पौराणिक कथा: कर्ण और धर्म का मौन उपदेश

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

महाभारत के विराट चरित्रों में कर्ण एक ऐसा नाम है, जो अपने त्याग और दानशीलता के कारण आज भी स्मरण किया जाता है। उन्हें दानवीर कहा गया, क्योंकि दान उनके लिए कोई विशेष कर्म नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक प्रवृत्ति थी। प्रतिदिन प्रातः स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य देने के पश्चात कर्ण के द्वार पर जो भी याचक आता, वह निराश होकर कभी नहीं लौटता था। उनके लिए दान यश, पुण्य या प्रशंसा का साधन नहीं, बल्कि धर्म का सहज पालन था।

एक दिन देवताओं के राजा इंद्र, ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण के पास पहुँचे। उन्होंने कर्ण से उनके जन्मजात कवच और कुंडल दान में माँग लिए। ये कवच-कुंडल कर्ण के शरीर का अभिन्न अंग थे और उन्हें युद्ध में अजेय बनाते थे। कर्ण समझ चुके थे कि यह याचना किसी साधारण उद्देश्य से नहीं की गई है। उन्हें यह भी ज्ञात था कि यह दान उन्हें मृत्यु के मार्ग पर ले जाएगा और इसका संबंध अर्जुन की रक्षा से है। 

फिर भी कर्ण के मन में कोई द्वंद्व नहीं उठा। उन्होंने एक क्षण का भी विलंब नहीं किया। न किसी शर्त की बात की, न किसी प्रतिफल की अपेक्षा रखी। अपने शरीर को चीरकर उन्होंने कवच और कुंडल दान कर दिए। यह केवल शारीरिक त्याग नहीं था, बल्कि आत्मबल और धर्मनिष्ठा की चरम अभिव्यक्ति थी। कर्ण के लिए धर्म जीवन से बड़ा था। कर्ण के इस असाधारण त्याग से इंद्रदेव भी भावविभोर हो उठे। उन्होंने कर्ण को वरदान स्वरूप शक्ति अस्त्र प्रदान किया, जो एक बार प्रयोग करने पर शत्रु का निश्चित वध कर सकता था।

जाते समय इंद्रदेव ने उनसे प्रश्न किया- “कर्ण, तुम जानते थे कि यह दान तुम्हारे प्राण ले सकता है, फिर भी तुमने इसे क्यों दिया?” कर्ण का उत्तर सरल, किंतु अत्यंत गहन था- “यदि धर्म किसी लाभ या भय से बँधा हो, तो वह धर्म नहीं रहता।” यह प्रसंग हमें सिखाता है कि महाभारत में धर्म किसी पक्ष, विजय या पराजय से नहीं जुड़ा है। वह मनुष्य के आचरण, कर्तव्य और त्याग से प्रकट होता है। कर्ण का जीवन इस सत्य का मौन उपदेश है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, धर्म का मार्ग आत्मा की आवाज़ से तय होता है।

संबंधित समाचार