संपादकीय : भाजपा में नवीन युग 

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Published By Monis Khan
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पार्टी के पैदा होने के बाद जन्म लेने वाले 45 साल के नितिन नवीन भाजपा यानी दुनिया की सबसे बड़ी और भारत की सबसे अमीर राजनीतिक पार्टी 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना केवल एक व्यक्ति का उदय नहीं, बल्कि राजनीति की कार्यशैली में संभावित पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है। स्वाभाविक है कि इसका असर अन्य दलों पर भी पड़ेगा और वहां भी युवा नेतृत्व को आगे लाने का दबाव बनेगा। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल या अन्य तमाम क्षेत्रीय दलों में भी यह सवाल उठ सकता है कि क्या वे भी नेतृत्व की बागडोर नई पीढ़ी को सौंपने का साहस कर सकते हैं।

 यदि वास्तव में युवाओं को निर्णायक जिम्मेदारी मिलती है, तो पार्टी व राजनीति दोनों में कुछ सकारात्मक बदलाव दिख सकते हैं। युवाओं की सोच अपेक्षाकृत अधिक तकनीक-संवेदी, डेटा-आधारित और परिणामोन्मुख होती है। संगठन में पारदर्शिता, जवाबदेही, सोशल मीडिया व जमीनी नेटवर्क का बेहतर तालमेल और जाति-गणित से आगे बढ़कर विकास व अवसर की राजनीति को प्राथमिकता मिलने की संभावना बढ़ेगी। हालांकि अनुभव की कमी एक चुनौती रहेगी, लेकिन सही मार्गदर्शन के साथ यह कमजोरी ताकत में बदली जा सकती है। 

संभव है संसदीय बोर्ड और राष्ट्रीय महासचिव जैसे शीर्ष निकायों में भी युवा बदलाव आए। कार्यकारिणी में 60-70 प्रतिशत युवाओं को शामिल करने का वादा कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। इसके लिए संगठन को वरिष्ठों के अनुभव और युवाओं की ऊर्जा के संतुलन का मॉडल अपनाना होगा। नए अध्यक्ष के सामने तात्कालिक चुनौती संगठनात्मक अनुशासन यथावत रखने और आगामी विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन सुधारने की होगी, जबकि दीर्घकालिक चुनौती 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी है, जो परिसीमन के बाद होंगे। सरकार, संघ और संगठन के बीच तालमेल बैठाना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। 

यूपी की राजनीति नितिन नवीन के लिए निर्णायक साबित होगी। 2027 में सत्ता की हैट्रिक का लक्ष्य संगठन पर भारी दबाव डालेगा। लोकसभा चुनाव में पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण का असर दिख चुका है, जिसकी काट के लिए सामाजिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय नेतृत्व और कल्याणकारी योजनाओं की प्रभावी डिलीवरी पर जोर देना होगा। दक्षिण भारत व पूर्वोत्तर में भी परीक्षा कम नहीं। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी के चुनाव भाजपा के लिए अलग-अलग तरह की चुनौतियां पेश करते हैं। असम में वापसी और बंगाल में जीत संभव है, लेकिन तमिलनाडु व केरल में संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना दीर्घकालिक रणनीति मांगता है। 

महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में 33 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों का चयन संगठनात्मक ढांचे को नए सिरे से गढ़ने की मांग करेगा। परिसीमन के बाद उत्तर-दक्षिण संतुलन और ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर सहमति बनाना भी नवीन के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौतियां होंगी। साथ ही 2029 तक नरेंद्र मोदी के बाद के नेतृत्व को लेकर चलने वाली अटकलों के बीच उन्हें आलाकमान के फैसलों और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। नए पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे युवा ऊर्जा को संस्थागत अनुशासन और वैचारिक निरंतरता के साथ कितनी कुशलता से जोड़ पाते हैं।