हाईकोर्ट ने कहा- कुटिल मंशा न होने पर सहमति-आधारित शारीरिक संबंध आपराधिक दायरे में मान्य नहीं

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Published By Deepak Mishra
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झूठे विवाह-प्रलोभन पर यौन संबंध और आपराधिक धमकी के आरोपों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि पक्षकारों के बीच लंबे समय तक चले संबंध सहमति-आधारित प्रेम संबंध थे, न कि प्रारंभ से ही धोखे पर आधारित। अतः इस आधार पर तीनों अभियुक्तों के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। 

उक्त आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकलपीठ ने जितेंद्र कुमार और दो अन्य (यानी भाई और भाभी)  के द्वारा बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल आवेदन को स्वीकार करते हुए पारित किया। मामले के अनुसार अभियुक्तों के खिलाफ बीएनएस की धारा 69 और 351(2) के तहत पुलिस थाना गाँधी पार्क, अलीगढ में मुकदमा दर्ज किया गया था।

आवेदन में संलग्न तथ्यों के तहत अभियुक्त पर वर्ष 2021 से विवाह का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाने का आरोप था, जबकि उसके भाई और भाभी पर आपराधिक धमकी देने के आरोप लगाए गए। पीड़िता ने एफआईआर में गर्भधारण और जबरन गर्भपात का भी दावा किया गया था, हालांकि जांच में इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिले और इस आरोप में चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। 

कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड से यह तथ्य निर्विवाद है कि दोनों पक्ष 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे। दोनों के बीच प्रेम संबंध में थे और विवाह को लेकर पारस्परिक सहमति और सद्भावनापूर्ण आश्वासन मौजूद था। केवल बाद में विवाह न हो पाने मात्र से इसे धोखाधड़ी या झूठा वादा नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि दीर्घकालिक सहमति-आधारित शारीरिक संबंध, जिनमें प्रारंभ से छल या कुटिल मंशा न हो, उन्हें आपराधिक दायित्व के दायरे में नहीं लाया जा सकता। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने वर्तमान आवेदन स्वीकार करते हुए चार्जशीट, संज्ञान आदेश और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

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