यात्रा वृत्तांत: प्रणय और प्रताप की भूमि है कोटद्वार की कण्वघाटी
नैनीताल। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के कोटद्वार से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर मालिनी नदी के तट के निकट महर्षि कण्व ऋ षि का आश्रम है। महाकवि कालिदास ने इसी नदी के किनारे बैठकर विश्व के अद्भुत प्रेमकाव्य अभिज्ञान शाकुंतलम् की रचना की थी। इसी आश्रम में शकुंतला एक पर्णकुटी में रहते हुए प्रकृति की सेवा-संरक्षण में रत रहा करती थीं। एक बार आखेट के लिए निकले राजा दुष्यंत वनक्षेत्र में अंदर कण्व ऋ षि के आश्रम के निकट पहुंच गए, जहां सुंदरी शकुंतला को देखकर उनका मन मोहित होने की लोकश्रुति से देश परिचित है। वे सोचने लगे इतनी सुंदर स्त्री इस वियावान आश्रम में क्या कर रही है। -संतोष कुमार तिवारी
थकावट के कारण मलीन पड़े दुष्यंत के मुखमंडल को देखकर शकुंतला ने उन्हें जल पिलाया। अभिज्ञान शाकुंतलम् के चतुर्थ अंक के चार श्लोक, जिन्हें श्लोक चतुष्टय भी कहते हैं, में उल्लेख मिलता है कि महर्षि कण्व को करुणापूरित-पितृ हृदय मिला था। संसार के मोह-माया को त्याग देने वाले महर्षि कण्व मन ही मन में शकुंतला को दुष्यंत के साथ विवाहोपरांत भेजने के पश्चात की अधीनता मन द्रवित कर देती है। दुष्यंत के प्रणय निवेदन और मिलन के बाद शकुंतला का राजा दुष्यंत के प्रेम में डूबना एक स्वाभाविक क्रिया है। वे जिन वनस्पतियों-लताओं-पादपों को मालिनी नदी के जल से सींचने के उपरांत हैं और उसके बाद ही जल फलाहार और जल ग्रहण करती थीं, अब अनमने भाव से, खोई-खोई सी रहने लगी हैं।
अलग-अलग ऋ तुओं में खिलने वाले फूल पल्लव उनके लिए आभूषण हैं। अभिज्ञान शाकुंतल में कालिदास लिखते हैं कि विदाई के समय वन देवियां उनके कानों में मौसम का सबसे सुगंधित फूल गूंथती हैं उनके गले, कलाइयों में फूलों की छोटी माला पहनाती हैं। सहेलियां सुकेशिनी शकुंतला के गझिन और लंबे केशराशि में फूलों का गजरा पहनाकर दुष्यंत के साथ विदा करती हैं। विदाई के समय महर्षि कण्व ऋ षि दुष्यंत और शकुंतला दोनों को वंश वंशानुसार आचरण का परिपालन करने की सीख देते हैं और स्वप्न में भी दुष्यंत को बहु पत्नी परंपरा का अनुयायी का निषेध करते हैं।
कण्वघाटी प्रणयी राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी से आगे निकलकर प्रताप की भूमि भी है या नहीं बोलना चाहिए। इसी पावन भूमि पर शकुंतला सिंह से बढ़कर, महाप्रतापी और बाहुबली बालक भरत को जन्म देती है। वर्तमान में यहां पर राजा दुष्यंत शकुंतला और ऋ षि की प्रतिमाओं के पास एक सिंह, जिसके मुंह को खोलकर भरत उसका दांत गिनते हुए दिख रहे हैं। इस कथा के प्रतीकात्मक अर्थ से जुड़ना बहुत आवश्यक है।
प्रणय में आकंठ डूबने के बाद भी किस तरह शांत और एकनिष्ठ प्रेम की आनंदानूभूति से आप्तकाम हैं, इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं देवि शकुंतला। कल-कल बहती मालिनी नदी और वनाच्छादित कण्वाश्रम का अतीत जितना मनोहरी महाकवि कालिदास के साहित्य में है, काश वर्तमान में उसकी महिमा -गरिमा यदि संरक्षित होती तो आज पर्यटकों का यहां भी ताता लगा होता।
यहां एक डिग्री कॉलेज केंद्रीय विद्यालय बालिका इंटर कॉलेज और अटल उत्कृष्ट विद्यालय शिक्षा की अलख जगाए है। मैं आश्रम से निकलकर मालिनी नदी में जल-आचमन के लिए आगे बड़ा ही था, तभी वहां के स्थानीय निवासी विपिन नौटियाल और कृपाराम शर्मा ने आवाज लगाई, मैंने जैसे ही पलट कर देखा। एक बड़े दांत वाला हाथी मेरी ही दिशा की तरफ बढ़ता चला रहा था। मैंने खुद को सुरक्षित किया और प्रधानाचार्य सुनील कुमार जी ने कहा कि महोदय! यहां गजराज की आवक खूब रहती है। सतर्क रहिए। सेफ रहिए।
दिन करीब-करीब डूबने वाला था और मुझे लौटकर कोटद्वार भी आना था, वापस तो लौट आया, लेकिन मेरे मानस-पटल में कण्वाश्रम, प्रकृति कन्या शकुंतला की परम प्रतापी संतान भरत द्वारा सिंह के दांत गिनते हुए की प्रस्तर आकृति सत्साहस का संचार करने वाली है। एक बारगी आज की युवा पीढ़ी को देखकर यही सोचता हूं कि यह वही देश है, जहां भरत जैसी संतान हुई। आज की युवा पीढ़ी, आज का किशोर अपना आदर्श भरत को मानते भरत के प्रताप से प्रेरित होता। एक समवेत अनुरोध करना चाहता हूं कि प्रशासन मालिनी नदी की पुण्य-सलिला धारा को निर्वाध रूप से प्रवाहमान बनाए रखने, आसपास की वन-संपदा और आश्रम परिसर को पर्यटकों के लिए विकसित कर खोलने पर विचार किया जाना चाहिए, जिससे देश की युवा पीढ़ी भरत से परिचित हो सके, कण्व-आश्रम और महीयसी शकुंतला से से परिचित हो सके।
