भाजपा ने यूपी में नियुक्त किए ऑब्जर्वर...चुनावी तैयारी तेज, जिला स्तर पर निगरानी और समन्वय की जिम्मेदारी
लखनऊ, अमृत विचार: सत्तारूढ़ भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपनी रणनीति को स्पष्ट करते हुए संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। पार्टी ने प्रदेश के 84 संगठनात्मक जिलों में ऑब्जर्वरों की नियुक्ति कर दी है। संगठन के नए मुखिया का यह फैसला जिला स्तर पर निगरानी और समन्वय की जिम्मेदारी के साथ विधानसभा चुनाव से पहले संगठन पर फोकस करते हुए गुटबाजी पर लगाम लगाने की तैयारी है।
पिछले महीने पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद यह पहला बड़ा संगठनात्मक निर्णय माना जा रहा है। जिन 84 संगठनात्मक जिलों में हाल ही में नए जिला अध्यक्ष नियुक्त किए गए थे, वहां अब ऑब्जर्वर तैनात किए गए हैं। इनकी भूमिका केवल रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं होगी। उन्हें जिला संगठन, जनप्रतिनिधियों और पार्टी के विभिन्न मोर्चों के बीच समन्वय स्थापित करने, गुटबाजी पर नियंत्रण रखने और केंद्रीय-प्रदेश नेतृत्व की रणनीति को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी दी गई है।
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में सीटों का 62 से घटकर 33 रह जाना केवल राष्ट्रीय मुद्दों का असर नहीं था। इसके पीछे संगठनात्मक शिथिलता, मतदाता संपर्क की कमजोरी और सामाजिक संदेश की अस्पष्टता भी अहम कारण रहे। इसी अनुभव के आधार पर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद ऑब्जर्वरों को जिलों में भेजने की योजना बनाई गई।
मतदाता सूचियों में नामों की कमी, खासकर पारंपरिक समर्थक वर्गों में, पार्टी के लिए चेतावनी की तरह देखी गई। हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कानपुर और मुरादाबाद जैसे जिलों में संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच खींचतान लंबे समय से सामने आती रही है। पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि यदि इन अंतर्विरोधों को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो चुनावी नुकसान तय है। ऑब्जर्वर व्यवस्था को इन्हीं कमजोर कड़ियों को जोड़ने के औजार के रूप में देखा जा रहा है।
संगठन में फीडबैक-आधारित मॉडल
पंकज चौधरी के नेतृत्व में प्रदेश संगठन तेजी से फीडबैक-आधारित मॉडल पर काम कर रहा है। वे लगातार जिलों और क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं, स्थानीय नेताओं से सीधे संवाद कर रहे हैं और संगठन की नब्ज टटोल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 84 जिलों में ऑब्जर्वरों की तैनाती दरअसल समय से पहले चुनावी मशीनरी को सक्रिय करने की कोशिश है, ताकि 2027 की लड़ाई आखिरी वक्त की बजाय लंबे अभियान के तौर पर लड़ी जा सके।
सभी वर्गों में संतुलन साधने की कोशिश
इस संगठनात्मक कवायद के समानांतर भाजपा के भीतर सामाजिक समीकरण भी केंद्र में हैं। ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, भूमिहार, ओबीसी और दलित सभी वर्गों में संतुलन साधने की कोशिश साफ दिखाई देती है। आंकड़े बताते हैं कि संगठन और सरकार, दोनों में ब्राह्मण और ठाकुर प्रतिनिधित्व लगभग संतुलित है, जबकि वास्तविक संगठनात्मक प्रभुत्व ओबीसी नेतृत्व के हाथों में है। प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री जैसे अहम पदों पर ओबीसी नेताओं की मौजूदगी पार्टी के दीर्घकालिक सामाजिक आधार को मजबूत करती है।
दलित राजनीति पर बड़ा फोकस
दलित राजनीति भाजपा के लिए अगला बड़ा फोकस बनती दिख रही है। संगठन और मंत्रिपरिषद में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ, गैर-जाटव दलितों और पहली बार वोट देने वालों तक पहुंच बढ़ाने पर रणनीतिक काम हो रहा है। इसके साथ ही महिलाएं पार्टी की दूसरी बड़ी प्राथमिकता हैं। उज्ज्वला, आवास और मिशन शक्ति जैसी योजनाओं से बने माहौल को संगठनात्मक ताकत में बदलने के लिए जिला-मंडल स्तर पर महिला नेतृत्व को आगे लाने की तैयारी है।
ऑब्ज़र्वर नियुक्ति का मकसद
•84 संगठनात्मक जिलों में निगरानी व्यवस्था
• जिला संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय
• गुटबाजी और अंदरूनी विवादों पर नियंत्रण
•मतदाता सूची सुधार और बूथ स्तर पर सक्रियता
•विधानसभा 2027 की तैयारी समय से शुरू करना
