इरफान सोलंकी को हाईकोर्ट से लगा तगड़ा झटका... याचिका खारिज, गैंगस्टर मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही रद्द करने की थी मांग

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
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प्रयागराजः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सपा के पूर्व विधायक इरफान सोलंकी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 के तहत दर्ज मामले की कार्यवाही, चार्जशीट, संज्ञान आदेश, डिस्चार्ज आवेदन खारिज करने के आदेश तथा आरोप तय किए जाने की कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की थी। न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने उक्त आदेश पारित करते हुए कहा कि जब ट्रायल शुरू हो चुका है और गवाहों के बयान दर्ज हो रहे हैं, तब इस स्तर पर हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता है। कोर्ट के समक्ष यह निर्विवाद था कि विशेष न्यायालय (एमपी/एमएलए), कानपुर नगर में चल रहे ट्रायल में अभियोजन के एक गवाह का बयान दर्ज हो चुका है, जबकि दूसरे गवाह का बयान शेष है।

ऐसे में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय होने और ट्रायल आरंभ होने के बाद डिस्चार्ज या समन आदेश को चुनौती देना विलंबित और असंगत है। मामले के अनुसार 26 दिसंबर 2022 को जाजमऊ थाने में दर्ज एफआईआर में इरफान सोलंकी को कथित गैंग लीडर बताते हुए भूमि कब्जा, आगजनी, धमकी और अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। पुलिस द्वारा तैयार गैंग चार्ट को सक्षम अधिकारियों-अपर पुलिस आयुक्त, पुलिस आयुक्त से अनुमोदन प्राप्त हुआ था।

कोर्ट ने माना कि अनुमोदन स्वतंत्र विचार के बाद दिया गया और इसे यांत्रिक या पूर्व-प्रारूपित नहीं कहा जा सकता। इरफान सोलंकी की ओर से तर्क दिया गया कि उन्हें राजनीतिक द्वेष के कारण फंसाया गया है। गैंग चार्ट में नियमों का उल्लंघन है और संबंधित मूल मामले में उनकी सजा के विरुद्ध अपील लंबित है। इस आधार पर कार्यवाही को ‘प्रक्रिया का दुरुपयोग’ बताया गया। हालांकि राज्य सरकार ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि ट्रायल उन्नत चरण में है। आरोप तय हो चुके हैं और अब हस्तक्षेप न्यायहित में नहीं होगा, साथ ही गैंग चार्ट के अनुमोदन में विधि का पालन किया गया है। मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला देकर कहा कि धारा 482 की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग अत्यंत अपवादस्वरूप मामलों में ही किया जा सकता है।

राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप मात्र इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं बनता है। आरोप तय होने के बाद डिस्चार्ज का प्रश्न नहीं उठता। ट्रायल के अंत में साक्ष्य के आधार पर ही दोषसिद्धि या बरी होने का निर्णय संभव है। अंत में इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि याचिका चार-स्तरीय कसौटी पर खरी नहीं उतरती और ट्रायल में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है। परिणामस्वरूप बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल याचिका खारिज कर दी गई और निचली अदालत में मुकदमा जारी रखने का निर्देश दिया गया।

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