक्षाविद् और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील चिंतक भी थे। बुनियादी शिक्षा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज और श्रम की गरिमा इन विचारों को आज की चुनौतियों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है।
जीवन जीने की पद्धति सत्य और अहिंसा
डिजिटल माध्यमों से यह सवाल भी उठाया जाता है कि उपभोक्तावाद, हिंसा और असमानता से भरी आज की दुनिया में गांधी की प्रासंगिकता कहां और कैसे है। इन सवालों के सीधे उत्तर नहीं दिए जाते, बल्कि दर्शक को सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है और शायद यही गांधी की सबसे बड़ी शिक्षा है। ‘गांधी तीर्थ’ का एक सशक्त पक्ष यह भी है कि यहां महात्मा गांधी के साथ उनके समय के अन्य व्यक्तित्वों और आंदोलनों का संदर्भ भी मिलता है। गोखले, टॉलस्टॉय, टैगोर, नेहरू इन सबके साथ गांधी का संवाद और मतभेद ईमानदारी से प्रस्तुत किए गए हैं। इससे गांधी किसी देवतुल्य, आलोचना से परे छवि में नहीं, बल्कि एक विचारशील और आत्मालोचन करने वाले मनुष्य के रूप में उभरते हैं। भ्रमण के दौरान सबसे गहरा प्रभाव गांधी के नैतिक साहस ने छोड़ा। सत्ता, लोकप्रियता या तात्कालिक लाभ के आगे झुकने से इंकार करने का साहस आज के समय में दुर्लभ होता जा रहा है। ‘गांधी तीर्थ’ यह याद दिलाता है कि परिवर्तन की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। सत्य और अहिंसा केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है।
विस्तृत और शांत परिसर
‘गांधी तीर्थ’ लगभग 40 एकड़ में फैला हुआ एक विस्तृत और शांत परिसर है। हरियाली, खुले स्थान और सादगी से भरा यह वातावरण स्वयं गांधी के जीवन-दर्शन की याद दिलाता है। यह परिसर बीते करीब दो दशकों से सक्रिय है और गांधीवादी विचारों के अध्ययन, शोध और प्रसार का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। पद्मश्री डॉ. भंवरलाल जैन के अथक परिश्रम और उनके अद्भुत कल्पना का साकार रूप लेता गांधी रिसर्च फाउंडेशन न केवल गांधी के जीवन और कर्म पर कार्य कर रहा है, बल्कि गांधी के विचारों को समकालीन संदर्भों से जोड़ने का भी सतत प्रयास कर रहा है, जहां गांधी के विविध रचनात्मक कार्यों को धरातल पर उतरते आप देख सकते है। यह भी उल्लेखनीय है कि गांधी तीर्थ केवल अतीत की ओर देखने वाला स्थल नहीं है। यहां शोध, अध्ययन और संवाद के लिए व्यापक संसाधन उपलब्ध हैं। यह स्थान युवाओं, शोधकर्ताओं और शिक्षकों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन सकता है। यहां से निकलते समय मन में यह भाव बना रहता है कि गांधी को ‘पढ़’ लेने से अधिक जरूरी है, उन्हें ‘जीना’ अपने छोटे-छोटे निर्णयों, व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारियों में।
आज जब समाज हिंसा, नफरत, संप्रदायिकता, असहिष्णुता और पर्यावरणीय संकटों से जूझ रहा है, तब गांधी तीर्थ हमें यह याद दिलाता है कि समाधान कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर मौजूद नैतिक विवेक में छिपा है। यही इस तीर्थ की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे गहरी सीख है। यहां आकर यह सवाल बार-बार मन में उठता है कि क्या इन समस्याओं का समाधान केवल कानून और शक्ति में है या फिर नैतिक विवेक और संवाद में? गांधी तीर्थ यह रास्ता जरूर दिखाता है कि अहिंसा, सह-अस्तित्व और सत्य के मार्ग पर चलकर विकल्प खोजे जा सकते हैं। इस अर्थ में गांधी तीर्थ केवल अतीत का संग्रहालय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक वैचारिक प्रयोगशाला है। यदि आज की दुनिया में बढ़ती हिंसा और संप्रदायिकता का कोई टिकाऊ समाधान तलाशना हो, तो गांधी तीर्थ की यात्रा आवश्यक लगती है। यहां से लौटते समय यह एहसास गहरा हो जाता है कि गांधी कोई इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि हमारे समय की जरूरत हैं और उन्हें समझने की शुरुआत यहीं से हो सकती है।
