कैंपस का पहला दिन: गिरते-पड़ते पाला छूने की कहानी

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Published By Anjali Singh
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बारहवीं हमने किसी मेरिट की सीढ़ी चढ़कर नहीं, बल्कि सब्सिडी वाले अंकों के सहारे पास की थी। यूं समझिए- गिरते-पड़ते किसी तरह पाला छू लिया था। देहात से शहर तक की पढ़ाई पूरी तरह साइकिल पर टिकी हुई थी। पंद्रह किलोमीटर के रास्ते में कभी चेन उतर जाती, कभी पंचर मुंह चिढ़ा देता। ऐसे में देर होना कोई अपवाद नहीं, रोजमर्रा की नियति थी। इंटर कॉलेज में अनुशासन कोई नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि एक कठोर भौतिक सत्य था। शार्प टाइम पर गेट पर ताला पड़ जाता और उसके बाद गुरुजनों से करुणा की अपेक्षा करना वैसा ही था जैसे तपती दुपहरी में ओस खोज लेना। समय पर पहुंच भी जाएं, तो कक्षा में डेढ़ सौ से अधिक विद्यार्थी ठुंसे रहते। 

ट्यूशन पढ़ने वाले भीमकाय, बलिष्ठ छात्र आगे की कतारों में विराजमान रहते। हम जैसे बैक-बेंचर्स तक न आवाज पहुंचती थी, न उम्मीद। धीरे-धीरे हम उन्हीं छात्रों की संगत में जाने लगे, जिन्हें व्यवस्था पहले ही ‘फेलियर’ घोषित कर चुकी थी। कक्षाएं बंक करना आदत नहीं, मजबूरी बन गया। नतीजा वही निकला जो निकलना था। यूजी की पहली सूची में हमारा नाम नहीं था। जिस विषय में कृपावश ग्रेस मिला था, वही हमने स्नातक में चुन लिया-यह आत्मविश्वास कम, दुस्साहस ज्यादा था। दो-तीन हफ्ते भारी उधेड़बुन में बीते। उस उम्र में ऊर्जा अतिरिक्त होती है। ऐसी कि एड़ी जमीन पर मारो तो लगे, पानी फूट पड़ेगा।

खैर, अन्य विषयों में अंक औसत थे। दूसरी सूची में मनोवांछित विषय मिल गया। प्रवेश मिलते ही लगा- जैसे किसी डूबते को तिनका नहीं, पूरी नाव मिल गई हो। जान बची, तो लाखों पाए- यह भाव भीतर तक समा गया। 1992 का साल था। महाविद्यालय पहुंचे तो कहानी ने कोई नया मोड़ नहीं लिया। कॉन्वेंट, केन्द्रीय विद्यालय, मॉडर्न स्कूल और हमारे इंटर कॉलेज, सबके छात्र वहां मौजूद थे। देहात का स्वाभिमान कुछ अलग किस्म का होता है- वह स्वावलंबन पर ज्यादा टिकता है। देहाती युवक की उनसे न पटरी बैठी थी, न बैठने वाली थी। ऊपर से समय-सारिणी का झंझट। फिजिक्स की कक्षा सुबह नौ बजे, प्रैक्टिकल ग्यारह बजे। रसायन शास्त्र एक बजे, उसका प्रैक्टिकल तीन बजे। गणित चार बजे। टाइम-टेबल ऐसा कि पढ़ाई से ज़्यादा धैर्य की परीक्षा ले।

हम देहाती युवक थे। खेती-किसानी, घर-बाहर- सबमें हाथ बंटाना पड़ता था। ऐसे में इस समय-सारिणी के मुताबिक चलना हमारे लिए कठिन नहीं, असंभव का पर्याय था। हम नियमित रूप से अनियमित होते चले गए। पर मन में एक बात गहरे बैठ चुकी थी- पाठ्यक्रम को साल भर में दो-चार बार आर-पार किए बिना आगे की राह नहीं खुलेगी। इसी समझ ने हमें स्वावलंबन की ओर धकेला। गुरु, कक्षा और घंटी के भरोसे रहने के बजाय हमने खुद से पढ़ना सीख लिया। शायद वहीं से शिक्षा का असली पाठ शुरू हुआ, जब डिग्री नहीं, समझ लक्ष्य बन गई।- ललित मोहन रयाल, आईएएस जिलाधिकारी नैनीताल

 

 

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