बोध कथा: सुनने का महत्व
एक वर्ष तक वनवास का जीवन जीने के बाद युवराज का मन अपने राज्य लौटने को व्याकुल हो उठा। उसे लगता था कि अब वह बहुत कुछ सीख चुका है, परंतु गुरु की आज्ञा के आगे उसका आग्रह ठहर नहीं सका। विवश होकर वह फिर से उसी घने जंगल की ओर चल पड़ा, जहां मौन ही सबसे बड़ा गुरु था। दिन बीतते गए।
वृक्षों की सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट और बहती हवा की आवाजें उसे पहले जैसी ही प्रतीत होती रहीं। कोई नवीन अनुभव नहीं, कोई नई अनुभूति नहीं। युवराज के मन में बेचैनी घर करने लगी। क्या यही वह शिक्षा थी, जिसके लिए उसे फिर वन में भेजा गया था?
एक दिन उसने ठान लिया कि अब वह केवल कानों से नहीं, मन से सुनेगा। उसने अपने भीतर के शोर को शांत किया और हर ध्वनि को पूरे ध्यान से ग्रहण करने लगा। तभी एक सुबह, जब जंगल अभी नींद से जाग ही रहा था, उसे कुछ अज्ञात-सी, अत्यंत सूक्ष्म आवाज़ें सुनाई देने लगीं। ये आवाजें कानों से अधिक आत्मा में उतरती चली गईं। समय के साथ उसकी संवेदनशीलता बढ़ती गई। अब उसे कलियों के खिलने की मूक ध्वनि सुनाई देने लगी।
धरती पर उतरती सूर्य-किरणें उसे किसी कोमल राग की तरह प्रतीत होने लगीं। तितलियों की उड़ान में गीत था और घास की पत्तियां सुबह की ओस को ऐसे पीती थीं, मानो प्रकृति स्वयं संवाद कर रही हो। कुछ दिनों बाद युवराज गुरु के चरणों में उपस्थित हुआ। उसने विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, जब तक मैं सतही रूप से सुनता रहा, मुझे कुछ नया नहीं मिला, लेकिन जिस दिन मैंने ध्यान से सुनना सीखा, उस दिन मुझे वह सब सुनाई देने लगा जो शब्दों में नहीं था।”
गुरु मुस्कुराए और बोले, “यही शिक्षा है। जो शासक अनकही पीड़ा को सुन ले, बिना बोले भावनाएं समझ ले, वही सच्चा राजा होता है। अनसुनी आवाजों को सुनने की क्षमता ही जनविश्वास की नींव है।”इससे हमको शिक्षा मिलती है कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, संवेदनशील सुनने से जन्म लेता है, जो अनकहे को सुन ले, वही लोगों के दिलों पर राज करता है।
