ऋषि कश्यप 

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Published By Anjali Singh
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि कश्यप को संपूर्ण सृष्टि का मूल सृजक माना गया है। यही कारण है कि कश्यप केवल एक महापुरुष ही नहीं, बल्कि एक व्यापक गोत्र का नाम भी हैं। परंपरा कहती है कि जिस व्यक्ति का गोत्र ज्ञात न हो, उसका गोत्र कश्यप माना जाता है, क्योंकि समस्त जीव-जगत की उत्पत्ति कश्यप ऋषि से ही हुई मानी गई है।

कश्यप ऋषि से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा परशुराम से संबंधित है। कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने पृथ्वी को क्षत्रियों से मुक्त कर संपूर्ण धरती अपने गुरु कश्यप मुनि को दान में दे दी। दान स्वीकार करने के बाद कश्यप मुनि ने परशुराम से कहा—“अब तुम मेरी दी हुई भूमि पर निवास मत करो।” गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने यह संकल्प लिया कि वे रात्रि में पृथ्वी पर नहीं रहेंगे। प्रतिदिन संध्या होते ही वे अपनी तीव्र गमन शक्ति से महेंद्र पर्वत पर चले जाते थे और प्रातः पुनः लौट आते थे।

महर्षि कश्यप का तेज पिघले हुए स्वर्ण के समान वर्णित है। उनकी जटाएँ अग्नि-ज्वालाओं की भाँति प्रज्वलित रहती थीं। वे ऋषियों में श्रेष्ठ, नीति और धर्म के परम अनुयायी थे। उनका आश्रम मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित था, जहाँ वे ब्रह्म-तत्व के ध्यान में लीन रहते थे। सुरों और असुरों—दोनों के मूल पुरुष के रूप में कश्यप मुनि का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है।

श्री नरसिंह पुराण के अनुसार, कश्यप ऋषि की पत्नियों से उत्पन्न मानस पुत्रों से ही सृष्टि का विस्तार हुआ। इसी कारण वे ‘सृष्टि के सृजनकर्ता’ कहलाए। पुराणों में उनकी कुल सत्रह पत्नियों का उल्लेख है, जिनमें से तेरह दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं। इन पत्नियों ने अपने-अपने स्वभाव और गुणों के अनुरूप विभिन्न संतानों को जन्म दिया।

ऋषि की पत्नी अदिति से बारह आदित्यों का जन्म हुआ, जिनमें भगवान विष्णु का वामन अवतार भी सम्मिलित है। यही अवतार मानव रूप में विष्णु का प्रथम अवतार माना जाता है, जिसे दक्षिण भारत में उपेन्द्र कहा गया। अदिति से हिरण्यकश्यप, हिरण्याक्ष और सिंहिका का भी जन्म हुआ। हिरण्यकश्यप का वध भगवान नरसिंह ने और हिरण्याक्ष का वध वराह अवतार ने किया।

दनु से दानवों की उत्पत्ति हुई, अरिष्टा से गंधर्व, सुरभि से गौवंश और विनता से गरुड़ तथा अरुण का जन्म हुआ। गरुड़ विष्णु के वाहन बने और अरुण सूर्यदेव के सारथी। क्रोधवशा से हिंसक जीवों तथा कद्रू से नागवंश की उत्पत्ति मानी गई। इन्हीं नागों के कारण कश्मीर को पुराणों में ‘नागों की भूमि’ कहा गया है।

 

 

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